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Air Strike Poem : भारतीय सेना के लिए सबसे बेस्ट कविता, पढ़कर खौल उठेगा खून

भारत ने पाकिस्तान में हवाई हमला कर पुलवामा आतंकी हमले का नापाक को करारा जवाब दे दिया है। भारत ने मंगलवार तड़के पाकिस्तान के भीतर हवाई हमले कर कई आतंकवादी शिविरों को निशाना बनाया। इस अवसर पर अगर आप भी भारतीय सेना के लिए कविता सर्च कर रहे हैं तो हम आपके लिए लाये हैं मशहूर कवि श्रीकृष्ण सरल की भारतीय सेना के लिए एयर स्ट्राइक पर कविता।

Air Strike Poem : भारतीय सेना के लिए सबसे बेस्ट कविता, पढ़कर खौल उठेगा खून

भारत ने पाकिस्तान में हवाई हमला कर पुलवामा आतंकी हमले का नापाक को करारा जवाब दे दिया है। भारत ने मंगलवार तड़के पाकिस्तान के भीतर हवाई हमले कर कई आतंकवादी शिविरों को निशाना बनाया। भारतीय वायुसेना के विभिन्न लड़ाकू विमानों ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बालाकोट में पाकिस्तान स्थित कई आतंकवादी समूहों के शिविरों को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। भारत की इस जवाबी कार्रवाई से पुलवामा शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित हुई है। इस अवसर पर अगर आप भी भारतीय सेना के लिए कविता सर्च कर रहे हैं तो हम आपके लिए लाये हैं मशहूर कवि श्रीकृष्ण सरल की भारतीय सेना के लिए एयर स्ट्राइक पर कविता...

मैं अमर शहीदों का चारण

उनके गुण गाया करता हूं

जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है,

मैं उसे चुकाया करता हूं।

यह सच है, याद शहीदों की हम लोगों ने दफनाई है

यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आज़ादी आई है,

यह सच है, हिन्दुस्तान आज जिन्दा उनकी कुर्वानी से

यह सच अपना मस्तक ऊँचा उनकी बलिदान कहानी से।

वे अगर न होते तो भारत मुर्दों का देश कहा जाता,

जीवन ऍसा बोझा होता जो हमसे नहीं सहा जाता,

यह सच है दाग गुलामी के उनने लोहू सो धोए हैं,

हम लोग बीज बोते, उनने धरती में मस्तक बोए हैं।

इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के

मैं भाव जगाया करता हूं।

मैं अमर शहीदों का चारण

उनके यश गाया करता हूं।

यह सच उनके जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं,

जीवन की स्वप्निल निधियाँ भी उनने जीवन में पाई थीं,

पर, माँ के आँसू लख उनने सब सरस फुहारें लौटा दीं,

काँटों के पथ का वरण किया, रंगीन बहारें लौटा दीं।

उनने धरती की सेवा के वादे न किए लम्बे—चौड़े,

माँ के अर्चन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े,

भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहा कर दिखा गए,

जग के इतिहासों में अपनी गौरव—गाथाएँ लिखा गए।

उन गाथाओं से सर्दखून को

मैं गरमाया करता हूं।

मैं अमर शहीदों का चरण

उनके यश गाया करता हूं।

है अमर शहीदों की पूजा, हर एक राष्ट्र की परंपरा

उनसे है माँ की कोख धन्य, उनको पाकर है धन्य धरा,

गिरता है उनका रक्त जहाँ, वे ठौर तीर्थ कहलाते हैं,

वे रक्त—बीज, अपने जैसों की नई फसल दे जाते हैं।

इसलिए राष्ट्र—कर्त्तव्य, शहीदों का समुचित सम्मान करे,

मस्तक देने वाले लोगों पर वह युग—युग अभिमान करे,

होता है ऍसा नहीं जहाँ, वह राष्ट्र नहीं टिक पाता है,

आजादी खण्डित हो जाती, सम्मान सभी बिक जाता है।

यह धर्म—कर्म यह मर्म

सभी को मैं समझाया करता हूं।

मैं अमर शहीदों का चरण

उनके यश गाया करता हूं।

पूजे न शहीद गए तो फिर, यह पंथ कौन अपनाएगा?

तोपों के मुँह से कौन अकड़ अपनी छातियाँ अड़ाएगा?

चूमेगा फन्दे कौन, गोलियाँ कौन वक्ष पर खाएगा?

अपने हाथों अपने मस्तक फिर आगे कौन बढ़ाएगा?

पूजे न शहीद गए तो फिर आजादी कौन बचाएगा?

फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?

पूजे न शहीद गए तो फिर यह बीज कहाँ से आएगा?

धरती को माँ कह कर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा?

मैं चौराहे—चौराहे पर

ये प्रश्न उठाया करता हूं।

मैं अमर शहीदों का चारण

उनके यश गाया करता हूं।

जो कर्ज ने खाया है, मैं चुकाया करता हूं।

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