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सतना के इस एक गांव के हर घर में चलता है चरखा

सतना जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर रामनगर ब्लॉक में बसा एक गांव सुलखमा आज भी महात्मा गांधी के सिखाए पाठ पर चल रहा

सतना के इस एक गांव के हर घर में चलता है चरखा
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आइए, गांधी जयंती के दिन बापू के इस चरखा गांव में चलें। समाज जीवन से भले ही ये चरखा गायब हो गया हो पर राष्ट्रपिता की भावना और उनकी विरासत को ये गांव 75 बरस से जिंदा रखे हुए है। दुश्वारियां खूब हैं, नए लड़के गांव छोड़कर शहर भाग रहे हैं पर एक पूरी पीढ़ी चरखे को ओढ़ती-बिछाती है। उनको चरखे में बापू दिखते हैं। अपना भविष्य दिखता है। गांव को उम्मीद है बापू के चरखे को बचाने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जरूर कोई पहल करेंगे

मनोज रजक. सतना

जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर रामनगर ब्लॉक में बसा एक गांव सुलखमा (sulkhma) आज भी महात्मा गांधी (mahatma gandhi) के सिखाए पाठ पर चल रहा है। स्वावलंबन (self-reliance) की प्रथा को बनाए रखने वाले इस गांव के लगभग हर घर में लोग चरखा (charkha) चलाते हैं जो इनकी जरूरत भी है। बुजुर्गों ने महात्मा गांधी से पाठ सीखा और वे इसे यहां विरासत में दे गए। आजादी के 75 साल बाद भी यहां ये परंपरा कायम है लेकिन सरकारी मदद नहीं मिलने के कारण इनकी माली हालत ठीक नहीं है। सरकारी मदद के लिए वैसे तो कई बार आश्वासन दिया गया लेकिन नतीजा सिफर रहा।

हजार घरों में चरखे की आवाज सुनाई देती है

रामनगर तहसील का यह गांव है सुलखमा। यहां की आबादी लगभग साढ़े तीन हजार है। जहां एक हजार से ज्यादा घरों में चरखे की आवाज सुनाई देती है। पाल समुदाय बाहुल्य इस गांव की यह परंपरा महात्मा गाधी के समय से है। चरखे से कपड़े और कंबल बनाकर यहां के लोग बेचते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं। इनका काम भी बंटा हुआ है। चरखा चलाकर सूत (thread) कातने का काम घर की महिलाओं का होता है जो घर के बाकी काम निपटाकर खाली बचे समय में चरखे से सूत (thread) तैयार करतीं हैं। इसके बाद का काम घर में पुरूषों का होता है जो इस सूत से कंबल और बाकी चीजें बुनने का काम करते हैं। इन सब के बीच भले ही जो समस्या हों पर यहां के लोग खुश हैं और गर्व के साथ इस परंपरा को जीवित किए हुए हैं।

चरखे से बुनाई में मुनाफा कम पर उम्मीद बरकरार

ग्रामीणों का कहना है कि अगर कोई प्रशासनिक मदद हम लोगों को मिल जाए तो जो समय 1 कंबल बनाने 8 से 10 दिन लग जाते हैं। वह 1 से 2 दिन में बनने लगेगा। यह आरा मशीन से ही संभव हो सकता है। इससे यहां का भविष्य भी सुधर सकता है। दुद्धी पालगांव के बुजुर्ग दुद्धी पाल बताते हैं कि हमने चरखा चलाना सीखा लेकिन इसमें मुनाफा कम है। 8 से 10 दिन में एक कंबल बनता है और 5 से 6 सौ रुपए तक का बिकता है। आमदनी कम होने की वजह से गांव के लड़के शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। चरखा चलाने वाली प्रतिमा पाल, जगन्नाथ पाल, शिवबरण और रघुनाथ पाल कहते हैं कि मेहनत बहुत है लेकिन आमदनी नहीं है। गांव के लोग लंबे समय से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकारी मदद मिलेगी लेकिन फिलहाल सरकार ने अभी कोई कदम नहीं उठाए है।

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