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सिरमौर में नाबालिग बच्चों के विवाह करने से बाज नहीं आ रहे अभिभावक, जिले की 36 पंचायतें बाल विवाह का गढ़ बनी

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 1929 एवं बाल विवाह एक्ट 2006 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र की बालिका एवं 21 वर्ष से कम आयु के युवकों की शादी निषेध है। इस तरह के विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती है।

सिरमौर में नाबालिग बच्चों के विवाह करने से बाज नहीं आ रहे अभिभावक, जिले की 36 पंचायतें बाल विवाह का गढ़ बनी
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प्रतीकात्मक तस्वीर

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 1929 एवं बाल विवाह एक्ट 2006 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र की बालिका एवं 21 वर्ष से कम आयु के युवकों की शादी निषेध है। इस तरह के विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती है। इस तरह के कृत्य करने वाले अभिभावकों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद कुछ लोग नाबालिग बच्चों की शादी कराने से बाज नहीं आते हैं।

देश में भले ही बाल विवाह बड़ा अपराध माना जाता हो, लेकिन सिरमौर जिले की 36 पंचायतें बाल विवाह का गढ़ बनी हुई हैं। हिमाचल पुलिस को चाइल्ड लाइन सिरमौर से मिले आंकड़े यही कहानी कह रहे हैं। जिले के छह ब्लॉक ऐसे हैं, जहां पांच साल में अब तक 189 बाल विवाह दर्ज किए गए हैं। यह वह मामले हैं, जो सरकारी सिस्टम की नजर में आए हैं। बड़ी संख्या में मामले सिस्टम की नजर से दूर रह जाते हैं। हिमाचल पुलिस ने अब इस आंकड़े को महिला एवं बाल विकास विभाग से साझा कर उचित कदम उठाने को कहा है।

हाल ही में डीजीपी संजय कुंडू ने सिरमौर जिले का दौरा किया था। इस दौरान पाया गया कि जिले के गिरीपार क्षेत्र के छह ब्लॉक रेणुका जी, नाहन, पच्छाद, शिलाई, पांवटा साहिब और राजगढ़ में बाल विवाह की कुप्रथा खासी प्रभावी है। इस पर कोई रोक-टोक नहीं है। डीजीपी के निर्देश पर सीआईडी ने जानकारी जुुटाई तो चाइल्ड लाइन के आंकड़ों से पता चला कि 2020 में ही अब तक 25 बाल विवाह के मामले दर्ज किए गए हैं। 2019 में 49, 2018 में 51, 2017 में 41 और 2016 में 23 मामले सामने आए हैं। डीजीपी संजय कुंडू ने कहा कि सीआईडी ने निदेशक महिला एवं बाल विकास को पत्र लिखकर उचित कदम उठाने के लिए कहा है।


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