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21वीं सदी में भी दो गांव ऐसे जहां ने बिजली है न पानी, वनवासियों की जिंदगी जीने मजबूर ग्रामीण Watch Video

आधुनिक भारत में जब हमारी सरकारें डिजिटल इंडिया बनाने की बात कर रहे हैं ऐसे में एक गांव की हकीकत जानकर यह बातें महज ढकोसला साबित हो रही।

21वीं सदी में भी दो गांव ऐसे जहां ने बिजली है न पानी, वनवासियों की जिंदगी जीने मजबूर ग्रामीण Watch Video
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आधुनिक भारत में जब हमारी सरकारें डिजिटल इंडिया बनाने की बात कर रहे हैं ऐसे में एक गांव की हकीकत जानकर यह बातें महज ढकोसला साबित हो रही। डिजिटल इंडिया तो भूल जाइए इस गांव में आज तक शिक्षा की बुनियाद तक नहीं रखी गई।

आजादी के 71 साल के बाद भी यहां बिजली नहीं पहुंची, न ही पानी की कोई सुविधा है। यही नहीं मुख्य सड़क मार्ग से महज 500 मीटर की दूर इस गांव में पहुंच मार्ग तक नहीं बनाया गया, कई किलोमीटर की दूरी तक स्कूल तक नहीं हैं। जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के निवासी अशिक्षा का दंश झेल रहे हैं।

शासन की एक भी योजना का लाभ यहां के ग्रामीणों को आज तक नहीं मिली। जिंदा रहने के लिए लोग यहां से पलायन कर गए हैं। जो बचे हैं वह जंगली लकड़ी और महुआ बेचकर एक वक्त का खाना खाते हैं। प्रशासन के लिए बड़े शर्म की बात है कि यह गांव चित्रकूट नगर परिषद का एक वार्ड है। जहां के लोग 21वीं सदी में भी वनवासियों की तरह अपना जीवन जीने को मजबूर हैं।

सतना मुख्यालय से 60 किलोमीटर की दूरी पर चित्रकूट विधानसभा में भटोही और भमका गांव है। जहां आजादी के पहले से ही आदिवासी परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी निवास करते चले आ रहे हैं। यह सभी खेती और जंगल के भरोसे हमेशा ही रहे।


हैरत की बात तो यह है कि यह दोनों ही गांव चित्रकूट नगर परिषद के वार्ड नंबर 13 में आते हैं। मुख्य सड़क मार्ग से 500 मीटर पगडंडी के रास्ते जाने पर यह गांव दिखाई पड़ता है। देश आजाद हुए 71 साल से ज्यादा हो गया लेकिन यहां सड़क तक नहीं बनी न ही इन लोगों ने आज तक बिजली देखी।

शासन तो एक तरफ प्रकृति ने भी इनका साथ नहीं दिया तो इनके खेत बंजर होते चले गए। शिक्षा के नाम पर स्कूल की एक ईट तक यहां नहीं रखी गई आलम यह की पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के लोग अशिक्षा का दंश झेलते चले आ रहे हैं और आज भी नई पीढ़ी अशिक्षा की कगार पर आकर खड़ी है। कुछ गांव छोड़कर पलायन कर गए जो रह गए वह जिंदा रहने के लिए जंगल की लकड़ियां और महुआ शहर जाकर बेचते है और एक वक्त का खाना खाते हैं।

ऐसा नहीं है कि प्रशासन की नजर इन तक नहीं पहुंची वर्षों पहले यहां की पेयजल समस्या को हल करने का भी प्रयास प्रशासन ने किया। लेकिन वह प्रयास महज एक छलावा था 50 परिवारों के इस गांव में एक हैंडपंप लगाया गया।

जिसे 130 फुट गहरा बता कर महज 40 फुट ही बोर किया गया और हैंड पंप लगाकर इन्हें सौंप दिया गया। लेकिन हैंडपंप लगने के दिन से आज तक इस हैंड पंप ने एक बूंद भी पानी इस गांव के लोगों को नहीं दिया। गांव में एक कुआं है जिससे साल के 6 महीने तो पानी मिल जाता है लेकिन बाकी दिनों में दूर पहाड़ स्थित एक जल स्रोत पर ही यह लोग निर्भर है।

ऐसा नहीं कि गांव वाले ऐसे ही जीवन यापन करना चाहते है। पिछले कई सालों से शासन से गुहार लगा रहे हैं लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। ये चाहते हैं कि इनके बच्चे शिक्षित हो लेकिन शासन स्तर पर आज तक कोई मदद नहीं मिली।

लिहाजा अब गांव के ही कुछ लोग और स्थानी समाजसेवियों ने इस गांव को शिक्षित करने का अदना सा प्रयास करने का सपना देखा है। शासन-प्रशासन से थक हार चुके इन ग्रामीणों ने अब खुद ही लकड़ी का एक विद्यालय बनाने की ठानी है जहां गांव से जुड़े कुछ शिक्षित लोग ही इनकी अगली पीढ़ी को पढ़ाने लिखाने का संकल्प किया है।

मामले के संबंध में जब जिम्मेदार अधिकारियों से बात की गई तो साफ तौर पर यह स्वीकार किया गया कि सब कुछ प्रशासन के संज्ञान में है चित्रकूट नगर परिषद के सीएमओ रमाकांत शुक्ला की मानें तो इस गांव के बारे में जिले के आला अधिकारियों को अवगत कराया गया है जिस पर जल्द ही शासन स्तर से कार्यवाही की जाएगी !

बहरहाल शासन प्रशासन कुछ भी कहे लेकिन एक बात तो साफ है कि इस गांव की हकीकत किसी से छुपी नहीं बावजूद इसके इन्हें अनदेखा कर आज तक इनकी सुध नहीं ली गई अब देखना होगा कि इस बार प्रशासन कोई कदम उठाता है या हमें से भी करें झूठी बयानबाजी कर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेगा।

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