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देखा खिलौना दूर से और मुस्कुरा दिया, तरसी हुई निगाह का अपना शऊर है.. मुस्तफा

बैठक द आर्ट हाउस में बात बच्चों की, कलम युवाओं की श्रंखला का दूसरा सफल आयोजन

देखा खिलौना दूर से और मुस्कुरा दिया, तरसी हुई निगाह का अपना शऊर है.. मुस्तफा
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भोपाल । देखा खिलौना दूर से और मुस्कुरा दिया, तरसी हुई निगाह का अपना शऊर है , मुस्तफा... आमिर सैफी के इस शेर के साथ ही पूरा सदन तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा, मौका था बच्चों के अधिकारों पर काम करने वाली संस्था आवाज द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी बात बच्चों की, कलम युवाओं की, का। यह काव्य गोष्ठी अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस के अवसर पर आयोजित की गई थी, संस्था आवाज द्वारा विगत एक सप्ताह से बच्चों के अधिकारों पर आधारित एक सप्ताह महफूज मनाया जा रहा है, इसी अभियान अंतर्गत बैठक द आर्ट हाउस में आयोजित इस काव्य गोष्ठी के मुख्य अतिथि रहे मध्यप्रदेश बाल आयोग के सदस्य बृजेश चौहान और विशेष अतिथि के रूप में रहे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राकेश दीवान।

कहीं पर भूख की तड़पन, कहीं पर शोहरतें आजम....

औरंगजेब आजम ने दो बच्चों के बीच की बातचीत को अपनी नज्म में उकेरा, उन्होंने पढ़ा कि कहीं पर भूख की तड़पन, कहीं पर शोहरतें आजम, है छोटी उमर पर, हमने भी इस दुनिया को देखा हैं। निशांत उपाध्याय ने पढ़ा कि जिन बच्चों के घर में मम्मी पापा लड़ते हैं, उनके मन काची माटी से रोज उखड़ते, रोज बिगड़ते हैं, चौराहे तक जाती हैं जब चिल्लाने की आवाजें, भारी बस्तों से झुकी उनकी पीठों में, पराई नजरों के शूल गड़ते हैं।

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