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शारदीय नवरात्रि महोत्सव : उज्जैन का प्रसिद्ध हरसिद्धि मंदिर जहां राजा विक्रमादित्य ने 11 बार दी थी अपने सिर की बलि

देशभर के 52 शक्तिपीठों में से एक उज्जैन की मां हरसिद्धी मंदिर में मंगल आरती के साथ शारदीय नवरात्री पर्व का शुभांरभ हो गया। आस्था के इस मंदिर में पंडितों ने सुबह मां का श्रृंगार किया। जिसके बाद ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ मां हरसिद्धी की आराधना की गई।

शारदीय नवरात्रि महोत्सव : उज्जैन का प्रसिद्ध हरसिद्धि मंदिर जहां राजा विक्रमादित्य ने 11 बार दी थी अपने सिर की बलि
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राहुल यादव/उज्जैन। देशभर के 52 शक्तिपीठों में से एक उज्जैन की मां हरसिद्धी मंदिर में मंगल आरती के साथ शारदीय नवरात्री पर्व का शुभांरभ हो गया। आस्था के इस मंदिर में पंडितों ने सुबह मां का श्रृंगार किया। जिसके बाद ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ मां हरसिद्धी की आराधना की गई। आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। श्रद्धालु अब 9 दिनों तक मां की भक्ति में श्रद्धालू डूबे रहेंगे। देवी आराधना का पर्व नवरात्रि महोत्सव आज रविवार से शुरू हो गया। अब नौ दिनों तक नगर के देवी मंदिरों में दर्शनार्थियों का तांता लगेगा और गरबों की धूम रहेगी। वैसे तो मां के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन नवरात्रि में उज्जैन के रुद्रसागर और महाकाल मंदिर के पीछे स्थित देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक मां हरसिद्धी मंदिर में बड़ी संख्या में भक्त अपने मन की मुराद लिए मां से आशिर्वाद लेने के लिए आते है।


आज सुबह 6 बजे मां हरसिद्धी मंदिर में मंगल आरती के साथ शारदीय नवरात्रि पर्व का शुभारंभ हुआ। मां हरसिद्धी का अभिषेक कर आकर्षक श्रृंगार किया गया। जिसके बाद शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की गई। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आरती में भाग लिया। अब नवरात्रि के नौ दिनों तक मंदिर पर भक्तों का सैलाब उमड़ेगा। 9 दिनों तक मंदिर पर दीपमालाएं प्रज्जवलित रहेगी। भगवान महाकाल के विराजित होने से उज्जैन के हरसिद्धी मंदिर का महत्व बढ़ जाता है। माना जाता है कि यहां पर मां सती की कोहनी गिरी थी। जिससे इस स्थान को देश के शक्तिपीठों में से एक स्थान माना जाता है। भगवान शिव में मां को हरसिद्धी नाम दिया हैए हरसिद्धी मतलब हर काम को सिद्ध करने वाली।


विक्रमादित्य के सिंदूर चढ़े सिर

कहा जाता है कि देवीजी सम्राट विक्रमादित्य की आराध्या रही हैं। इस स्थान पर विक्रम ने अनेक वर्षपर्यंत तप किया है। परमारवंशीय राजाओं की तो कुल.पूज्या ही हैं। मंदिर के पीछे एक कोने में कुछ श्सिरश् सिन्दूर चढ़े हुए रखे हैं। ये श्विक्रमादित्य के सिरश् बतलाए जाते हैं। विक्रम ने देवी की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए 11 बार अपने हाथों से अपने मस्तक की बलि की, पर बार-बार सिर आ जाता था। 12वीं बार सिर नहीं आया। यहां शासन संपूर्ण हो गया। इस तरह की पूजा प्रति 12 वर्ष में एक बार की जाती थी। वैसे तो 144 वर्ष शासन होता है, किंतु विक्रम का शासनकाल 135 वर्ष माना जाता है। यह देवी वैष्णवी हैं तथा यहां पूजा में बलि नहीं चढ़ाई जाती।


यहीं गिरा था मां सती के कोहनी का टुकड़ा

मां हरसिद्धी के प्राचीन महत्व की बात की जाए तो कथा के अनुसार सती के पिता प्रजापति दक्ष ने शिव का अपमान करने के लिए यज्ञ किया था। दक्ष प्रजापति ने यज्ञ में शिव को छोड़कर ब्रम्हा-विष्णु सहित सभी देवी-देवताओं को न्यौता दिया था। शिव पत्नी माता सती इस अपमान को सह नहीं पाई और पिता के उस यज्ञ में ही अपने शरीर की आहुति दे दी। जिससे क्रोधित शिव यज्ञ का नाश होकर सति का जलता हुआ शरीर पूरे ब्रम्हाण में घूमने लगा। शिव की दशा देख भगवान विष्णु ने सती के शरीर के 51 टूकडे़ किए। जो जहां गिरे वहां सिद्ध शक्तिपीठ बन गया। ऐसे में सती की कोहनी का एक टूकड़ा उज्जैन में गिरा था। जिसके बाद यह हरसिद्धी नामक शक्तिपीठ बन गया। ऐसा बताया जाता है कि मां हरसिद्धी सम्राट राजा विक्रमादित्य की कूलदेवी भी थीं।


स्कन्दपुराण के 426 पृष्ठ के तांत्रिक ग्रंथ के तृतीय खंड के अनुसार इसे हरसिद्धी कहा गया है। मंदिर के गर्भगृह की शिला पर श्रीयंत्र उत्कीर्ण है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां पर तीनों देवियां एक साथ विराजित है। सबसे ऊपर लक्ष्मी, बीच में हरसिद्धी और नीचे सरस्वती विराजित है। यहां वर्षो से अखंड ज्योत विद्यमान है। जो सदा जलती रहती है। उज्जैन में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल होने के साथ तांत्रिक क्रियाओं का गढ़ रहा है। ऐसे में हरसिद्धी शक्तिपीठ होने से देश भर से तांत्रिक अधोरी नवरात्री में यहां पर तंत्र क्रिया करते है।

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