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26 जनवरी पर भाषण 2019 : स्वामी विवेकानन्द का गणतंत्र दिवस पर भाषण

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की जब बात होती है तो फोकस अकसर राजनीतिक घटनाक्रम पर ही रहता है और जाने अनजाने में उन धार्मिक व सामाजिक आंदोलनों को नजरअंदाज कर दिया जाता है जिनकी वजह से न सिर्फ बहुत सी सामाजिक कुरीतियों पर विराम लगा बल्कि धर्मनिर्पेक्षता की नींव पड़ी, जो आज हमारे देश में भाईचारे व साम्प्रदायिक सौहार्द का आधार हैं।

26 जनवरी पर भाषण 2019 : स्वामी विवेकानन्द का गणतंत्र दिवस पर भाषण
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की जब बात होती है तो फोकस अकसर राजनीतिक घटनाक्रम पर ही रहता है और जाने अनजाने में उन धार्मिक व सामाजिक आंदोलनों को नजरअंदाज कर दिया जाता है जिनकी वजह से न सिर्फ बहुत सी सामाजिक कुरीतियों पर विराम लगा बल्कि धर्मनिर्पेक्षता की नींव पड़ी, जो आज हमारे देश में भाईचारे व साम्प्रदायिक सौहार्द का आधार हैं।
डाॅ. रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि राजा राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग को आरम्भ किया। यह निसंदेह सत्य है। धर्म, समाज सुधार, शिक्षा, न्याय, राष्ट्रीयता और राजनीति आदि भारतीय जीवन का कोई ऐसा भाग नहीं है जिस पर राजा राममोहन राय का प्रभाव न आया हो। भारतीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किसी न किसी प्रकार का उनका योगदान रहा।
चूंकि वे विभिन्न भाषाओं के ज्ञानी थे और कोई धर्म ऐसा न था जिसका उन्होंने गम्भीर अध्ययन न किया हो, इसलिए उन्होंने जो धर्म का मार्ग प्रशस्त किया वह मानवता व उदारता का प्रतीक है। कहने का अर्थ यह है कि आज जो सभी धर्मों में आवश्यक एकता पर बल दिया जाता है उसकी नींव राजा राममोहन राय ने ही रखी थी और फिर ब्रहम समाज, प्रार्थना समाज, जवान बंगाल आंदोलन, आर्य समाज आदि के रूप में उसे ईश्वरचंद विद्यासागर, केशव चंद्रसेन, स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द आदि जैसी महान विभूतियों ने आगे बढ़ाया।
स्वामी विवेकानन्द ने न केवल हिंदू धर्म को ही प्रेरणा प्रदान की बल्कि सम्पूर्ण संसार मंे धर्म और आध्यात्मवाद के महत्व को बढ़ाया। वे धर्म को ‘मनुष्य का देवता जो उसमें स्वतः ही है’ मानते थे। उनका कहना था कि धर्म वास्तव मंे आत्म ज्ञान है। मनुष्य अपनी प्राकृतिक पर अधिकार करके पूर्णता को प्राप्त करता है और उसी के द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। उनका कहना था, ‘‘धर्म न पुस्तकों में है, न बौद्धिक विकास में और न तर्क में। तर्क, सिद्धांत, पुस्तकें, धार्मिक क्रियाएं केवल धर्म के सहायक हैं। धर्म आत्मज्ञान में है।’’
स्वामी विवेकानन्द ने धर्म को ‘जीवन का प्राकृतिक और स्वभाविक अंग’ पुकारा। उन्होंने धर्म को स्वभाविक ही नहीं बताया बल्कि आवश्यक भी बताया, ‘‘पूर्णता की प्राप्ति, जो धर्म द्वारा ही सम्भव है, मनुष्य की एक स्वाभाविक प्रकृति है, इस कारण व्यक्ति धर्म से प्रथक नहीं हो सकता ..मेरा विश्वास है कि मेरा धार्मिक विचार मनुष्य के शरीर का एक भाग है जिसके कारण मनुष्य के लिए धर्म को अपने से प्रथक करना उस समय तक सम्भव नहीं है जब तक वह अपने मस्तिष्क और शरीर को ही अपने से अलग न कर दे और जब तक वह अपने विचार और जीवन को ही समाप्त न कर दे।’’
लेकिन स्वामी विवेकानन्द धर्म की आवश्यकता को उपयोगिता या धन की आवश्यकता के समान नहीं मानते थे। उनका कहना था कि एक व्यक्ति को क्या अधिकार है कि वह सत्य को जांचने का मापदंड उपयोगिता या धन को माने? अगर मान भी लिया जाये कि सत्य की कोई उपयोगिता नहीं है तो भी क्या सत्य कम सत्य हो जायेगा? उपयोगिता सत्यता को जांचने का मापदंड नहीं है। धर्म प्रत्येक व्यक्ति और समाज की एक ऐसी आवश्यकता है जो उसकी स्वाभाविक प्रकृति की पूर्ति के लिए आवश्यक है। एक राष्ट्र की प्रगति का मापदंड ही उसकी धार्मिक व आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति है।
कहने का अर्थ यह है कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और उस दौर के बुद्धिजीवियों ने न केवल अपने देशवासियों को बल्कि सभी राष्ट्रों को धार्मिक व आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित किया। इसी आधार पर वह पूरब और पश्चिम के विचारों में आदान प्रदान चाहते थे। भारत पश्चिम को आध्यात्मवाद प्रदान कर सकता था और स्वयं पश्चिम से भौतिक प्रगति की शिक्षा प्राप्त कर सकता था। दरअसल, जिस प्रकार भारत ने भौतिक प्रगति से पिछड़कर अपने समाज के संतुलन को खो दिया था उसी प्रकार पश्चिमी राष्ट्रों ने आध्यात्मवाद की प्रगति न करके अपने समाज के संतुलन को खो दिया था। समाज के संतुलन को बनाये रखने और सम्पूर्ण प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि भारत आध्यात्मवाद के साथ साथ भौतिक प्रगति करे और पश्चिमी राष्ट्र भौतिक प्रगति के साथ साथ आध्यात्मवाद की प्रगति करें।
जिस समय भारत अंगे्रजों की गुलामी से छुटकारा पाने का प्रयास कर रहा था, उसी समय समाजवाद और साम्यवाद जैसी नवीनतम विचारधाराएं भी दुनिया के सामने आ रही थीं। उस समय भी हमारे ध्ाार्मिक नेताओं का मानना था कि यह नई विचारधाराएं अपने लक्ष्य की पूर्ति में उस समय तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक वह अपना आध्ाार आध्यात्मवाद को नहीं बनाएंगी। हमारे विद्वानों की बात आज कितनी सफल हुई है कि समाजवाद व साम्यवाद ने अपना आधार आध्यात्मवाद को नहीं बनाया और इन विचारधाराओं का हाल आप सबके सामने है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि धर्म के नाम पर अपने देश का विभाजन भी हुआ, लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि धार्मिक व सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हमारे स्वतंत्रता सेनानी सभी धर्मों की एकता में विश्वास करते थे और उन्होंने धार्मिक उदारता, समानता और सहयोग पर बल दिया। यही कारण रहा कि भारत से अलग हुए पाकिस्तान ने यद्यपि धार्मिक संकीर्णता अपनायी, लेकिन भारत ने धार्मिक उदारता व समानता में अपना विश्वास कम नहीं किया और देश को ध्ार्मनिर्पेक्ष राज्य घोषित किया।
गौरतलब है कि स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो के धार्मिक सम्मेलन में अपने अंतिम भाषण में कहा था, ‘‘एक ईसाई को हिंदू या बौद्ध बनने की आवश्यकता नहीं है और एक हिंदू या बौद्ध को ईसाई बनने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रत्येक को एक दूसरे की सत्य की भावना को समझना चाहिए और अपने प्रथक व्यक्तित्व की रक्षा करते हुए अपनी स्वयं की प्रगति के कानून के द्वारा अपना विकास करना चाहिए। सहायता करो, लडो नहीं, एक दूसरे से ग्रहण करो, विनाश नहीं, मेल और शांति, मतभेद नहीं।’’
इसमें कोई शक नहीं है कि धर्म के मूल लक्ष्य के विषय में सभी ध्ार्मों में एकता है। सभी धर्मों का लक्ष्य मनुष्य को प्रकृति के आधिपत्य से मुक्त करना है। धार्मिक झगड़ों का मूल कारण बाहरी चीजों पर अधिक बल देना है। सिद्धांत, धार्मिक क्रियाएं, पुस्तकें, मंदिर, गिरजाघर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि जिनके विषय में मतभेद हैं, केवल साधनमात्र हैं। इस कारण इन पर अधिक बल नहीं देना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘आत्मा की भाषा एक है जबकि राष्ट्रों की भाषाएं विभिन्न है, उनके रिवाज और जीवन के तरीकें पूरी तरह अलग अलग हैं।
धर्म आत्मा से संबंधित है, लेकिन वह विभिन्न राष्ट्रों, विभिन्न भाषाओं और विभिन्न रिवाजों के माध्यम से प्रकट होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि संसार के सभी धर्मों में मूल आधार पर एकता है, हालांकि उसके स्वरूप विभिन्न हैं।’’ आज आजादी के 68 वर्ष बाद स्वतंत्रता सेनानियों के अमूल्य विचारों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

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