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करोड़ो खर्च के बाद निगरानी न होने से स्वच्छता में पिछड़ रहा भोपाल, 600 कर्मी मंत्री - अफसरों के बंगले पर कर रहे झाड़ू पोछा

अभी हाल ही में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा जारी की स्वच्छता की सूची में राजधानी भोपाल को 9वां स्थान मिला है। जबकि इंदौर पहले स्थान पर रहा। दरअसल शहरी विकास मंत्रालय ने 11 सितंबर से लेकर दो अक्टूबर पर स्वच्छता को लेकर देशभर में सर्वेक्षण किया था।

करोड़ो खर्च के बाद निगरानी न होने से स्वच्छता में पिछड़ रहा भोपाल,
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Bhopal, lagging behind in sanitation due to lack of monitoring after spending crores

भोपाल। अभी हाल ही में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा जारी की स्वच्छता की सूची में राजधानी भोपाल को 9वां स्थान मिला है। जबकि इंदौर पहले स्थान पर रहा। दरअसल शहरी विकास मंत्रालय ने 11 सितंबर से लेकर दो अक्टूबर पर स्वच्छता को लेकर देशभर में सर्वेक्षण किया था। अगर राजधानी भोपाल की सफाई व्यवस्था की बात करें तो, भोपाल निगम अभी काफी पीछे दिखाई दे रहा है। स्वच्छता सर्वेक्षण-2020 के लिए जो नवाचार किए जा रहे है। वह देखरेख के अभाव में मजबूती से रिजल्ट नहीं दे पा रहे है। स्मार्ट डस्टबिन हो, डोर टू डोर कचरा कलेक्शन हो, कंपोस्ट युनिट समेत तमाम कोशिशें नाकाफी नजर आ रही है। ऐसे में नगर निगम ने अपनी इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त नहीं किया तो, इस साल भी भोपाल स्वच्छता सर्वेक्षण में पिछड़ सकता है।

स्मार्ट डस्टबिन: भोपाल स्मार्ट सिटी ने सड़कों पर कचरा न दिखे इसके लिए करोड़ों रुपए खर्च कर शहर के 123 स्थानों पर स्मार्ट डस्टबिन रखवाए थे। दावा: स्मार्ट सिटी ने दावा किया था कि, स्मार्ट डस्टबिन भरते ही इसकी जानकारी कंट्रोल एंड कमांड सेंटर पर मिल जाएगी। जिसके बाद डस्टबिन को खाली करा लिया जाएगा। साथ ही अंडर ग्राउंड होने से गंदगी भी नहीं दिखेगी। हकीकत: 80 से ज्यादा स्थानों पर यह डस्टबिन खराब पड़ा हुए है। स्थिती यह है कि, कई स्थानों पर इनके ढक्कन तक टूट गए हैं। डोर टू डोर कचरा कलेक्शन: पूरे शहर से कचरा कलेक्शन हो सके इसके लिए लगातार कचरा वाहनों सहित अन्य संसाधनों की खरीदी की गई। दावा: सड़कों से डस्टबिन हटने के बाद निगम के दावा किया था कि, सड़कों पर कचरा न दिखे इसलिए घर-घर से कचरा कलेक्शन किया जाएगा। हकीकत: निगरानी के अभाव में शहर में 40 फीसदी स्थानों से कचरा कलेक्शन नहीं किया जा रहा है। जीपीएस से निगरानी करने पर जरुर फायदा मिला है। लेकिन उतना परिणाम नहीं मिला, जिसकी आशा थी। नतीजन गलि मोहल्लों में कचरा सड़क पर दिखाई देता है।

गीले सूखे कचरे का सेग्रीगेशन: गीले सूखे कचरे को अलग अलग करने के लिए लगभग तीन करोड़ रुपए खर्च कर एनजीओ की सहायता से लोगों में जागरुकता फैलाई जा रही है। दावा: गीला सूखा कचरा अलग अलग कलेक्ट किया जा रहा है। जिसके बाद कचरे को मिथेनाइजेशन प्लांट पर कंपोस्ट कर खाद व अन्य सामान बनाया जाएगा। हकीकत: जागरुकता से अभाव में शहर के ज्यादातर स्थानों गीला व सूखा कचरा अलग अलग नहीं किया जा रहा है। इसका सामना निगम कमिश्नर को अपने हर निरीक्षण में करना पड़ता है। कचरा गाड़ियों के साथ में एनजीओ के कर्मचारी नहीं घूम रहें हैं। नतीजन कचरा अलग अलग करने को लेकर लोगों और निगम कर्मचारियों में विवाद की स्थिती बन रही है।

मिथेनाइजेशन प्लांट: करीब 20 करोड़ रुपए खर्च कर शहर के विभिन्न स्थानों पर मिथेनाइजेशन प्लांट लगाए गए थे। दावा: गीले व सूखे कचरे को अलग अलग कर उसे कंपोस्ट कर खाद बनाई जाएगी। जिससे खंती में कचरा का पहाड़ बनने से रोका जा सकेगा। हकीकत: कचरे की कमी होने से विट्ठल मार्केट और भदभदा को छोड़ कोई भी प्लांट अपनी क्षमता से काम नहीं कर पा रहें हैं।

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