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अखिलेश के राज में यूपी में अपराध का भी हुआ ''विकास''

बीते पांच सालों में यूपी कई बार सांप्रदायिकता की आग में जला।

अखिलेश के राज में यूपी में अपराध का भी हुआ विकास
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नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर लगभग सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है। मतदाताओं को रिझाने के लिए सभी पार्टियों ने अपना-अपना चुनावी घोषणा पत्र भी जारी कर दिया है। अब देखना है कि मतदाता किनके वादों पर यकीन करते हैं और चुनावों में किसके निशान का बटन दबाते हैं।
सत्तारूढ़ पार्टी समाजवादी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक बार फिर सत्ता पर काबिज होने का सपना संजोए हुए हैं। लंबी खींच तान के बाद आखिरकार पिता से वो 'साइकिल' और 'अध्यक्ष' पद चुनाव आयोग से जीतने में कामयाब रहे। इसके बाद अब उनका पूरा ध्यान चुनाव प्रचार और गठबंधन पर है। सत्ता में वापस लौटने के लिए अखिलेश ने चुनाव से पहले राज्य में 60 हजार करोड़ रुपए क परियोजनाओं की घोषणाएं भी कर चुके थे। लेकिन हर बार बड़ी-बड़ी घोषणाएं मतदाताओं को रिझाने में कामयाब रहे ये जरूरी नहीं है। मतदाता काम देखती हैं घोषणाएं नहीं।
अखिलेश के 5 साल के कार्यकाल की बात करें तो इन पांच सालों में प्रदेश कई बार सांप्रदायिकता की आग में जला और महिलाओं की अस्मत के लिहाज से उत्तर प्रदेश इस बीच कभी भी उत्तम प्रदेश साबित नहीं हुआ। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के जरिए देखते हैं अखिलेश का रिपोर्ट कार्ड-
सांप्रदायिकता की आग में झुलसा प्रदेश
अखिलेश यादव 2012 में शानदार जीत के साथ प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। लगा जैसे प्रदेश का विकास और छवि दोनों होगा। लेकिन 2013 में जो हुआ, उसने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हिलाकर रख दिया। 2013 में कवाल गांव में हुई एक छोटी से छेड़छाड़ की वारदात ने दंगों का रूप ले लिया।
पूरा मुजफ्फरनगर जिले इसकी चपेट में आया और 43 से ज्यादा लोग मारे गए। साल 2013 में दंगों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। साल 2013 में पूरे प्रदेश में 823 दंगों की वारदातें हुईं। इनमें 133 लोगों ने जान गंवाई और 2269 से ज्यादा लोग घायल हुए।
अगले साल 2014 में भी दंगे नहीं रुके और 644 वारदातें हुईं। इन घटनाओं में कुल 95 लोग हताहत हुए। 2014 से 2015 के बीच सांप्रदायिक हिंसा में 17% बढ़ोत्तरी हुई। 2015 में भी 751 दंगे की घटनाएं हुईं और 97 लोग मारे गए। साल दर साल पुलिस-प्रशासन दंगाई के आगे घुटने टेकता दिखाई दिया। मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, जहानाबाद और कई जगह दंगों की गवाह बनी।
महिलाओं के लिए बना बदतर प्रदेश
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बेहतर पुलिस व्यवस्था के लाख दावे किए हों लेकिन आंकड़े उनकी पोल खोलते रहे। प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध ने आसामां छुआ। साल 2014 में प्रदेश भर में करीब 3,467 रेप की घटनाएं हुईं। हैरानी वाली बात ये थी कि अगले ही साल 2015 रेप की वारदात में 161% की बढ़ोत्तरी हुई और 9075 रेप के मामले दर्ज हुए।
बुलंदशहर हाइवे गैंगरेप और लखनऊ आशियाना रेप केस जैसे न जाने कितने मामले थे, जो अखिलेश सरकार की नाक के नीचे हुए। ऐसी घटनाओं को रोकने की बजाए आजम खां जैसे सपा के कद्दावर मंत्री रेप के मामलों को राजनीतिक रंग देते नजर आए।
2014 की NCRB की सूची में उत्तर प्रदेश सबसे असुरक्षित राज्यों में से एक था। साल 2015 में NCRB रिपोर्ट में प्रदेश के सबसे हाई-प्रोफाइल और वीआइपी शहर लखनऊ को सबसे असुरक्षित शहर कहा गया।
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