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पुलिस के इस आरक्षक को 10 साल से DGP भी करते हैं सैल्यूट, जानिए क्या है पूरा मामला

मध्यप्रदेश भोपाल में पुलिस (police) में एक आरक्षक ऐस है जिसे महकमे के आला अफसर पुलिस महानिदेशक तक सलाम ठोकते हैंं। यह सिलसिला पिछले 10 सालों से बदसतूर चला आ रहा है।

पुलिस के इस आरक्षक को 10 साल से DGP भी करते हैं सैल्यूट, जानिए क्या है पूरा मामला

मध्यप्रदेश भोपाल में पुलिस (police) में एक आरक्षक ऐस है जिसे महकमे के आला अफसर पुलिस महानिदेशक तक सलाम ठोकते हैंं। यह सिलसिला पिछले 10 सालों से बदसतूर चला आ रहा है। सुनकर शायद आपको यकिन भी न हो, पर यह बिल्कुल सच है। वहीं आरक्षक रामचंद्र कुशवाह भी DGP की सलामी को पूरे रुतबे और अदब के साथ स्वीकारते हैं। इस दौरान वो डायस पर जाकर बतौर मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता को संबोधित भी करते हैं। इस दौरान कई DGP बदल गए लेकिन रामचंद्र का रुतबा आज तक कायम है।


5 घंटे का मुख्यमंत्री

आपने अनिल कपूर की फिल्म नायक तो देखा होगी जिसमें वह मुख्यमंत्री का चेलेंज स्वीकार करते हुए एक दिन का सीएम बनता है, पर यहां मामला बिल्कुल उल्टा है। भोपाल में आरक्षक के पद पर कार्यरत रामचंद्र कुशवाह वैसे तो आम दिनों की तरह अपनी आरक्षक ड्यूटी करते हैं। लेकिन स्वतंत्रता दिवस के एक दो दिन पहले महकमें में एकाएक उनका रुतबा बढ़ जाता है। उनका रुतबा हू-ब-हू मुख्यमंत्री का हो जाता है। हालांकि उनका यह रुतबा सिर्फ 5 घंटे के लिए रहता है। उसके बाद वो फिर से आम आरक्षक बन जाते हैं।


आखिर क्यों डीजीपी ठोकते हैं सलाम

गत 10 सालों से हर साल 15 अगस्त के ठीक दो दिन पहले स्वंत्रता दिवस समारोह की फुल ड्रेस रिहर्सल होती है। जिसमें इसमें कुशवाह को 5 घंटे के लिए डमी मुख्यमंत्री बनाया जाता है। इस दौरान वह बतौर मुख्यमंत्री परेड की सलामी लेते हैं और महकमे के बड़े अधिकारियों, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर, एसपी से लेकर NCC कैडेट्स सभी सलाम ठोकते हैं। रिहर्सल के दौरान वो डायस पर जाकर बतौर मुख्यमंत्री प्रदेश की जनता को संबोधित भी करते हैं। यहां तक कि परेड ग्राउंड और मंच पर वह सीएम के रुतबे में चारों तरफ सुरक्षा अधिकारी के बीच वीआईपी कार में आते हैं। कुछ घंटों के लिए ही सही पर असली मुख्यमंत्री का ट्रीटमेंट मिलना रामचन्द्र के लिए गर्व से कम नहीं है।


क्या कहते हैं डमी सीएम

अब मुख्यमंत्री बनकर खुद रामचंद्र क्या महसूस करते हैं, ये जानना भी रोचक है. उनके लिए ये एक किरदार से ज्यादा ड्यूटी है और वो अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से करते है। रामचन्द्र को इस बात की ख़ुशी होती है कि वो अपना काम बखूबी कर रहे हैं।





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