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बौखलाए चीनी ड्रैगन पर हावी भारतीय हाथी

गलवान घाटी में हालात जस के तस बने हुए हैं लेकिन यह छटवीं बार है जब भारत ने चीन का आक्रमण झेला है। शुरुआत यक़ीनन 1962 से हुई, तब चीन ने यहां के गोरखा पोस्ट पर हमला किया था इस जंग में भारत के 1383 सैनिक शहीद हुए थे, 1696 लापता और 3968 सैनिकों को बंदी बना लिया गया था, जबकि चीन के 722 सैनिक मारे गए थे। जिसके बाद चीन ने अक्साई चीन पर कब्जा कर लिया, जो आज भी कायम है, गालवान घाटी इसी क्षेत्र में आता है। तत्पश्चात 1967 में सिक्किम बॉर्डर के पास दोनों सेनाएं आमने सामने आई, यह टकराव तब शुरू हुआ जब भारत में नाथू ला से सेबू ला तक तार लगाकर मैपिंग कर डाली थी, इसी क्षेत्र से होकर पुरानी गंगटोक-यातुंग-ल्हासा सड़क गुजरती है।

Indian elephant dominates Chinese dragon
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Indian elephant dominates Chinese dragon

58 सालों बाद आज सीमाएं फिर से लहूलुहान हैं और स्थितियां नाजुक बनी हुई हैं। चूंकि दोनों देश प्रत्यक्ष युद्ध में नहीं जाना चाहते इसलिए बातचीत लगातार जारी है, लेकिन चीन की धमकी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। ग्लोबल टाइम्स कह रहा है कि पाकिस्तान और नेपाल हमारे साथ हैं और युद्ध की स्थिति में भारत हार जाएगा यानी अप्रत्यक्ष रूप से चीन भारत को तीन मोर्चे पर युद्ध की धमकी से रहा। साथ ही वह ये भी कह रहा है कि 17 घायल भारतीय सैनिक समय पर बचाव अभियान न होने कारण मारे गए, जो दिखाता है कि भारतीय सेना में घायलों के लिए आपातकालीन चिकित्सा मुहैया करा पाने में गंभीर कमियां हैं और पठार पर यह वास्तविक आधुनिक लड़ाकू क्षमताओं वाली सेना नहीं है, इसके अलावा हमने अपने पक्ष में हुए नुक़सान की जानकारी भारत की अच्छाई के लिए रोकी है क्योंकि इससे उसकी जनता की भावनाएं भड़क सकती हैं जो भारत से बदला लेना चाहेंगी। इतना सबकुछ तब हो रहा है जब चीन कोरोनावायरस एवं दक्षिण चीन सागर मामले में दबाव झेल रहा है और दूसरी तरफ भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य बन रहा।

लेकिन क्या ये सब यहीं रुक पायेगा, भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपने चीनी समकक्ष वांग यी से यह कह तो दिया कि सीमा पर जो कुछ भी हुआ है उसके लिए चीन जिम्मेदार है और यह कदम पुर्वनियोजित तथा सोच-समझकर उठाया गया था, जिसका द्विपक्षीय संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा। फिलहाल गलवान घाटी में हालात जस के तस बने हुए हैं लेकिन यह छटवीं बार है जब भारत ने चीन का आक्रमण झेला है। शुरुआत यक़ीनन 1962 से हुई, तब चीन ने यहां के गोरखा पोस्ट पर हमला किया था इस जंग में भारत के 1383 सैनिक शहीद हुए थे, 1696 लापता और 3968 सैनिकों को बंदी बना लिया गया था, जबकि चीन के 722 सैनिक मारे गए थे। जिसके बाद चीन ने अक्साई चीन पर कब्जा कर लिया, जो आज भी कायम है, गालवान घाटी इसी क्षेत्र में आता है। तत्पश्चात 1967 में सिक्किम बॉर्डर के पास दोनों सेनाएं आमने सामने आई, यह टकराव तब शुरू हुआ जब भारत में नाथू ला से सेबू ला तक तार लगाकर मैपिंग कर डाली थी, इसी क्षेत्र से होकर पुरानी गंगटोक-यातुंग-ल्हासा सड़क गुजरती है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान चीन ने भारत को नाथू ला और जेलेप ला दर्रा खाली करने को कहा, भारत ने जेलेप ला दर्रा तो खाली कर दिया लेकिन नाथू ला दर्रे पर स्थिति पहले जैसी ही बनी रही। तब से नाथू ला विवाद का केंद्र बन गया और सेनाओं के बीच टकराव की नौबत आ गई। कुछ दिन बाद चीन ने मशीन गन से भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया और भारत ने अपने जवानों की पोजीशन बचाकर रखने के साथ चो ला क्षेत्र में मुंहतोड़ जवाब दिया, उस समय भारत के 80 जवान शहीद हुए, जबकि चीन के 400।


1967 की इस हार को चीन कभी हजम नहीं कर पाया इसलिए 1975 में अरुणाचल प्रदेश के तुलुंग ला में असम राइफल्स की पेट्रोलिंग पार्टी पर हमला कर दिया जिसमें हमारे 4 सैनिक शहीद हो गए। चौथी बार 1987 में अरुणाचल प्रदेश के तवांग में दोनों के बीच फिर से टकराव हुआ, यह टकराव तवांग के उत्तर में समदोरांग चू इलाके में हुआ। भारतीय फौज नामका चू के दक्षिण इलाके में ठहरी थी लेकिन एक आईबी टीम समदोरंग चू में पहुंच गई। यह जगह नयामजंग चू के दूसरे किनारे पर है। समदोरांग चू और नामका चू दोनों नाले नयामजंग चू नदी में ही जाकर गिरते हैं। हुआ यूं कि 1985 में भारतीय फौज पूरी गर्मी यहां डटे रहे लेकिन 1986 की गर्मियों में पहुंचे तो यहां चीनी फौज में मौजूद थी और समदोरांग चू में अपने तंबू गाड़ चुकी थी। बहुत समझाने पर भी चीनी सेना जब नहीं मानी तो भारतीय सेना ने ऑपरेशन फाल्कन चलाया और जवानों को विवादित जगह पर एयरलैंड किया। यहां पर जवानों ने हाथुंग ला पहाड़ी पर पोजीशन संभाली जहां से समदोई चू के साथ ही तीन और पहाड़ी इलाकों पर नजर रखी जा सकती थी, कुछ ही दिनों में लद्दाख से लेकर सिक्किम तक भारतीय सेना तैनात हो गई और जल्द ही हालात काबू में आ गए। आखिरी बार 2017 में डोकलाम में सेनाएं 75 दिन तक आमने सामने डटी रही, यह वह विवादित पहाड़ी का इलाका है जिस पर चीन और भूटान दोनों ही अपना दावा जताते हैं। भारत इसपर भूटान के दावे का समर्थन करता है, जून में जब चीन ने यहां सड़क निर्माण का काम शुरू किया तो भारतीय सैनिकों ने उसे रोक दिया। भारत की दलील थी सड़क का निर्माण से उसके सुरक्षा समीकरण बदल सकते हैं जिसका इस्तेमाल चीनी सैनिक भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जे के लिए कर सकते हैं। हालांकि कोई हिंसा नहीं हुई और मामला शांत हो गया।





इन्हीं परिस्थितियों से बचने के लिए 1993 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव चीन दौरे पर गए, इस दौरान उन्होंने चीनी प्रीमियर ली पेंग के साथ मेंटेनेंस ऑफ पीस एंड ट् ट्रेंक्विलिटी समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह समझौता एलएसी पर शांति बहाल करने के लिए था, जिसकी बुनियाद 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चीन दौरे में रखी गई थी जिसमें पांच प्रिंसिपल्स शामिल किए गए थे। तत्पश्चात चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन 1996 में जब भारत दौरे पर आए और तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के साथ यहां भी कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स इन मिलिट्री फ़ील्ड समझौता हुआ। इसी तरह 2003 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार ने सीमा विवाद को लेकर स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर का मैकेनिज्म तैयार किया फिर मनमोहन सिंह ने 2005, 2012 और 2013 में चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर बातचीत बढ़ाने पर तीन समझौते किए थे तब वर्तमान विदेश मंत्री एस जयशंकर चीन में भारत के राजदूत हुआ करते थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से लेकर आजतक वे सबसे ज़्यादा 5 बार चीन जाने वाले और सबसे ज़्यादा 18 बार चीनी राष्ट्रपति से मिलने वाले प्रधानमंत्री हैं, उन्होंने भरोसा बढ़ाने में कोई कदर ही छोड़ी फिर भी ये घटना हो गई।


वर्तमान परिस्थिति नाजुक है, भारतीय प्रधानमंत्री ने भी उकसाने पर सेना को जवाब देने की खुली छूट दे दी है, साथ ही कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की तैयारी भी की जा रही है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये टकराव क्यूं प्रारंभ हुआ। भारत ने श्योक नदी से दारबोक तक एक सड़क का निर्माण किया है, जिसका विस्तार अब 255 किमी दूर दौलत बेग ओल्डी तक किया जा रहा है, चीन इसी निर्माण को लेकर आक्रामक है क्योंकि उसे डर है कि सड़क का निर्माण हो जाने से भारत की आसान पहुंच सियाचिन और काराकोरम दर्रे के करीब तक हो जाएगी, जिससे बाद में भारत को घेरना मुश्किल हो जाएगा और भारत भविष्य में शिनाजियांग प्रांत को अस्थिर करने लगेगा, साथ ही यहां से निकलकर जाने वाली बेल्ट एंड रोड़ परियोजना को भी प्रभावित कर सकता है। चीन को यह भी डर है कि भारत अमेरिका के साथ मिलकर दक्षिणी चीन सागर में किसी गठजोड़ में शामिल न हो इसलिए भी चीन भारत पर ये दबाव बना रहा था, लेकिन जिस तरह भारतीय सैनिकों ने बिना हथियार के चीनी सैनिकों को जवाब दिया है, चीन ने आज की सदी में कभी इसकी कल्पना नहीं की थी। उसका ये दबाव उसी पर भारी पड़ गया क्योंकि चीनी राष्ट्रपति पहले से ही घिरे हुए हैं, उनके सत्ता परिवर्तन की हवा तूफान बनने की ओर अग्रसर है इसलिए उनका चेहरा बचाने के लिए इन कारनामों को अंजाम दिया गया। फिलहाल दुनियां इन झड़पों पर बारीकी से नज़र बनाए हुए है, लेकिन इस झड़प में भारतीय प्रतिक्रिया ने दुनियां के कई देशों जैसे वियतनाम, ताइवान, फिलीपींस, इंडोनेशिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और तिब्बत में एक नई जान फूंक दी है, अब वो भी चीन को जवाब देने में सक्षम महसूस करने लगे हैं, इसी बात ने चीन को और दबाव में ला दिया है इसलिए वो बार बार भारत को धमकी देने में लगा हुआ है।


बहरहाल, एक बात तो साफ है यह तनाव किसी जादू से और जल्दी खत्म नहीं होगा क्योंकि दोनों देशों को काफी नुकसान हुआ है। लद्दाख और बाकी सरहदों पर भारतीय सेना ने अपना मूवमेंट बढ़ा दिया है, हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति और किन्नौर जिले में अलर्ट घोषित कर दिया है। पहले जो यूनिट्स पीस स्टेशन लौटने वाली थी उन्हें रुकने को कहा गया है, लद्दाख में सीमा से सटे गांव खाली करवाने की तैयारी शुरू हो गई है मोबाइल और लैंडलाइन फोन बंद कर दिए गए हैं, जवानों की छुट्टियां कैंसिल कर दी गई है और चीन की किसी भी हरकत पर तुरंत एक्शन लेने के आदेश दिए गए हैं। इसके अलावा नौसेना को भी अपने युद्धपोत चीन से सटे इलाकों में तैनात करने के आदेश मिले हैं और वायु सेना ने भी हिमाचल और उत्तराखंड में अपने फॉरवर्ड बेस पर फाइटर जेट्स की तैनाती बढ़ा दी है। तो हम देखेंगे कि भविष्य की तस्वीर क्या होगी, क्योंकि भारत-चीन तनाव के बीच पाकिस्तान में उनकी तीनों सेना प्रमुख भी आईएसआई हेडक्वार्टर पहुंचकर रणनीति बनाने में लगे हुए हैं।

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