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Army Day 2019 : भारत पाकिस्तान का बंटवारा, कश्मीर का भारत में विलय, अंग्रेजों की शातिर चाल और जनरल करियप्पा की देशभक्ति

सेना दिवस 2019 Army Day 2019 15 जनवरी 2019 को देश में हर्षोउल्लास के साथ मनाए जा रहे 71वें सेनादिवस के मौके पर सेवानिवृत ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत (वीएसएम) ने हरिभूमि के लिए यह कमेंट्री की है। जानिए भारत पाकिस्तान का बंटवारा, कश्मीर का भारत में विलय, अंग्रेजों की शातिर चाल और जनरल करियप्पा की देशभक्ति के बारे में।

Army Day 2019 : भारत पाकिस्तान का बंटवारा, कश्मीर का भारत में विलय, अंग्रेजों की शातिर चाल और जनरल करियप्पा की देशभक्ति

Army Day 2019 : सेना दिवस आजाद भारत के इतिहास का वो स्वर्णिम पल है जब 15 जनवरी 1949 को सेनाप्रमुख के तौर एक भारतीय नागरिक लेफ्टिनेंट जनरल के़ एम़ करियप्पा को तत्कालीन ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल सर फ्रांसिस बूचर से लेकर सेना की आधिकारिक कमान सौंपी गई थी। इसके अलगे वर्ष 1950 से 15 जनवरी को देश में सेनादिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। सेना ने ही देश को असल मायनों में अखंड भारत के रूप में बनाए रखने में शीर्ष योगदान दिया है। इसलिए आजादी के बाद के उसके युद्ध इतिहास और अन्य रोचक संस्मरणों का जिक्र करना जरूरी हो जाता है। जानिए भारत पाकिस्तान का बंटवारा, कश्मीर का भारत में विलय, अंग्रेजों की शातिर चाल और जनरल करियप्पा की देशभक्ति के बारे में...

भारत पाकिस्तान का बंटवारा

आजादी की शुरूआत के साथ ही ये तय हो गया था कि क्षेत्रफल के हिसाब से बड़े भारत को बंटवारे के दौरान हर चीज दो–तिहाई और पाकिस्तान को एक-तिहाई मिलेगी। इसी फार्मूले से सेना का भी विभाजन हुआ। हिंदूओं की बहुलता वाली सैन्य रेंजीमेंट भारत में रही और मुसलमानों की अधिकता वाली पाकिस्तान चली गईं। यहां एक रोचक तथ्य ये भी है कि 1947 तक आईएमए में हिंदू अफसरों को प्रशिक्षण देने वाले ज्यादातर अधिकारी मुसलमान थे। 1950 के दशक में सेना में आया सबसे बड़ा बदलाव ये था कि आईएमए में पासिंग आउट परेड में आदेश के वाक्य हिंदी में बोलने की घोषणा की गई, मेस में भी हिंदूस्तानी परंपरा से भोजन बनाया जाने लगा। सेना ने पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था। इसमें पहली लड़ाई में कुल 13 लाख सैनिक शामिल हुए, 12 को विक्टोरिया क्रास मिला। दूसरी लड़ाई में 25 लाख सैनिकों ने जर्मनी, जापान और इटली के खिलाफ युद्ध लड़ा व सभी मोर्चों पर फतह हासिल की।

कश्मीर का भारत में विलय

इसके बाद में आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरा कश्मीर युद्ध। पाकिस्तान ने कबालियों की मदद से कश्मीर हड़पने के लिए आक्रमण कर दिया था। इनकी अगुवाई पाक सेना के अधिकारी कर रहे थे। इस दौरान अंग्रेजों से भी अनुरोध किया गया कि आप नेतृत्व दीजिए, उन्होंने मना कर दिया। क्योंकि उस समय की व्यवस्था में भारत और पाक सेना के सेनापति अंग्रेज अफसर ही थे। वो ये नहीं चाहते थे कि उनके नागरिक इस युद्ध में आपस में लड़े। इससे समस्या और बढ़ी, दवाब में कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी। लेकिन तत्कालीन गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि जब तक कश्मीर भारत का अंग नहीं होगा। तब तक उसे मदद नहीं दी जाएगी। हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय स्वीकारा, संधि पर हस्ताक्षर किए। उसके बाद 27 अक्टूबर को दिल्ली के पास मौजूद सिक्ख रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल हरीशचंद्र राय के नेतृत्व में उनकी बटालियन को फटाफट डैकोटा विमानों से श्रीनगर रवाना किया गया। यहां उतरने के बाद वो बारामूला की तरफ बढ़े, कबालियों पर उनके आक्रमण का प्रति-आक्रमण कर उन्हें वश में किया गया। लेकिन दुर्भाग्यवश कर्नल राय वीरगति को प्राप्त हुए। यहां कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर सोमनाथ शर्मा को याद करना बेहद जरूरी है। उन्होंने बड़गाम हवाईअड्डे को कबालियों से बचाते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया था। इसके लिए उन्हें मरणोपरांत आजाद भारत के पहले सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। यह युद्ध अपने आप में इसलिए भी विशिष्ट है। क्योंकि इस दौरान हमारी सेना खस्ताहाल थी।

अंग्रेजों की शातिर चाल

अंग्रेजों ने मन बना लिया था कि वो भारत छोड़कर हमेशा के लिए इग्लैंड जा रहे हैं। इसलिए नए हथियार भी नहीं खरीदे। ऐसे में सेना को प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों से मिले बचे-कुचे हथियारों से ही काम चलाना पड़ रहा था। लेकिन बड़ी बात जो हमारे पक्ष में थी वो हमारे जवानों और अधिकारियों का ऊंचा मनोबल था। जिससे हमने प्रथम कश्मीर युद्ध जीता। इसके बाद भी सेना ने आजाद भारत की अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कई कार्य किए। जिसमें हैदराबाद का अध्याय बेहद अहम है। हैदराबाद के निजाम की आजादी का ख्वाब और हिंदूओं पर बढ़ते अत्याचारों के चलते तत्कालीन गृह-मंत्री सरदार पटेल ने हस्तक्षेप करते हुए सेना की दक्षिणी कमांड की अगुवाई में ऑपरेशन पोलो शुरू किया। सेना हैदराबाद में घुसी और उसने महज पांच दिन में निजाम की सेना को पस्त करके हैदराबाद का भारत में विलय संभव कराया। हालांकि इस कार्रवाई के लिए तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड माउंटबेटन और पीएम जवाहरलाल नेहरू तैयार नहीं थे। वो हैदराबाद को शांतिवार्ता के जरिए भारतीय संघ का हिस्सा बनाना चाहते थे। लेकिन सरदार पटेल ने उनके इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि भारत की सेना पहले ही हैदराबाद में प्रवेश कर चुकी हैं। ऐसे में अब उसे वापस नहीं बुलाया जा सकता। इसके समांतर देश में चल रहे विभाजन से जुड़े भीषण दंगों में भी सेना ने ही आम जनता को सुरक्षा प्रदान करने के लिए अहम योगदान दिया था।

जनरल करियप्पा की देशभक्ति

जनरल करियप्पा को पहले भारतीय सेनाप्रमुख की जिम्मेदारी मिलने के बाद सरकार की ओर से तीन मूर्ति भवन सरकारी आवास के रूप में दिया जा रहा था। लेकिन उन्होंने इसके भव्य आकार को वजह बताकर इसे लेने से इंकार कर दिया और कहा कि अभी हमारा देश नया-नया आजाद हुआ है। ऐसे में इस प्रकार के सरकारी आवास की उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है। उनके इंकार के बाद यह आवास भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दिया गया और उन्हें लुटियंस दिल्ली में आर्मी हाउस के रूप में नया आवास दिया गया। इतना ही करियप्पा ने सेनाध्यक्ष बनने के बाद सेना के वेतन में भी कटौती कर दी थी। जिससे सरकारी खजाने पर बहुत अधिक बोझ न पड़े।

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