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रिगुवन के पेड़ों पर देवी-देवता करते हैं वास, इसलिए कोई नहीं काटता लकड़ी, जानें क्या है रहस्य

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में लोग सदियों पुरानी देव आज्ञा का आज भी पूरी निष्ठा से पालन करते आ रहे हैं। धूम्रपान, शराब, जुए से दूर रहने के साथ ही जंगल यानी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाना पाप समझते हैं।

रिगुवन के पेड़ों पर देवी-देवता करते हैं वास, इसलिए कोई नहीं काटता लकड़ी, जानें क्या है रहस्य
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फाइल फोेटो

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में लोग सदियों पुरानी देव आज्ञा का आज भी पूरी निष्ठा से पालन करते आ रहे हैं। धूम्रपान, शराब, जुए से दूर रहने के साथ ही जंगल यानी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाना पाप समझते हैं। देवी-देवताओं की मान्यताओं को जहां कुछ बातों को लेकर अंधविश्वास से जोड़ा जाता रहा है। वहीं कई जगह ऐसी मान्यताएं लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है। पर्यावरण संरक्षण के लिए आज ये मान्यताएं अहम भूमिक निभा रही है।

आपको बताते चलें कि कुल्लू जिले के ग्राम पंचायत रैला के अंतर्गत आने वाले विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क की शरण बीट में देवता रिगु नाग के नाम से जाने वाले रिगुवन में आज भी दराट-दराती और कुल्हाड़ी नहीं चलाई जाती है। यहां तक कि स्थानीय पंचायत के लोगों का भी इस वन में प्रवेश निषेध है। यहां किसी विशेष उत्सव को निराहार व नहा-धोकर देवता के साथ ही नंगे पांव जाया जाता है।

घास-पत्ती व लकड़ी लाना भी है वर्जित

रिगुवन में बहुत बड़े-बड़े पेड़ है जो आज बाकी जंगलों में ढूंढे से भी नहीं मिलते। ये इतने घने हैं कि यहां अनेक जीव जंतुओं के रहने के आसार है। रिगुवन के हरे-भरे जंगल कुल्हाड़ी न चलने का कारण देव आज्ञा माना जाता है। लोग मानते हैं कि यहा के पेड़ों में देवी-देवता वास करते हैं। इन जंगलों से ग्रामीणों का घास-पत्ती व लकड़ी लाना भी वर्जित है।

रिगुवन में जाना वर्जित

हालांकि नेशनल पार्क प्रबंधन विभाग की ओर से ऐसा कोई भी सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया है, जिसमें लिखा हो कि इस रिगुवन में जाना वर्जित है, लेकिन देवता कमेटी का सूचना बोर्ड यहां जरूर लगा हुआ है। इसमें वन में दराट-दराती, कुल्हाड़ी चलाना व इसमें प्रवेश वर्जित लिखा हुआ है।

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क

कुल्लू में संजोई गई वन संपदा बंजार वैली में ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क का कुछ वन क्षेत्र, शांगड़ के साथ लगता जंगल, मणिकर्ण घाटी में पुलगा का जंगल व जीवनाला रेंज के तहत भी दो-तीन हेक्टेयर जंगल को प्राचीन समय से ही प्रतिबंधित रखा गया है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम भी है।

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