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मध्यप्रदेश/ कर्जमाफी में राष्ट्रीयकृत और सहकारी बैंकों का बिजनेस रूल्स आया आड़े, अफसरों के सामने बड़ी चुनौती

मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का निर्णय भले ही ले लिया हो, किंतु कर्ज माफी में नियम व शर्तो (बिजनेस रूल) का पालन कराना अफसरों के लिए चुनौती बन गया है। इसे लेकर सोमवार को वित्त, कृषि, सहकारिता व मुख्यमंत्री सचिवालय के अफसरों के बीच डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक बैठक चली।

मध्यप्रदेश/ कर्जमाफी में राष्ट्रीयकृत और सहकारी बैंकों का बिजनेस रूल्स आया आड़े, अफसरों के सामने बड़ी चुनौती
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मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का निर्णय भले ही ले लिया हो, किंतु कर्ज माफी में नियम व शर्तो (बिजनेस रूल) का पालन कराना अफसरों के लिए चुनौती बन गया है। इसे लेकर सोमवार को वित्त, कृषि, सहकारिता व मुख्यमंत्री सचिवालय के अफसरों के बीच डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक बैठक चली।

इस दौरान कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तरप्रदेश व आंध्र प्रदेश में हुई कर्ज माफी के मॉडल पर मंथन किया गया। चूंकि मप्र की चुनौतियां अलग है, इसलिए इन सभी से अलग मप्र मॉडल बनाने पर जोर दिया गया।

कांग्रेस पार्टी ने किसानों का दो लाख रुपए का कर्ज माफ करने का वचन पत्र जारी किया था। कांग्रेस की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सबसे पहला निर्णय कर्ज माफी का लिया। उन्होंने कर्ज माफी का आदेश भी जारी कर दिया। अभी हालांकि इसे कोई वैधानिक मंजूरी नहीं मिल पाई है। इसका खाका तैयार करने की जिम्मेदारी वरिष्ठ अफसरों को दी गई है।
मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि चाहे जो हो, हर हाल में किसानों का कर्ज माफ करना है। किंतु सबसे बड़ी समस्या इतनी बड़ी राशि को लेकर है। अब चूंकि इसका खाका बनना शुरू हो गया है, ऐसे में तय हो गया है कि कई विकास कार्यो को रोक कर इसकी राशि किसानों के खाते में दी जाएगी। किसानों के दो लाख रुपए के कर्ज माफी पर सरकार को परोक्ष रूप से करीब 45 से 50 हजार करोड़ की चपत पड़ेगी।
अब इस राशि का समायोजन किस तरह से और कैसे हो, इसे लेकर मंथन शुरू हुआ है। कर्ज माफी में बिजनेस रूल का पालन करना अनिवार्य होता है। ऐसे में कुछ इस तरह से रास्ता खोजा जा रहा है कि कर्ज माफी भी हो जाए, और सरकार को कहीं से कोई दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़े।
हरिभूमि ने इस मुद्दे पर पहले भी कई बार आगाह किया था। इसे सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। सूत्रों ने बताया कि 25 दिसंबर को मंत्रि-मंडल के गठन व शपथ लेने के साथ ही संभवत: देर शाम या फिर 26 दिसंबर को कैबिनेट की बैठक में मंजूरी के साथ ही इस पर अंतिम फैसला होगा। 
मंत्रालय में दो घंटे तक चली लंबी बैठक-
मंत्रालय में सोमवार को प्रमुख सचिव वित्त अनुराग जैन, मनोज गोविल, प्रमुख सचिव सहकारिता केसी जैन, कृषि विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. राजेश राजौरा व मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अशोक बर्णवाल के बीच करीब पौने दो घंटे तक चर्चा हुई। इस दौरान कई राज्यों के कर्ज माफी के मॉडल का अध्ययन किया गया। सबसे बड़ी समस्या यह आ रही है कि अलग-अलग राज्याें की समस्याएं अलग है। इसी लिहाज से उन राज्यों में कर्ज माफी की गई।
पंजाब व कर्नाटक दोनों राज्यों में अभी हाल में ही किसानों के कर्जे माफ किए गए। महाराष्ट्र व उप्र में भी किसानों के कर्जे माफ किए गए। किंतु उक्त सभी राज्यों में कर्ज माफी का तरीका अलग-अलग है। मप्र में यह बिल्कुल ही अलग होने की संभावना है। बैठक में निर्णय हुआ कि अभी एक मॉडल ड्राफ्ट तैयार कर लिया जाए, इस पर अंतिम मुहर हालांकि मुख्यमंत्री के सामने प्रजंेटेशन के बाद लगेगी। अफसरों ने इसका खाका तैयार कर लिया है।
बिजनेस रूल का पालन बड़ी चुनौती-
अफसरों के सामने बिजनेस रूल का पालन कराने की बड़ी चुनौती सामने है। वित्त विभाग ने पहले ही इस तरह के निर्णय पर साफ कर दिया था कि प्रदेश का आर्थिक हालत खस्ताहाल है। करीब डेढ़ वर्ष तक कुछ भी करने की स्थिति नहीं है। किंतु मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि यह कांग्रेस का वचन पत्र है। इसे पूरा ही करना है।
सूत्रों ने बताया कि आर्थिक हालत खराब होने के बाद भी कर्ज माफी होना है। ऐसे में कोई बीच का रास्ता खोजा जा रहा है। इसमें किसानों की कर्ज माफी भी हो जाए और आर्थिक स्थिति भी डावाडोल नहीं हो, इसलिए नियम कानूनों का विशेष तौर पर ध्यान दिया जा रहा है। इस बारे में मुख्य सचिव को भी बता दिया गया है।
राष्ट्रीयकृत व सहकारी बैंकों के बिजनेस रूल्स अलग-
एक बड़ी समस्या यह भी है कि किसानों पर राष्ट्रीयकृत बैंकों तथा सहकारी बैंकों का कर्ज अलग अलग है। दोनों के नियम व शर्ते अलग है। दोनों बैंकों के वरिष्ठ अफसरों की बैठक हो चुकी है।
दरअसल, राष्ट्रीयकृत बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियमों से चलते है, जबकि सहकारी बैंकों के नियम अलग हैं। कर्ज माफी में यह सबसे बड़ा रोड़ा है। अब दोनों के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश में अफसर जुटे हुए हैं।

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