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गले पडूं आंदोलन शुरू: सिद्धू की झप्पी पर ठोको ताली

देश अभी अजब-गजब दौर से गुजर रहा है। राजनीति में प्रारम्भ हुआ गले मिलने या कहें गले पड़ने का दौर अब वैश्विक रूप ले चुका है। उन्हीं की पार्टी के शीर्ष नेता ने हाल ही में गले पड़ने की परंपरा को प्रारम्भ किया था इसी क्रम में वे अपने शीर्ष नेतृत्व के प्रति कृतज्ञ भाव से इस गले पडूं आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जा पहुंचे हैं।

गले पडूं आंदोलन शुरू: सिद्धू की झप्पी पर ठोको ताली

देश अभी अजब-गजब दौर से गुजर रहा है। राजनीति में प्रारम्भ हुआ गले मिलने या कहें गले पड़ने का दौर अब वैश्विक रूप ले चुका है। उन्हीं की पार्टी के शीर्ष नेता ने हाल ही में गले पड़ने की परंपरा को प्रारम्भ किया था इसी क्रम में वे अपने शीर्ष नेतृत्व के प्रति कृतज्ञ भाव से इस गले पडूं आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जा पहुंचे हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरत मिलाप वे कर तो आये हैं, लेकिन उनकी इस झप्पी पर ताली न ठुक सकती। देश गम के दौर से गुजर रहा है, आंखें नम हैं और इन सब में वे खबरों को डाइवर्ट करने का काम कर आए हैं। जिन्होंने उन्हें जीताने के लिए कभी उनके क्षेत्र में सभा की थी किन्तु अब जब उन्हीं की शोकसभा हो रही थी तब उनके द्वारा ही विजयी कराए गए उम्मीदवाद ही वहां नही थे।

राजनीति में दल क्या बदले, मन बदल गए। वे जब थे तो कहते थे कि मूर्ख नही महान झुकता है, लेकिन अब समय तो देखा होता कि यह पंक्ति कहने वाला ही दुनिया छोड़ चुका हैं तो देश पहले के भाव जगाए होते! हर बात में शायरी से झांकी जमाई नही जाती और हर कही बात पर ताली भी नहीं ठुकती। उनका वो दोस्त तो कल भी वही होगा और वो मुल्क भी वही,

लेकिन जिनकी अंगुली को कभी थामा था वे अब न रहे। राजनीति में जब विचार बदलते हैं तो इस हद तक बदल जाते हैं। आज वे जहां है कल वे उन लोगों को खरी खोटी कहते न थकते थे लेकिन अब वे कल जहां थे उन लोगो को खरी-खोटी कहते हैं। उनकी गेंद पाला बदल चुकी है। देश के अंदर तो सब चल जाता है, लेकिन उनका यह गले मिलना गले में फांस की तरह चुभ रहा है।

पड़ोसी मुल्क से बरसते गोलों से हमारे देश वासियों के आशियाने उजड़ जाते हैं, उनकी गोलियां कितने जवानों को शहीद कर जाती हैं, कितने बच्चे अनाथ और मेहंदी वाले हाथों की चूड़ियां उतर जाती हैं, लेकिन वे इन सब के बाद भी ऐसो से गले मिलकर आते हैं! पद पर रहते एक नेता का जीवन कभी व्यक्तिगत नहीं होता।

जाने को तो वजीर-ए-आजम के ओर भी दोस्त थे इस भारत भूमि में, लेकिन वे तो ना गए। आपने ही महानता का ताज पहनना था। तो दे दिया होता इस्तीफा और आराम से बिताते कुछ दिन वहीं अपने दोस्त के साथ! काश! तिरंगे में लिपट कर घर आए उन जवानों को तो याद किया होता।

आप वहां बैठे मुस्कुरा रहे थे और यह देश शोक मना रहा था अपने एक नेता को खोने का। मुस्कुराने और ताली ठोकने से ही सब हो जाता तो भारत की विदेश नीति में इसे कूटनीति के रूप में कब से शामिल कर लिया जाता किन्तु ऐसा नहीं है।

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