Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

उमेश चतुर्वेदी का लेख : मोदी पर निजी हमले किसलिए

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि कांग्रेस के मौजूदा और पूर्व अध्यक्ष को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा आक्रमण करने से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बेहतर हो कि निजी हमले की बजाए हालात को लेकर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार पर हमला किया जाए।

उमेश चतुर्वेदी का लेख : मोदी पर निजी हमले किसलिए
X

उमेश चतुर्वेदी

मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस की कार्यवाहक अध्यक्ष सोनिया गांधी की सपरिवार आक्रामकता का सुर्खियां बनना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन क्या इस रवैये को देश की जनता भी स्वीकार कर पा रही है? लगता है कि इस सवाल से जूझने का जोखिम कांग्रेस का प्रथम परिवार नहीं उठा रहा है। सौभाग्य की बात यह है कि स्वाधीनता आंदोलन के साथ विकसित और पल्लवित कांग्रेस में अब भी कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लगता है कि देश के मस्तक को काटने के लिए घात लगाए बैठे दुश्मन को सामने देखते हुए भी राष्ट्र की सीमाओं के भीतर ऐसी आक्रामकता न तो देश के हित में है और न ही पार्टी के हित में। लेकिन कांग्रेस का प्रथम परिवार जिस तरह अतीत में ऐसे सुझावों को नकारता रहा है, उससे अलग रवैया उसका इस बार भी नहीं रहा। ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि उसे ऐसा करने के लिए सलाह कौन दे रहा है?

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि कांग्रेस के मौजूदा और पूर्व अध्यक्ष को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा आक्रमण करने से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बेहतर हो कि निजी हमले की बजाए हालात को लेकर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार पर हमला किया जाए, लेकिन कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक समिति में दिए गए इन सुझावों को सोनिया और राहुल ने न सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि सोनिया ने समिति के अन्य सदस्यों तक को सुझा दिया कि वे भी इसी तरह प्रधानमंत्री पर आक्रामक रुख अपनाएं। चूंकि कांग्रेस का प्रथम परिवार मौजूदा कांग्रेस को जोड़े रखने की धुरी है, उसका अपना आभामंडल है, लिहाजा उसकी बात को खारिज करने की हिम्मत पार्टी के बड़े से बड़े नेता में नहीं है। जाहिर है कि इस पर चुप्पी छानी ही थी। यह पहला मौका नहीं है, जब कांग्रेस कार्यसमिति को दिए गए संजीदा सुझावों को खारिज किया गया हो। नवंबर 2004 की दीपावली की रात जब पूरा देश रोशनी के पर्व के उल्लास में डूबा था, तब भी ऐसे ही एक संजीदा सुझाव को कांग्रेस के आलाकमान ने खारिज कर दिया था। दरअसल उसी रात को अपने एक सहयोगी की हत्या के आरोप में कांचीकामकोटि पीठ के स्वामी जयेंद्र सरस्वती को तमिलनाडु पुलिस ने गिरफ्तार किया था। तब प्रणब मुखर्जी ने इसे रोकने का सुझाव दिया था। जयप्रकाश आंदोलन के दौरान जब इंदिरा गांधी ने उन पर निजी आक्षेप शुरू किए थे तो तब कांग्रेस के ही सांसद रहे चंद्रशेखर ने उन्हें आगाह किया था, लेकिन इंदिरा नहीं मानीं।

जयप्रकाश नारायण और जयेंद्र सरस्वती से प्रधानमंत्री की तुलना अटपटा लग सकती है, लेकिन इसमें दो राय नहीं है कि मोदी का भी इन दोनों हस्तियों की तरह अपना कोई परिवार नहीं है। उनकी यह पृष्ठभूमि जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता को बनाए रखने में कामयाब है। इसीलिए उन पर जब भी निजी हमले होते हैं, उसे वे अपने लिए अवसर के रूप में लेने में कामयाब रहे हैं। बहरहाल जिस तरह कांग्रेस का प्रथम परिवार प्रधानमंत्री मोदी पर हमला कर रहा है, और जिस तरह भारतीय जनता पार्टी उसका जवाब दे रही है, इससे इस जंग के निजी होने के संदेश ही जनता के बीच जा रहे हैं।

भारतीय राजनीतिक दलों में तमाम खींचतान के बावजूद राज्यसभा की सदस्यता को लेकर एकमत है। अपवादों को छोड़ दें तो सभी दल राज्यसभा की सदस्यता अपने किसी सदस्य को दो कार्यकाल से ज्यादा नहीं देते, लेकिन कांग्रेस इसका अपवाद है। मध्य प्रदेश के नेता सुरेश पचौरी ने राज्यसभा के चार कार्यकाल पूरे किए, सिर्फ इसलिए कि वे कांग्रेस आलाकमान के प्रिय पात्र रहे। अहमद पटेल ने उनका भी रिकॉर्ड तोड़ दिया है। उन्हें राज्यसभा का पांचवां कार्यकाल मिल गया है। हाल में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से पार्टी में शामिल हुए तारिक अनवर केंद्र में मंत्री तक रहे, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे, लेकिन विधानपरिषद का सदस्य बनने बिहार चले गए। यह बात और है कि तकनीकी वजहों से उनका पर्चा खारिज हो गया। यही स्थिति कर्नाटक के दिग्गज बीके हरिप्रसाद के साथ भी रही। हरिप्रसाद राज्यसभा के सांसद रहे, लेकिन जब कर्नाटक के विधानपरिषद में पार्टी को अपना सदस्य बनता दिखा तो वहां भी युवा या नया नेतृत्व नजर नहीं आया और वे अपना स्तर छोड़ पहुंच गए विधानपरिषद सदस्य बनने। कांग्रेस में ऐसा नहीं कि नीतिगत मसलों पर संघर्ष करने वाले लोग नहीं हैं, लेकिन वे हाशिए पर हैं। आलाकमान की परिक्रमा वाली मंडली इसमें लगातार विजयी बनती रही है। मध्य प्रदेश में फूलसिंह बरैया का किनारे रह जाना कांग्रेस की इसी परिपाटी का उदाहरण है। कांग्रेस को अगर सचमुच जिंदा होना है तो उसे अपनी अंदरूनी कमियों की ओर झांकना होगा। कम से कम प्रधानमंत्री मोदी पर निजी आक्षेप लगाना उसके लिए फायदेमंद नहीं हो सकता। भारत के मस्तक पर दुश्मनी घात के दौर में भी सर्वेक्षण रिपोर्टें मोदी में जनभरोसा को ही दिखा रही हैं। बेहतर को पार्टी आलाकमान अपने ही संजीदा नेताओं के संजीदा सुझावों को सुने। ऐसे सुझावों को नकारे जाने का पार्टी का अतीत झटकेदार ही है।

Next Story