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7 साल में 141 टाइगरों की मौत, भोपाल में भी सुरक्षित नहीं बाघ, शिकारियों के लिए प्रदेश बना पनाहगाह

प्रदेश में बाघों की संख्या भले ही बढ़ी हो और प्रदेश को देश में पहले स्थान का दर्जा मिला हो, लेकिन बाघों की मौत का सिलसिला अब भी कम नहीं हुआ है। हालात यह हैं कि प्रदेश में बीते 7 साल में 141 से ज्यादा बाघों की मौत हो चुकी है।

7 साल में 141 टाइगरों की मौत, भोपाल में भी सुरक्षित नहीं बाघ, शिकारियों के लिए प्रदेश बना पनाहगाह
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भोपाल। प्रदेश में बाघों की संख्या भले ही बढ़ी हो और प्रदेश को देश में पहले स्थान का दर्जा मिला हो, लेकिन बाघों की मौत का सिलसिला अब भी कम नहीं हुआ है। हालात यह हैं कि प्रदेश में बीते 7 साल में 141 से ज्यादा बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें सबसे ज्यादा मौतें अवैध शिकार के कारण होना सामने आई हैं। इस बात का खुलासा पिछले महीने में ही जारी नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी (NTCA) की रिपोर्ट में हो चुका है। एनटीसीए की रिपोर्ट में कहा है कि मध्यप्रदेश में भोपाल, होशंगाबाद, पन्ना, मंडला, सिवनी, शहडोल, बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा के जंगल शिकारियों की पनाहगाह बन गए हैं। ऐसे में स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स बनाने के ऐलान अभी तक ऐलान तक की सीमित हैं। सात साल बाद भी मध्यप्रदेश में इसका गठन नहीं हो पाया है।

क्या कहती एनटीसीए की रिपोर्ट ?

आंकड़ों के अनुसार वर्ष-2012 से 2018 के बीच देशभर में 657 बाघों की मौत हुई, जिनमें से 222 की मौत की वजह सिर्फ शिकार बताई गई। जानकारों का कहना कि बाघों की मौत की दो और प्रमुख वजहें भी हैं। इनमें पहली वजह आबादी वाले इलाके में बाघों पहुंचना और बाघों की आबादी बढ़ने से बाघों के वर्चस्व को लेकर उनकी आपसी लड़ाई भी है। प्रदेश में यह संख्या 141 तक है। हालांकि, वन मंत्री उमंग सिंघार के बयान से स्पष्ट है कि शिकार की संख्या कम है, कानफ्लिक्ट ज्यादा है।

एक टाइगर के लिए 60-80 किमी का एरिया होना चाहिए। उसके कारण ज्यादा मौतें हुई हैं, ऐसा उनका मानना है। वहीं, आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में वर्ष-2012 से जुलाई महीने तक 141 बाघों की मौत हुई है। इसके बाद तीन और बाघों की मौत हुई, जिनमें दो शावक शामिल हैं।

इनमें से करीब 80 मौतें सामान्य बताई गई हैं। छह बाघों की मौत टेरेटरी फाइट को लेकर बाघों के बीच हुई लड़ाई में होना सामने आई है। हालांकि, स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स बनाने के समझौते के तहत दो साल में हथियार बंद फोर्स बनाकर तैनात करना था, लेकिन सात साल में कुछ नहीं हुआ है।

अब सरकारी फाइलों ने थोड़ी रफ्तार पकड़ी है। इससे उम्मीद है कि इस इसका गठन हो जाएगा, जिससे शिकारियों और बाघों की मौत पर अंकुश अब तक के मुकावले ज्यादा लग सकेगा।

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