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सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण: ऐसे समझें मोदी सरकार का पूरा गणित

गरीब सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण देने की दिशा में सरकार दो कदम आगे बढ़ चुकी है। लोकसभा में आरक्षण देने के लिए लाए गए संविधान संशोधन बिल के दो तिहाई बहुमत से पास होने के बाद इसके राज्यसभा में अटकने की संभावना थी, लेकिन राजनीतिक मुद्दा होने के चलते इस बिल ने उच्च सदन की बाधा भी पार कर ली।

सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण: ऐसे समझें मोदी सरकार का पूरा गणित

गरीब सामान्य वर्ग को सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण देने की दिशा में सरकार दो कदम आगे बढ़ चुकी है। लोकसभा में आरक्षण देने के लिए लाए गए संविधान संशोधन बिल के दो तिहाई बहुमत से पास होने के बाद इसके राज्यसभा में अटकने की संभावना थी, लेकिन राजनीतिक मुद्दा होने के चलते इस बिल ने उच्च सदन की बाधा भी पार कर ली।

आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण के प्रावधान से सामाजिक तनाव कम होगा। आरक्षण को लेकर गैर आरक्षित सभी वर्गों में व्यापक सामाजिक असंतोष था। जातिगत आरक्षण के चलते समाज में बड़ा विभाजन देखने को मिलता था।

इस नए कोटे को आरक्षण व्यवस्था को तर्कसंगत बनाने की दिशा में कदम माना जाना चाहिए। बेशक सवर्ण आरक्षण को आम चुनाव व अगड़ी राजनीति से जोड़ कर देखा जा रहा हो, लेकिन देश में एक बड़ा गैर-आरक्षित वर्ग है, जो लगातार आर्थिक रूप से पिछड़ता जा रहा है और उनमें पिछड़ेपन को लेकर असंतोष बढ़ रहा है।

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सरकार को इनकी पीड़ा को देखना जरूरी था। गैर-आरक्षित गरीबों के लिए कोटे की मांग लंबे समय से की जा रही थी। सवर्ण हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, सिख, ईसाई, पारसी, जैन आदि समुदाय के गरीबों को आगे लाने के लिए आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। यूं तो संविधान में केवल दस वर्ष के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए 22.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

इसे खत्म करने के बजाय जातिगत आरक्षण राजनीतिक मुद्दा बन गया। उसकी समयावधि बढ़ती ही चली गई। मंडल आंदोलन के बाद इसमें 27 फीसदी ओबीसी कोटा और जुड़ गया। इसके बाद गैर-आरक्षित वर्ग के गरीबों में असंतोष गहराता गया और सामाजिक खाई बढ़ती गई। इस खाई को पाटने के लिए ही वर्तमान सरकार 10 फीसदी कोटा लेकर आई है। अब सामाजिक वैमनस्यता नहीं बढ़ेगी।

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हालांकि नए आरक्षण के लिए पात्रता के प्रावधानों पर फिर से विचार किया जाना चाहिए। आठ लाख आय की सीमा अधिक है। इसे 3 लाख तक लाया जाना चाहिए। लोकसभा और राज्यसभा में इस संशोधन बिल पर बहस के दौरान अधिकांश सांसदों ने इस ओर सरकार का ध्यान दिलाया है। आय की सीमा आयकर छूट की सीमा के सामान्तर होनी चाहिए या फिर कर छूट सीमा को आठ लाख हो।

सरकार की जो गरीबी रेखा की सीमा है, उसी रेखा के नीचे आने वाले गरीबों को आरक्षण के दायरे में लाया जाना चाहिए। इस ओर सरकार विचार करे तो और अच्छा होगा। वरना सरकार के इस फैसले को राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा। इस पैमाने को 27 फीसदी ओबीसी कोटे के क्रीमीलेयर की परिभाषा में भी लागू करना चाहिए।

सरकार अगर मानती है कि आरक्षण गरीबी कम करने में मददगार है, तो आज इसे अधिक से अधिक तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। हमें जातिगत आरक्षण के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण की दिशा में बढ़ना चाहिए। इसके लिए सरकार को मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की तार्किक समीक्षा करनी चाहिए।

यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल जरूरतमंदों को ही आरक्षण का लाभ मिले। इसे सामाजिक न्याय का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। देश में अब तक बहुत अन्य कानून बन चुके हैं, जिसके मार्फत सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया गया है। जातिगत आधार पर आरक्षण की व्यवस्था जारी रखने से देश कभी भी जातिवाद से मुक्त नहीं हो सकेगा। 21वीं सदी में जाति व्यवस्था मानवता पर कलंक ही है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था लाने से इसका असल मकसद पूरा होगा। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 27 से 30 करोड़ लोग गरीब हैं। कुछ आंकड़ों में 47 फीसदी लोग गरीब हैं। इनमें सभी वर्ग के लोग आते हैं। इन्हें आरक्षण के दायरे में लाया जाना चाहिए। गरीबों की पहचान के लिए फ्रेश सर्वेक्षण भी कराया जा सकता है।

देश में जितने प्रतिशत गरीब हों, आर्थिक आधार पर उतने प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए। चाहे प्रतिशत 30 हो या 47 या कुछ और। इससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश- 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं हो, की पालना भी होती रहेगी और सामाजिक विभाजन भी खत्म होगा। बहरहाल, 10 फीसदी कोटे पर सर्वसम्मति बनने से समावेशी विकास को और गति मिलेगी।

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