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25 जून 1975 आपातकाल: जयप्रकाश नारायण ने इन्दिरा गांधी के नाम जेल से लिखा था ये खत

जयप्रकाश नारायण ने लिखा कि समाचार पत्रों में आपके भाषणों और साक्षात्कारों की रपट पढ़कर मैं विस्मित हूं (आपने जो कुछ किया है, उसका औचित्य सिद्ध करने के लिए आपको हर रोज कुछ न कुछ कहना पड़ता है। यही आपके अपराधी मानस का परिचायक है)।

25 जून 1975 आपातकाल: जयप्रकाश नारायण ने इन्दिरा गांधी के नाम जेल से लिखा था ये खत

इमरजेंसी के दौरान जिस तरह से नागरिकों के अधिकार का हनन किया गया, उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इतनी बड़ी संख्या में हुई गिरफ्तारियां 1942 में भारत छोड़ों आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश अत्याचारों की याद दिलाती थीं। जेपी की बहादुरी के कारनामों ने उन्हें राष्ट्र नायक बना दिया था।

विपक्ष के बतौर चुनौती देने वाले हर व्यक्ति को आन्तरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के अन्तर्गत गिरफ्तार कर लिया गया था। आरएसएस के लोग इसके खास निशाने पर थे। यह पूरा अभियान प्रधानमंत्री आवास पर संजय गांधी, इन्दिरा गांधी के विश्वासपात्र, गृह मंत्रालय के गृहराज्यमंत्री ओम मेहता और उनके निजी सचिव आरके धवन की देख रेख में संचालित हो रहा था।

उसी रात आपातकाल लागू करने के आदेश पर हस्ताक्षर करने से पहले राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने भी कोई प्रश्न नहीं पूछा। हिरासत में लिये जाने से पहले जेपी को संस्कृत की एक उक्ति उद्धत करते पाया गया- विनाश काले विपरीत बुद्धि। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, वे यह सोचकर बुरी तरह परेशान होते थे कि उन्होंने इंदिरा गांधी की प्रतिक्रियाओं का गलत अनुमान कैसे लगा लिया था।

इस टकराव का उन्होंने अपनी डायरी में जीवन्त वर्णन किया है। कैद में चार सप्ताह गुजारने के बाद उन्होंने 21 जुलाई से डायरी लिखनी शुरू की थी। उसी दिन प्रधानमंत्री के नाम लिखे उनके पत्र में पश्चाताप का कोई नामो-निशान नहीं था। यह औपचारिक रूप से उन्हें ही संबोधित था।

प्रिय प्रधानमंत्री,

समाचार पत्रों में आपके भाषणों और साक्षात्कारों की रपट पढ़कर मैं विस्मित हूं (आपने जो कुछ किया है, उसका औचित्य सिद्ध करने के लिए आपको हर रोज कुछ न कुछ कहना पड़ता है। यही आपके अपराधी मानस का परिचायक है)। समाचार पत्रों का मुंह बन्द कर तथा हर प्रकार की मतभिन्नता पर रोक लगाकर और इस प्रकार आलोचना के भय से सर्वथा मुक्त होकर आप विकृत तथ्यों एवं झूठी बातों का प्रचार कर रही हैं। अगर आप सोचती हैं कि ऐसा करके आप जनता की नजर में खुद को सही साबित कर सकेंगी और विपक्ष को राजनीतिक दृष्टि से खत्म कर सकेंगी, तो आप भारी मुगालते मे हैं। यदि आपको कोई संदेह हो तो आपातकाल समाप्त कर, जनता को मौलिक अधिकार और समाचार पत्रों को उनकी आजादी वापस देकर देख लीजिए। और जिन लोगों को आपने बिना किसी अपराध के....क्योंकि उन्होंने अपने देशभक्ति के कर्तव्य को पूरा करने के अलावा कोई अपराध नहीं किया है...बन्दी बना रखा है, उनको रिहा करके इसकी परीक्षा कर लीजिए। नौ साल का समय कम नहीं होता मैडम! जनता की छठी इन्द्रिय शक्ति ने आपको पहचान लिया है....। चूंकि मुख्य अपराधी मैं ही हूं, इसलिए मैं पूरी बात को स्पष्ट करना चाहूंगा। इसमें संभवतः आपकी कोई रूचि नहीं होगी, क्योंकि आपने तो जानबूझकर विकृत तथ्यों और झूठी बातों का प्रचार किया है। परन्तु जो सच है, वह तो लिपिबद्ध हो जाए.... आपके शासन में एक बन्दी के रूप में मैं भी सन्तोषपूर्वक मरूँगा। - जयप्रकाश नारायण

इमरजेंसी में देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले महान नेता जयप्रकाश नारायण को बीमारी की हालत में जिस तरह से जेल में तनहाई में रखा गया उससे कांग्रेसी सरकार की क्रूरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। गांधी जी के समान वे भी दुर्बल शरीर के थे और गांधी जी की भांति उन्होंने पाप की शक्तियों पर बड़े शानदार ढंग से पुण्य की शक्तियों को विजय दिलायी।

उन्होंने उदासीनता और अकर्मण्यता की नींद में सोये देशवासियों को झकझोरकर जगाया। इमरजेंसी के निडर विरोधियों में जयप्रकाश के बाद रामनाथ गोयनका का नम्बर आता है। उस दौरान बहुत से समाचार पत्रों ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था। सिर्फ दो राष्ट्रीय पत्रों- इंडियन एक्सप्रेस एवं स्टेट्समैन ने झुकने से इनकार कर दिया था।

रामनाथ जी ने एक हठी और प्रबल व्यक्ति के रूप में आजादी की मशाल को हाथों में थामे रखा, हालांकि अपनी इस जिद की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। सरकार ने सैकड़ों फौजदारी के मुकदमें दायर किये। पर उन्होंने डटकर इन हमलों का मुकाबला किया। सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस एचआर खन्ना एकमात्र न्यायाधीश थे जिन्होंने बहुमत के साथ सहमति नहीं जताई और कहा कि किसी भी नागरिक के मूलभूत अधिकारों को स्थगित नहीं किया जा सकता। इमरजेंसी की 43वीं वर्षगांठ पर देश ऐसे लोगों को नमन करता है।

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