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चार दशक पहले तीन तलाक के खिलाफ इंदौर की शाहबानो ने फूंका था बिगुल, अब मिला न्याय, जानिए क्या था मामला

तीन तलाक बिल 2019 (महिला अधिकार संरक्षण कानून) पर संसद के दोनों सदनों की मुहर लग चुकी है। अब राष्ट्रपति की मुहर लगते ही यह कानून प्रभावी हो जाएगा। इसके बादअपनी पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहना अपराध होगा और आरोपी को तीन साल तक कैद और जुर्माना भुगतना पड़ सकता है।

चार दशक पहले तीन तलाक के खिलाफ इंदौर की शाहबानो ने फूंका था बिगुल
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Madhya Pradesh News : Know historical aspects of triple talaq and Shahbano

इंदौर। तीन तलाक बिल 2019 (महिला अधिकार संरक्षण कानून) पर संसद के दोनों सदनों की मुहर लग चुकी है। अब राष्ट्रपति की मुहर लगते ही यह कानून प्रभावी हो जाएगा। इसके बाद अपनी पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहना अपराध होगा और आरोपी को तीन साल तक कैद और जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। तीन तलाक बिल के राज्यसभा से पास होते ही इंदौर की शहबानो का मामला ताजा हो गया। शाहबानो वह पहली महिला थी जिन्होंने तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाया और सुप्रीम कोर्ट तक गई। तब कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया था। लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार ने सदन में विधेयक लाकर कोर्ट के आदेश को पलट दिया।

दरअसल 1978 में इंदौर निवासी शाहबानो को उसके पति मोहम्मद खान ने तलाक दे दिया था। पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो का अकेले गुजारा करना मुश्किल था। बच्चों और अपनी जीविका का कोई साधन न होने से पति से गुजारा लेने के लिए शाह बानो अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल लग गए। 23 अप्रैल 1985 को पांच जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि पति को गुज़ारा भत्ता देना ही होगा। कोर्ट न अपराध दंड संहिता की धारा 125 के अंतर्गत निर्णय दिया जो हर किसी पर लागू होता है चाहे वो किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो।

तब सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को लेकर बवाल मच गया। मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इसका पूरजोर विरोध किया। जिसके बाद केंद्र सरकार दवाब में आ गई। तब देश में कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। उस वक्त सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) अधिनियम, (1986) पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। राजीव गांधी सरकार के इस फैसले के खिलाफ तत्कालीन गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद शाहबानो जीतकर भी हार गई थी। आज जब 33 साल बाद तीन तलाक बिल पास हुआ है, शहबानो तो आज जिंदा नहीं है। जानकारी मुताबिक पति से तलाक के बाद शाहबानो की सेहत बिगड़ने लगी थी। साल 1992 में ब्रेन हैमरेज से शाहबानो की मौत हो गई। लेकिन शाहबानो की तरह करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को 3 तलाक से आजादी मिल गई है।

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