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नोटबंदी: 5 दिन में कोऑपरेटिव बैंक में 9 हजार करोड़ जमा

सहकारी बैंकों में सिर्फ पांच दिनों के अंदर 9000 करोड़ की रकम जमा हो गई थी।

नोटबंदी: 5 दिन में कोऑपरेटिव बैंक में 9 हजार करोड़ जमा
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नई दिल्ली. देश में नोटंबदी के बाद बैंकों में अंधाधुन पैसा जमा हो रहा है। लेकिक देश के जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (कोऑपरेटिव बैंक) में सिर्फ पांच दिनों के अंदर 9 हजार करोड़ की रकम जम हो गई थी। यह पैसा देश के अलग-अलग 17 राज्यों की ब्रांचों में हुआ। बता दें कि ये पैसा 10 से 15 नवंबर के बीच जमा हुआ था।
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, आंकड़ों बताते है कि नोटबंदी के बाद 5 दिनों के अंदर ही देश भर के जिला सहकारी बैंकों (डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक्स) के पास 9 हजार करोड़ रुपये जमा हुए। नवंबर से नोटबंदी की शुरुआत हुई थी और नवंबर 10 से नवंबर 15 के बीच 17 राज्यों के जिला सहकारी बैंकों के 9 हजार करोड़ रुपये की धनराशि आई।
नुकसान और बड़ी मात्रा में नॉन परफॉर्मिंग असेट्स की समस्या से जूझ रहे सहकारी बैंकों के पास अचानक से 147 करोड़ (पुरानी करंसी में) रुपए से ज्यादा जमा हुए। इसकी जानकारी मिलते ही सरकार ने इन बैंकों को 500 और 1000 के पुराने नोट स्वीकार करने से मना कर दिया गया। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ब्लैक मनी रखने वाले जिन लोगों की सहकारी बैंकों में अच्छी पहचान थी, उन्होंने बड़ी मात्रा में अपनी अघोषित संपत्ति को नए नोटों में बदलवा लिया।
एनएबीएआरडी के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर के जी कर्माकर ने बताया कि पिछले कई सालों से डीसीसीबी के खातों का प्रयोग राजनीतिक पार्टियों द्वारा किया जाता रहा है। कर्माकर के मुताबिक, पार्टियां किसानों के नाम पर अकाउंट खोलती हैं और उसे काले पैसे को सफेद करने के लिए इस्तेमाल करती हैं। कुछ अधिकारियों ने केरल का जिक्र खास तौर पर किया। क्योंकि केरल में खेती नाम मात्र को ही रह गई है लेकिन वहां की डीसीसीबी की ब्रांचों में 1,800 करोड़ रुपया जमा हुआ। वह भी उन्हीं पांच दिनों के अंदर। कुछ ऐसा ही पंजाब में हुआ।
वहां 20 से ज्यादा डीसीसीबी के खातों में पांच दिनों के अंदर 1268 करोड़ रुपए के पुराने नोट जमा हुए। महाराष्ट्र डीसीसीबी खातों में जमा रकम के मामले में तीसरे नंबर पर रहा। वहां 10 नवंबर से 15 नवंबर के बीच 1128 करोड़ रुपए जमा हो गए। महाराष्ट्र के किसानों की हालत तो ऐसी है कि वे लोन ना चुका पाने की वजह से खुद कीटनाशक खाकर जान देने को मजबूर हैं। ऐसे में साफ होता है कि DCCB खातों का उपयोग राजनीतिक पार्टियों और बड़े लोगों द्वारा किया जा रहा था।
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