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घाटी में पत्थरबाजों से निपटेगा ये देसी हथियार

मध्यप्रदेश के युवाओं ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वे इस पारंपरिक हथियार का इस्तेमाल करें, इस पर नहीं किसी तरह का कानूनी बंधन नहीं हैं।

घाटी में पत्थरबाजों से निपटेगा ये देसी हथियार
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जम्मू-कश्मीर में सेना के जवानों पर आए दिन पथराव के मद्देनजर मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले के युवाओं ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वे इन पत्थरबाजों पर पैलेट गन की जगह आदिवासियों के पारंपरिक हथियार ‘गोफन' का इस्तेमाल करें।

गोफन आदिवासियों का एक पारंपरिक हथियार है, जो नायलोन, सूत और सन की रस्सी से बनता है। इसकी लंबाई लगभग पांच फुट होती है। इसे ग्रामीण अपनी पगड़ी के ऊपर और कमर में बांधते हैं। इसका उपयोग खेतों में लगी फसलों को पक्षियों से बचाने के लिए करते हैं।

गोफन से चलाया गया पत्थर 300 से 500 मीटर की दूरी तक जाता है। कानूनी तौर पर गोफन पर कोई प्रतिबंध भी नहीं है।

बटालियन बनी तो पत्थर का जवाब पत्थर से देंगे

लखपुरा गांव के रहने वाले युवा प्रेम सिंह डामोर 26 ने आज कहा, ‘कश्मीर में पत्थरबाजों से निपटने के लिए सरकार को आदिवासी युवाओं की बटालियन बनाना चाहिए, जो पत्थरबाजों को मुंहतोड़ जवाब दे सके।

इससे आदिवासी युवाओं को देश सेवा के साथ ही गर्व महसूस होगा।' पूर्व विधायक जैवियर मेडा ने कहा, ‘इसके लिए एक बटालियन बनना चाहिए, जो गोफन पत्थरबाज के नाम से पहचानी जाए। इससे आदिवासी युवाओं को रोजागर मिलेगा।

इसके लिए सरकार को गोफन से अच्छे पत्थर चलाने वाले युवाओं की भर्ती करनी चाहिए, क्योंकि कश्मीर में पत्थरबाजों से निपटने और अपनी सुरक्षा के लिए सेना, गोली तो चला नहीं सकती, पर गोफन बटालियन हुडदंगियों का मुकाबला भी कर सकती है और पत्थर का जवाब पत्थर से दे सकते हैं।'

हमला सही नहीं: भाजपा

भाजपा विधायक शांतिलाल बिलवाल ने कहा, ‘जो सैनिक अपना घर बार छोड़कर देश की सुरक्षा में लगे हैं, उन पर पत्थरबाजों का हमला सही नहीं है। कानूनी प्रतिबंध के कारण सैनिक अपनी सुरक्षा के कारण बंदूक नहीं चला सकते।

इसके लिए सरकार को यहां के युवा आदिवासियों की बटालियन बनाना चाहिए, ताकि वे कश्मीर में पत्थरबाजों से निपट सकें।'

अहिंसा से लें काम: कांग्रेस

कांग्रेस नेता विक्रांत भूरिया ने कहा, ‘हम प्रगति कर रहे हैं। कश्मीर के युवाओं कोपाकिस्तान द्वारा गलत मार्ग पर जाने के लिए बहकाया जा रहा है। हमें ईंट का जवाब पत्थर से देने की बजाय अहिंसा की बात करनी चाहिए। हम चाहते हैं कि आदिवासी युवा पढे-लिखें।'

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