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कोरेगांव-भीमा हिंसा: महाराष्ट्र पुलिस अधिकारी से खफा कोर्ट, कार्यकर्ताओं की नजरबंदी बढ़ाई

सुप्रीम कोर्ट ने कोरेगांव-भीमा हिंसा मामले में पांच अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के बयान पर सख्त रूख अपनाते हुए कहा कि उन्होंने शीर्ष अदालत पर आक्षेप लगाए हैं।

कोरेगांव-भीमा हिंसा: महाराष्ट्र पुलिस अधिकारी से खफा कोर्ट, कार्यकर्ताओं की नजरबंदी बढ़ाई
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उच्चतम न्यायालय ने कोरेगांव-भीमा हिंसा मामले में पांच अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के बयान पर सख्त रूख अपनाते हुए गुरुवार को कहा कि उन्होंने शीर्ष अदालत पर‘‘आक्षेप'' लगाए हैं।

न्यायालय ने अपने पहले के आदेश की अवधि को बढ़ाते हुए कहा कि अधिकार कार्यकर्ता- वरवर राव, अरूण फरेरा, वेरनान गोन्जाल्विस, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा 12 सितंबर तक अपने घरों में नजरबंद रहेंगे।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की पीठ ने इस मामले में पुणे के सहायक पुलिस आयुक्त के मीडिया को दिए गए बयानों को बहुत गंभीरता से लिया और कहा कि वह यह कह कर न्यायालय पर आक्षेप लगा रहे हैं कि उसे याचिकाएं स्वीकार नहीं करनी चाहिए थीं।

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न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘‘मैंने पुणे के सहायक पुलिस आयुक्त के संवाददाता सम्मेलन को देखा था जिसमें यह संकेत दिए गए कि उच्चतम न्यायालय को इस चरण में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। उन्हें ऐसा कहने का और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों पर आक्षेप लगाने का कोई अधिकार नहीं है।''

इस पर महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पुलिस अधिकारी के बर्ताव पर तत्काल माफी मांगी।

न्यायमूर्ति ने कहा, ‘‘उन्हें बता दीजिएगा कि हमने इसे बहुत गंभीरता से लिया है....आप अपने पुलिस अधिकारियों को अधिक जिम्मेदार बनने के लिये कहें। मामला हमारे पास है और हम पुलिस अधिकारियों से यह नहीं सुनना चाहते कि उच्चतम न्यायालय गलत है।''

इसके साथ ही पीठ ने इतिहासकार रोमिला थापर और दूसरे याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे न्यायालय को संतुष्ट करें कि क्या आपराधिक मामले में कोई तीसरा पक्ष हस्तक्षेप कर सकता है।

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इससे पहले सरकार की ओर न्यायालय में कहा गया कि थापर एवं अन्य का याचिका दायर करने का कोई अधिकार नहीं बनता। पीठ ने कहा, ‘‘आपराधिक जांच में क्या तीसरा पक्ष आ सकता है?''

थापर तथा अन्य के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा,‘‘ वे तीसरा पक्ष नहीं हैं और यह बड़ा मामला है। पीठ ने इस मामले की सुनवाई 12 सितंबर के लिये स्थगित कर दी।

इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने अपने जवाब में कहा था कि इन पांच कार्यकर्ताओं को उनके असहमति वाले दृष्टिकोण की वजह से नहीं बल्कि प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) से उनके संपर्को के बारे में ठोस साक्ष्य के आधार पर गिरफ्तार किया गया था।

वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि गिरफ्तार कार्यकर्ताओं ने इस बात पर सहमति जतायी है कि याचिकाकर्ता उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और उन्हें मुकदमें पक्ष बनने की अनुमति दी जा सकती है।

राज्य सरकार ने इन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शीर्ष अदालत से जारी नोटिस के जवाब में कल न्यायालय में हलफनामा दाखिल किया था। इस हलफनामे में दावा किया था कि ये कार्यकर्ता देश में हिंसा फैलाने और सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करने की योजना तैयार कर रहे थे।

महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल 31 दिसंबर को एलगार परिषद की बैठक के बाद पुणे के कोरेगांव-भीमा गांव में हुयी हिंसा की घटना की जांच के सिलसिले में कई जगह छापे मारने के बाद तेलुगू कवि वरवरा राव, वेरनान गोन्साल्विज, अरूण फरेरा, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा को गिरफ्तार किया था।

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