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यूपी के शाहजहांपुर में दिल्ली के 'लाट साहब' से खेली जाएगी 'जूता मार' होली, भैंसे पर बैठाकर कराया जएगा नगर भ्रमण, जानिये क्यों

शाहजहांपुर की जूता मार होली देश-विदेश तक मशहूर है। पिछली बार रामपुर से 'लाट साहब' को लाकर जूता मार होली खेली गई थी। इस बार 'लाट साहब' दिल्ली से आ रहे हैं। प्रशासन ने इसके मद्देनजर खास सुरक्षा इंतजाम किए हैं।

यूपी के शाहजहांपुर में दिल्ली के लाट साहब से खेली जाएगी जूता मार होली, भैंसे पर बैठाकर कराया जएगा नगर भ्रमण, जानिये क्यों
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यूपी के शाहजहांपुर में इस बार दिल्ली के 'लाट साहब' से जूता मार होली खेली जाएगी। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

उत्तर प्रदेश की कृष्ण नगरी मथुरा-वृंदावन में खेली जाने वाली लठ्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रदेश के ही शाहजहांपुर में ऐसी होली मनाई जाती है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। सुनने में अटपटा लग सकता है, लेकिन यहां की जूता मार होली केवल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशियों के आकर्षण का भी केंद्र बनती रही है। खास बात है कि जिला प्रशासन खुद इस पूरे आयोजन की जिम्मेदारी संभालता है। इस बार दिल्ली के लाट साहब को भैंसा गाड़ी में बैठाकर जूता मार होली खेली जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर विकास खुराना ने इसके पीछे की कहानी बताई है। उन्होंने बताया कि शाहजहांपुर की स्थापना करने वाले नवाब बहादुर खान के वंश के आखिरी शासक नवाब अब्दुल्ला खान पारिवारिक लड़ाई के चलते फर्रुखाबाद चले गए थे। 1729 में 21 साल की उम्र में शाहजहांपुर आए तो उन्हें हिंदू और मुसलमान, दोनों का प्यार मिला। उनके आने के कुछ समय बाद ही होली का त्योहार आ गया। दोनों समुदाय के लोगों ने अपने प्रिय नवाब अब्दुल्ला खान के साथ होली खेली और इसके बाद ऊंट पर बैठाकर शहर का चक्कर लगाया। इसके बाद यह एक परंपरा बन गई। हर साल नवाब अब्दुल्ला को ऊंट पर बैठाकर होली पर इसी तरह शहर का चक्कर लगाया जाता।

बतौर डॉक्टर विकास खुराना, 1857 तक हिंदू- मुस्लिम दोनों मिलकर इस परंपरा को निभाते रहे, लेकिन हिंदू-मुस्लिम के बीच का यह प्यार अंग्रेजों को रास नहीं आया और 1858 में बरेली के सैन्य शासक खान बहादुर खान के सैन्य कमांडर मरदान अली खान ने एक टुकड़ी के साथ शाहजहांपुर में हिंदुओं पर हमला कर दिया। इसमें हिंदुओं के साथ तमाम मुसलमान भी मारे गए थे। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति से सांप्रदायिक तनाव हो गया।

'लाट साहब' अंग्रेजों के प्रति आक्रोश

डॉक्टर खुराना के मुताबिक 1947 में भारत की आजादी के बाद जिला प्रशासन ने नवाब साहब के जुलूस का नाम बदल कर 'लाट साहब' कर दिया। अंग्रेजों के प्रति आक्रोश आज भी जताया जाता है। लाट साहब का यह जुलूस चौक कोतवाली स्थित फूलमती देवी मंदिर से निकलता है। इस दौरान लाट साहब की जय बोलते हुए होरियारे उन्हें जूतों से मारते हैं।

लाट साहब जुलूस के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होते हैं। पुलिस अधीक्षक एस आनंद के अनुसार होली पर निकलने वाले छोटे तथा बड़े लाट साहब के जुलूस के लिए पुलिस प्रशासन की ओर से पांच पुलिस क्षेत्राधिकारी, 30 थाना प्रभारी तथा 150 उपनिरीक्षक, 900 सिपाही के अलावा दो कंपनी पीएसी तथा दो कंपनी आरपीएफ तथा दो ड्रोन कैमरों की मांग की गई है, जो संभवत 25 मार्च तक यहां आ जाएंगे। आयोजकों का कहना है कि इस बार 'लाट साहब' दिल्ली से आएंगे। बता दें कि पिछली बार 'लाट साहब' रामपुर से लाए गए थे।

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