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पूर्व विधायक सकलेचा ने जांच एजेंसी को दिया बयान, कहा- चार साल पहले तब के CM ने अफसरों को और खुद को बचाने STF से रुकवा दी थी जांच

PMT और Pre-PG में फर्जी तरीके से भर्ती के सबसे बड़े व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाले की जांच चार साल तक मध्यप्रदेश में बंद रही। आखिर क्यों? इसका राज गुरुवार को इस घोटाले को उजागर करने वाले एक दर्जन व्हिसिल ब्लोअर में से एक, रतलाम के पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने गुरुवार को खोला है।

पूर्व विधायक सकलेचा ने जांच एजेंसी को दिया बयान, कहा- चार साल पहले तब के CM ने अफसरों को और खुद को बचाने STF से रुकवा दी थी जांच

भोपाल। PMT और Pre-PG में फर्जी तरीके से भर्ती के सबसे बड़े व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाले की जांच चार साल तक मध्यप्रदेश में बंद रही। आखिर क्यों? इसका राज गुरुवार को इस घोटाले को उजागर करने वाले एक दर्जन व्हिसिल ब्लोअर में से एक, रतलाम के पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने गुरुवार को खोला है। उनके मुताबिक वर्ष 2015 में ये जांच तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान ने ही एसटीएफ यानी स्पेशल टास्क फोर्स से रुकवाई थी। यह काम पूर्व सीएम चौहान ने इस घोटाला कांड से स्वयं समेत बड़े अधिकारियों, जिनमें व्यापमं की तत्कालीन अध्यक्ष रंजना चौधरी भी शामिल थीं, को बचाने के लिए किया। इससे एसटीएफ की भूमिका इस मामले में पूरी तरह कटघरे में आ जाती है।

यहां बता दें कि सकलेचा का बयान एसटीएफ ने गुरुवार को लगातार दूसरे दिन दर्ज किया। जबकि यह बुधवार से शुरू हुआ था। अब तीसरे दिन शुक्रवार को भी बयान आगे जारी रहेगा। बयान प्रदेश के एसटीएफ मुख्यालय पर चल रहा है। एसटीएफ की एसआईटी ने दूसरे दिन का बयान दोपहर 3.30 बजे से लेना शुरू किया। जो रात 7.15 बजे तक चला। यानी दूसरे दिन पहले दिन से एक घंटे ज्यादा बयान दर्ज हुआ।

व्यापमं घोटाला :- सुप्रीम कोर्ट ने दिया था सीबीआई को जांच का आदेश, लेकिन मध्यप्रदेश पुलिस की एसटीएफ ने इस जांच की आढ़ लेकर वर्ष 2015 के बाद चार साल यानी 2019 तक कोई जांच नहीं की। जबकि शिकायतें पेंडिंग थीं। यही बंद जांच अब सीएम कमलनाथ ने फिर से खुलवाई है।

व्यापमं ने STF से कहा, नहीं हैं दस्तावेज :

इस केस में एसटीएफ के साथ व्यापमं की भूमिका भी संदेह के दायरे में रही है। क्योंकि पहले जांच व्यापमं ने खुद ही की थी। फिर राज्य शासन ने यह जांच एसटीएफ को 23 अगस्त 2013 को सौंपी। जबकि एसटीएफ ने 2012 से पहले के फर्जी छात्रों की जांच करने से इंकार कर दिया कि उसे व्यापमं ने दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए हैं। इस पर सकलेचा ने सात फरवरी 2014 को न्यायालय में आवेदन लगाया कि यह जांच सीबीआई से कराई जाए। तब एसटीएफ ने कोर्ट में कहा कि व्यापमं पर पहले के वर्षों के दस्तावेज उपलब्ध हैं। सकलेचा ने अब अपने बयान में कहा है- इससे साफ जाहिर होता है कि व्यापमं झूठ बोल रहा था, और एसटीएफ उसका मोहरा बन रही थी। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि व्यापमं और एसटीएफ ने मिलकर घोटाले की जांच में घोटाला कर दिया। नेताओं ओर अफसरों को बचाया।

रोल नंबरों के दस्तावेज देने में आनाकानी :

- रोल नंबर सेटिंग के लॉजिस्टिक फार्मूले में व्यापमं के तत्कालीन कंट्रोलर पंकज त्रिवेदी और व्यापमं के आरोपी नितिन महेंद्रा की मिली भगत थी।

- नितिन महेंद्रा को गिरफ्तार करते वक्त पंकज त्रिवेदी का स्पष्ट नाम आया था, लेकिन उसे एसटीएफ ने चार महीने बाद गिरफ्तार किया।

- इस अवधि में पंकज ने सभी दस्तावेजों में हेरफेर कर 2013 का परीक्षा परिणाम निकला दिया और सभी फर्जियों को प्रवेश करा दिया।

- जांच में बड़ी धांधली ये हुई कि 3133 रोल नंबर परिवर्तित पाए गए, लेकिन 1073 परीक्षा परिणाम ही निरस्त किए, 2060 फर्जी बचा लिए गए।

यह बयान भी दर्ज हुआ :

- एसटीएफ ने व्यापमं की दी गई सूची में फेरबदल करके आरोपी बदले। जहां 16 थे, वहां 14 कर लिए। इसी तरह और भी बदले।

- एसटीएफ ने दो साल में मात्र 36 प्रकरण दर्ज किए। जबकि 176 प्रकरण विभिन्न थानोें में दर्ज हुए।

जांच बंद करने का आदेश किसने दिया :

एसटीएफ ने जांच 2015 में बंद कर दी। क्योंकि जुलाई 2015 से सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सीबीआई जांच करेगी 212 प्रकरणों की। गंभीर यह है कि इस आदेश की आढ़ लेकर मध्यप्रदेश की एसटीएफ ने कह दिया कि वह अब जांच नहीं करेगी। जबकि शिकायतें पेंडिंग थीं। सकलेचा का कहना है कि जांच किसके निर्देश पर रोकी? प्रदेश में जांच तत्कालीन सीएम चौहान के कहने पर ही रुकी, जो चार साल तक रुकी रही।

एग्जाम कंट्रोलर को बचाया : सकलेचा

- यह गंभीर तथ्य है कि वर्ष 2008 से 2011 तक जो एग्जाम कंट्रोलर था सुधीर भदौरिया, उसे बचाने के लिए एसटीएफ ने इस बीच की परीक्षा का प्रकरण ही दर्ज नहीं किया। सुधीर भदौरिया वर्तमान में राजीव गांधी प्रौद्योगिक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। - पारस सकलेचा, व्हिसिल ब्लोअर व्यापमं घोटाला व पूर्व विधायक रतलाम मप्र

फैक्ट फाइल :

- 212 दर्ज प्रकरणों की जांच की थी सीबीआई ने।

- जबकि जांच के लिए एप्लीकेशन 1040 थीं।

- कुल 1363 एप्लीकेशन आई थीं।

- 333 की जांच कर ली गई थी।

- 1040 लंबित रही हैं चार साल तक।

- अब इनमें से 197 की जांच हो रही है।

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