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मोहब्बत की याद में यहां खेला जाता है खूनी खेल, दो गांव के लोग बरसाएंगे एक दूसरे पर पत्थर

मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा पर बसे पांढुर्णा के गोटमार मेला आज सुबह मां चंडी की पूजा अर्चना के बाद शुरू हो गया। जाम नदी के बीच एक तरफ सावरगांव तो दूसरी तरफ पांढुर्णा है दोनों पक्ष परंपरा निभाने के नाम पर आज पत्थर मार खेल खेलेंगे

मोहब्बत की याद में यहां खेला जाता है खूनी खेल, दो गांव के लोग बरसाएंगे एक दूसरे पर पत्थर
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छिंदवाड़ा। मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा पर बसे पांढुर्णा के गोटमार मेला आज सुबह मां चंडी की पूजा अर्चना के बाद शुरू हो गया। छिंदवाड़ा प्रेमी प्रेमिका की याद में हर वर्ष भादो मास के कृष्ण पक्ष में अमावस्या पोला त्योहार के दूसरे दिन पांढुर्णा और सावरगांव के बीच बहने वाली जाम नदी में वृक्ष की स्थापना कर पूजा अर्चना कर नदी के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक पत्थर मारकर एक-दूसरे का लहू बहाते हैं। इस घटना में कई लोग घायल हो जाते हैं।


जाम नदी के बीच एक तरफ सावरगांव तो दूसरी तरफ पांढुर्णा है दोनों पक्ष परंपरा निभाने के नाम पर आज पत्थर मार खेल खेलेंगे। पुलिस प्रशासन इस इलाके को पूरी तरीके से घेर लिया है जिससे कि आम आदमी को चोट न पहुंचे मां चंडी की पूजा के बाद या खेल आरंभ होगा नदी के बीचों-बीच पलाश का एक झाड़ काटकर लगा दिया जाता है और उसमें झंडा लगा होता है। जो पक्ष झंडा तोड़ लेता है वह अजीता माना जाता है। बड़ी संख्या में इस पत्थरबाजी में लोग घायल होते हैं पुलिस प्रशासन ने कोशिश की है कि आसपास से पत्थर हटा लिए जाएं आज देखना बाकी है कि कितने लोग घायल होते हैं हमारे जाते हैं

गोटमार से पहले होती है ध्वज स्थापना

पलाश के वृक्ष के झंडे की स्थापना हो चुकी है। पूजा-अर्चना के बाद मन्नतों का दौर चल रहा है। दो पक्षों के बीच एक दूसरे पर पत्थर बरसाने का सिलसिला शुरू होकर दिन भर चलेगा और लगभग शाम 6 बजे पलाश के वृक्ष के झंडे को पांढुर्णा पक्ष के लोग काटकर माँ चण्डिका के मंदिर मे अर्पण कर गोटमार मेले को खत्म करेंगे। इस दौरान सैकड़ों लोग पत्थरबाजी के चलते घायल भी होंगे।


दिन भर होती है एक-दूसरे पर पत्थरों की बारिश

ढोल ढमाकों के बीच लगाओ-लगाओ के नारों के साथ कभी पांर्ढुना के खिलाड़ी आगे बढ़ते हैं तो कभी सावरगांव के खिलाड़ी। दोनों एक-दूसरे पर पत्थर मारकर पीछे ढकेलने का प्रयास करते है और यह क्रम लगातार चलता रहता है। दर्शकों का मजा दोपहर बाद 3 से 4 के बीच बढ़ जाता है। खिलाड़ी चमचमाती तेज धार वाली कुल्हाड़ी लेकर झंडे को तोड़ने के लिए उसके पास पहुंचने की कोशिश करते हैं। ये लोग जैसे ही झंडे के पास पहुंचते हैं साबरगांव के खिलाड़ी उन पर पत्थरों की बारिश कर देते हैं और पांढुर्णा वालों को पीछे हटा देते हैं।

शाम को पांर्ढुना पक्ष के खिलाड़ी पूरी ताकत के साथ चंडी माता का जयघोष एवं भगाओ-भगाओ के साथ सावरगांव के पक्ष के व्यक्तियों को पीछे ढकेल देते है और झंडा तोड़ने वाले खिलाड़ी, झंडे को कुल्हाडी से काट लेते हैं। जैसे ही झंडा टूट जाता है, दोनों पक्ष पत्थर मारना बंद करके मेल-मिलाप करते हैं और गाजे बाजे के साथ चंडी माता के मंदिर में झंडे को ले जाते है।

झंडा न तोड़ पाने की स्थिति में शाम साढ़े छह बजे प्रशासन द्वारा आपस में समझौता कराकर गोटमार बंद कराया जाता है। पत्थरबाजी की इस परंपरा के दौरान जो लोग घायल होते है, उनका शिविरों में उपचार किया जाता है और गंभीर मरीजों को नागपुर भेजा जाता है।


300 साल पुरानी परंपरा के पीछे की कहानी

इस मेले के संबंध में कई प्रकार की किवंदतियां हैं। इन किवंदतियों में सबसे प्रचलित और आम किवंदती यह है कि सावरगांव की एक आदिवासी कन्या का पांढुर्णा के किसी लड़के से प्रेम हो गया था। दोनों ने चोरी छिपे प्रेम विवाह कर लिया। पांढुर्णा का लड़का साथियों के साथ सावरगांव जाकर लड़की को भगाकर अपने साथ ले जा रहा था। उस समय जाम नदी पर पुल नहीं था।

नदी में गर्दन भर पानी रहता था, जिसे तैरकर या किसी की पीठ पर बैठकर पार किया जा सकता था और जब लड़का, लड़की को लेकर नदी से जा रहा था तब सावरगांव के लोगों को पता चला और उन्होंने लड़के व उसके साथियों पर पत्थरों से हमला शुरू किया। जानकारी मिलने पर पहुंचे पांढुर्णा पक्ष के लोगों ने भी जवाब में पथराव शुरू कर दी। पांर्ढुना और सावरगां के बीच इस पत्थरों की बौछारों से इन दोनों प्रेमियों की मृत्यु जाम नदी के बीच ही हो गई।

दोनों प्रेमियों की मृत्यु के पश्चात दोनों पक्षों के लोगों को अपनी शर्मिंदगी का एहसास हुआ और दोनों प्रेमियों के शवों को उठाकर किले पर माँ चंडिका के दरबार में ले जाकर रखा और पूजा-अर्चना करने के बाद दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। संभवतः इसी घटना की याद में माँ चंडिका की पूजा-अर्चना कर गोटमार मेले का आयोजन किया जाता है।

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