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लोकसभा चुनाव 2019 : भोपाल में भगवा ट्रेंड- मुकाबला साध्वी प्रज्ञा Vs दिग्विजय सिंह

भोपाल से साध्वी प्रज्ञा बनाम दिग्विजय की लड़ाई के मायने काफी गंभीर हैं। साध्वी के उम्मीदवार बनाने भर से देशभर के हिन्दू संगठनों तथा उनके समर्थकों में नए सिरे से जैसा उत्साह पैदा हुआ है।

लोकसभा चुनाव 2019 : भोपाल में भगवा ट्रेंड- मुकाबला साध्वी प्रज्ञा Vs दिग्विजय सिंह
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भोपाल लोकसभा क्षेत्र पूरे देश के लिए आकर्षण का केन्द्र हो गया है। आम चुनाव में वाराणसी और बेगूसराय की तरह और कुछ मायनों में ज्यादा भी चर्चा हो रही है तो वह है भोपाल। वास्तव में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भाजपा द्वारा उम्मीदवार बनाया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से ही भाजपा वहां एक उपयुक्त उम्मीदवार की तलाश में थी।

वहां से यदि भाजपा का कोई बड़ा नेता भी लड़ता तो वह एक सामान्य चुनाव बनकर रह जाता। दिग्विजय कांग्रेस में होते हुए भी एक विचारधारा के प्रतीक हैं। वह विचार है, भाजपा सहित पूरे संघ परिवार और हिन्दू संगठनों को समाज, देश और राजनीति के लिए घातक साबित करते हुए स्वयं को सेक्यूलरवाद का पुरोधा साबित करना। जाहिर है, भाजपा के लिए भोपाल सामान्य चुनाव का नहीं, अपनी विचारधारा पर सबसे ज्यादा हमला करने वाले के खिलाफ लड़ने का मामला है।

संघ परिवार दिग्विजय के खिलाफ

संघ परिवार का हर कार्यकर्ता दिग्विजय सिंह को हारते देखना चाहता है। इसमें भाजपा की दृष्टि से प्रज्ञा सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। देश में हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद और हंगामा होने पर बाद में संघी आतंकवाद शब्द सबसे पहले दिग्विजय सिंह ने ही प्रयोग किए। उन्होंने इसे एक अभियान का रूप दिया जिसके कारण मालेगांव द्वितीय विस्फोट, समझौता, हैदराबाद मक्का मस्जिद तथा अजमेर दरगाह विस्फोट मामले की जांच की धारा बदल गई।

हिन्दू संगठन चुनाव में सक्रिय

साध्वी प्रज्ञा उसी की शिकार हुईं। तो साध्वी प्रज्ञा दिग्विजय सिंह के बिल्कुल विपरीत विचारधारा का प्रतीक हैं। प्रज्ञा सहित और अन्य लोगों पर आतंकवाद का आरोप लगाए जाने तथा उनके साथ पुलिस के व्यवहार के खिलाफ देश में जो आक्रोश पैदा हुआ था उसका असर 2014 के आम चुनाव पर व्यापक रूप से पड़ा। 1999 के बाद पहली बार पूरा संघ परिवार तथा अन्य हिन्दू संगठन चुनाव में सक्रिय हुए।

हिन्दू आतंकवाद की कहानी

वह हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद तथा संघी आतंकवाद के आरोपों तथा यूपीए सरकार द्वारा की जा रही कार्रवाई तथा साध्वी प्रज्ञा सहित अन्य आरोपियों के उत्पीड़न का प्रत्युत्तर देना चाहता था। साध्वी प्रज्ञा के प्रति सबसे ज्यादा सहानुभूति तो हिन्दुत्व विचार के समर्थकों में रही ही है, यूपीए, कांग्रेस एवं सरकारी एजेंसियों के खिलाफ सबसे ज्यादा गुस्सा का कारण भी उनकी दशा ही बनी थी।

नहीं डिगने वाली साध्वी प्रज्ञा

भले शासन में पी. चिदम्बरम, सुशील कुमार शिंदे गृहमंत्री के रूप में इसके लिए जिम्मेदार थे, लेकिन इसके सबसे बड़े झंडाबरदार दिग्विजय सिंह थे। साध्वी प्रज्ञा 2009 से धीरे-धीरे हिन्दुत्व के कारण सरकारी उत्पीड़न का शिकार होने वाली तथा तमाम विकट परिस्थितियां उत्पन्न किए जाने के बावजूद नहीं डिगने वाली व्यक्तित्व के रूप में उभरी हैं।

साध्वी प्रज्ञा को क्यों बनाया गया भाजपा का उम्मीदवार

जब उन्हें जमानत मिली तो उनको रिसीव करने वाले तथा भोपाल में इलाज के दौरान उनसे मिलने आने वालों की संख्या से पता चलता था कि उनकी लोकप्रियता कितनी बढ़ चुकी है। इस तरह जो हिन्दुत्व समर्थक हैं उनके लिए प्रज्ञा एक बड़ी आइकॉन हैं तो दिग्विजय सिंह उसके विरोध में किसी सीमा तक जाने वाले व्यक्तित्व। तो भाजपा ने प्रज्ञा को उम्मीदवार बनाकर बहुत बड़ा संदेश दिया है।

साध्वी प्रज्ञा पर आरोप

यह चुनाव पहले से ही दो विचारधाराओं के बीच तीखे विभाजन का चुनाव हो चुका है। भाजपा और कांग्रेस के घोषणा पत्रों में यह विभाजन साफ दिखता है। साध्वी प्रज्ञा के उम्मीदवार बनने के बाद विचारधारा के इस विभाजन को भाजपा ने ज्यादा मुखर करने की रणनीति अपनाई है। विरोधी साध्वी प्रज्ञा को आतंकवादी कहने लगे हैं। इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक है।

अजमेर विस्फोट में साध्वी की भूमिका

एक दो वर्ष पहले बेच दिए गए मोटरसाइकिल को रमजान के दौरान मालेगांव के अंजुमन चौक और भीखू चौक पर 29 सितंबर 2008 को सिलसिलेवार बम धमाके के लिए जिम्मेवार ठहराकर गिरफ्तार करना किसी निष्पक्ष व्यक्ति के गले नहीं उतरता। अजमेर विस्फोट में साध्वी की भूमिका बिल्कुल नहीं आई। यहां तक कि एनआईए ने अपनी जांच के बाद 13 मई 2016 को अपने पूरक आरोप पत्र में माना कि न तो इसमें मकोका लगाने का कोई आधार है और न साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सहित 6 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलने लायक सबूत ही है।

हिन्दू आतंकवाद

यह बात अलग है कि न्यायालय ने इसे स्वीकार करने की जगह मामला जारी रखा है। समझौता विस्फोट में भी उनकी संलिप्तता साबित नहीं हो सकी। हैदराबाद की जामा मस्जिद विस्फोट का फैसला आ चुका है जिससे हिन्दू आतंकवाद का गढ़ा गया पूरा सिद्धांत ध्वस्त हो गया। इतना स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं है कि साध्वी प्रज्ञा को हिन्दू संगठनों को आतंकवाद का दोषी ठहराकर प्रतिबंधित करने की योजना का शिकार बनाया गया।

साध्वी प्रज्ञा का धर्मयुद्ध

वस्तुतः साध्वी प्रज्ञा के उम्मीदवार बनने का संदेश केवल भोपाल एवं मध्यप्रदेश के साथ पूरे देश में जा रहा है। साध्वी ने अपने पहले वक्तव्य में कहा कि यह धर्मयुद्ध है। रामजन्मभूमि से लेकर कई मामलों में उनका वक्तव्य आ रहा है जिसका असर देशभर में है। पूरे देश से भारी संख्या में लोग भोपाल पहुंच रहे हैं। धरातल पर नजर रखने वाले इसका असर महसूस कर सकते हैं।

दिग्विजय सिंह / चुनावी राजनीति

इस चुनाव में हिन्दुत्व आधारित जो भी संगठन, नेता या कार्यकर्ता किसी कारण निष्िक्रय होंगे वे भी सक्रिय हो रहे हैं। हिन्दुत्व इस चुनाव की अंतर्धारा मंे मुद्दा है। दिग्विजय सिंह एक अनुभवी नेता हैं। मध्यप्रदेश के 10 वर्ष मुख्यमंत्री रह चुके हैं। 2003 के बाद पहली बार वे चुनावी राजनीति में उतरे हैं। उनको पता है कि अगर इस समय उन्होंने प्रज्ञा ठाकुर को हिन्दू-भगवा आतंकवादी कहा तो मतदाताओं का बड़ा वर्ग केवल भोपाल नहीं देशभर में नाराज होकर भाजपा के पाले में जा सकता है।

भोपाल लोकसभा सीट

इस तरह उनके सामने कठिन स्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने अपने पूर्व तेवर के विपरीत आरंभिक बयान अत्यंत सधा हुआ दिया। उन्होंने कहा कि भोपाल में उनका स्वागत है। भोपाल से 1984 के बाद कांग्रेस कभी जीती नहीं है। 1989 से 2014 तक भाजपा ही यहां से विजयी होती रहीं है। पिछले साल विधानसभा चुनाव में भोपाल लोकसभा सीट के तहत आने वाली आठ विधानसभा सीटों में से पांच पर भाजपा को जीत मिली है।

साध्वी प्रज्ञा बनाम दिग्विजय की लड़ाई

आठ विधानसभा सीटों में भाजपा को कांग्रेस सेे 63 हजार वोट अधिक मिले हैं। इसके आधार पर साध्वी प्रज्ञा के लिए रास्ता ज्यादा कठिन भी नहीं दिखता। हालांकि हम यहां परिणामों का पूर्व आकलन नहीं कर सकते, किंतु भोपाल से साध्वी प्रज्ञा बनाम दिग्विजय की लड़ाई के मायने काफी गंभीर हैं। साध्वी के उम्मीदवार बनाने भर से देशभर के हिन्दू संगठनों तथा उनके समर्थकों में नए सिरे से जैसा उत्साह पैदा हुआ है।

उसके आलोक में केवल कल्पना की जा सकती है कि अगर वो जीत गईं तो माहौल कैसा होगा। यह आने वाली राजनीति को प्रभावित करने वाला चुनाव परिणाम हो सकता है। हां, अगर विजय नहीं मिली तो अलग बात होगी, पर उम्मीदवार बनाने मात्र से जैसी स्थितियां पैदा होतीं दिख रहीं हैं उनका कुछ असर चुनाव पर अवश्य होगा।

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