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मध्यप्रदेश का यह ऐतिहासिक पुस्तकालय हुआ जर्जर, दुर्लभ किताबें होने के बावजूद नहीं पहुंच रहे पाठक

केंद्रीय पुस्तकालय की स्थापना 1 नवंबर वर्ष 1956 में मध्य प्रदेश की स्थापना के साथ हुई थी। यहां पाठकों के लिए 20 से 25 हजार किताबों का संग्रह मौजूद है। पढ़िए पूरी खबर-

मध्यप्रदेश का यह ऐतिहासिक पुस्तकालय हुआ जर्जर, दुर्लभ किताबें होने के बावजूद नहीं पहुंच रहे पाठक
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रीवा। संभाग का इकलौता शासकीय केंद्रीय पुस्तकालय अपने अस्तित्व की बाट जोह रहा है। पुस्तकालय भवन काफी पुराना होने की वजह से देखरेख के अभाव में यह जर्जर होने की कगार में पहुंच गया है। पर्याप्त संसाधन मौजूद होने के बाद भी पर्याप्त जगह न होने के कारण यहां रखी किताबें धूल खा रही हैं, जिसको देखने वाला कोई नहीं है।

गौरतलब है कि केंद्रीय पुस्तकालय की स्थापना 1 नवंबर वर्ष 1956 में मध्य प्रदेश की स्थापना के साथ हुई थी। यहां पाठकों के लिए 20 से 25 हजार किताबों का संग्रह मौजूद है। बावजूद इसके इस पुस्तकालय को पर्याप्त मात्रा में पाठक नहीं मिल रहे हैं।

यहां पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। कई जरूरी पुस्तकें है, जो समय रहते उपलब्ध नहीं हो पाती, जिसके चलए पाठकों की जो उत्सुकता है, वो पुस्तकालय को लेकर कम होती जा रही है।

एक समय था जब यहां पर पाठकों की संख्या अधिक होती थी, लेकिन धीरे-धीरे पाठकों की संख्या में कमी होती जा रही है। भवन का निचला हिस्सा पूरी तरह जर्जर हो चुका है। यहां पर वृद्धों को सीढ़ी चढ़ने में काफी परेशानियां होती है। महिलाओं के बैठने की व्यवस्था नहीं है।

इस भवन के चारों ओर खाली मैदान पर अतिक्रमण बढ़ रहा है। यहां बजट का भी अभाव है, जिससे पर्याप्त पुस्तकें भी उपलब्ब्ध नहीं हो पा रही हैं। कहीं-कहीं पर छत टूटी हुई है, जिसकी वजह से बारिश का पानी गिरता है। इससे पुस्तकें ख़राब हो रही हैं।

वर्तमान में यहां 10 लोगों का स्टाफ कार्यरत है। पुस्तकालय में स्टडी के लिए कुछ छात्र आ रहे हैं, लेकिन नियमित पाठक की संख्या ना के बराबर है। पुस्तकालय का काफी हिस्सा जर्जर हो चुका है, जिसके लिए प्रशासन को लिखा भी गया है।

मध्य प्रदेश की स्थापना के बाद प्रदेश में जबलपुर, ग्वालियर, भोपाल, इंदौर और रीवा में केंद्रीय पुस्तकालय की स्थापना की गई थी। इस पुस्तकालय में रीवा के इतिहास के अलावा यहां अन्य पुस्तके भी मौजूद हैं। बावजूद इसके पुस्तकालय में कम ही लोग आ रहे हैं।

इस पुस्तकालय के ग्रन्थपाल अजय श्रीवास्तव इसके लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। किताबों के रख-रखाव ठीक ढंग से करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन पर्याप्त देखरेख के अभाव के कारण इस पुस्तकलालय हालत काफी ख़राब हो रही है।

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