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अवधेश कुमार का लेख : दिल्ली दंगों के पीछे का सच

अब हमारे सामने दंगों के किरदार एवं संगठनों के नाम सामने आ गए हैं। उनका दोष साबित करने वाले कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज, अन्य फॉरेंसिक सबूत, धन कहां से आए और कहां गए। इन सारे सबूतों को देखकर किस भारतीय का दिल नहीं दहलेगा? आखिर ये कैसे लोग हैं जो किसी सरकार के विरोध मेें इस सीमा तक जाकर देश को जलाने और अपने ही भाइयों-बहनों की हत्या को अंजाम देने की सीमा तक चले जाते हैं?

अवधेश कुमार का लेख :  दिल्ली दंगों के पीछे का सच
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अवधेश कुमार

फरवरी के अंत में दिल्ली में हुए भीषण दंगों का सामने आया पूरा सच अंदर से किसी को भी हिला देने के लिए काफी है। विशेष जांच दल यानी सिट की जांच रिपोर्ट के सामने आए अंश और अभी तक प्रमुख मामलों के दायर आरोप पत्रों से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दो दिवसीय यात्रा को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से हिंसा को अंजाम दिया गया। दंगों की योजना बनाने का केंद्र शाहीनबाग का नागरिक संशोधन कानून विरोधी धरना था।आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के बारे में आरोप पत्र कहता है कि वहीं जनवरी में उसकी उमर खालिद तथा युनाइटेड अगेन्स्ट हेट के नेता खालीद सैफी से मुलाकात हुई जहां से दंगों की तैयारी को अंजाम देना आरंभ हुआ। इन दोनों ने उसे कहा कि आप पूरी तैयारी करो और इसमें पीएफआई, पिंजड़ा तोड़ समूह तथा अन्य संगठन आपकी मदद करेंगे। एक करोड़ तीस लाख रुपया उसके खाते में आए और वो पैसे अलग-अलग लोगों तक पहुंचाए गए। हालांकि लुटियन लॉबी पत्रकार, बुद्धिजीवी, कुछ नेता जिस तरह पहले से इसे एक समुदाय का नरसंहार यानी पोग्रोम बनाने पर तुले थे उन्हें न जांच रिपोर्ट स्वीकार हो सकती है और न आरोप पत्र ही। इन्होंने पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप लगाना आरंभ भी कर दिया है।

यह बात सही है कि दंगों में मुसलमान भी मारे गए, उनके घर, दुकान आदि भी जले, उनके धर्मस्थलांें पर भी हमले हुए, किंतु यहां दो बातें आरंभ में ही स्पष्ट करना जरूरी है। एक, कि लगभग 2650 गिरफ्तारियाें में करीब 550 हिंदू भी हैं। अभी तक के आरोप पत्रों में 229 मुसलमानों को आरोपी बनाया गया है तो 211 हिंदुओं को भी। दूसरे, मूल बात दंगों की योजना से लेकर तैयारी तथा उसे अंजाम देने की है। आप साजिश रचते हैं, घटनाओं को अंजाम देने की कोशिश करते हैं, पर जरूरी नहीं कि सारी घटनाएं जैसे आप चाहें वैसे ही घटित हो जाएं। दूसरा पक्ष भी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। इससे आपका अपराध कम नहीं हो जाता।

दिल्ली दंगों में यही हुआ है। दंगों के साजिशकर्ताओं ने पहले शाहीनबाग क्षेत्र में ही इसे अंजाम देना चाहा, पर वहां की आबादी को ध्यान रखते हुए योजना बदल दी तथा उत्तर पूर्वी दिल्ली के 19 स्थान तय किए गए। जांच रिपोर्ट के अनुसार दो विशेष समितियां बनाई गई। इनमें से एक समिति को ट्रंप की यात्रा का ध्यान रखते हुए दुष्प्रचार की जिम्मेदारी दी थी जिससे लोग उत्तेजित हों। दूसरी समिति की जगह-जगह सड़क जाम तथा धरना आयाजित कराने की जिम्मेदारी थी। ये उत्तर पूर्वी दिल्ली के हर उस क्षेत्र में सक्रिय थे जिन्हें दंगों के लिए चिह्नित किया गया था। दो विशेष व्हाट्सएप ग्रुप पकड़ में आए जिनमें एक ट्रंप की यात्रा केंद्रित था। इसमें यात्रा को ध्यान में रखते हुए क्या-क्या करना है, कैसे सरकार को बदनाम करना है आदि था। दूसरे की भूमिका संदेशों से सांप्रदायिक तनाव भड़काना था। व्हाट्सएप पर चैट में कहा जा रहा है कि हमें शांति भंग करनी है। इसमें यह भी हिदायत दी जा रही है कि हमें हर हाल में मामले को हिंदू मुस्लिम मोड़ देना है। पिंजड़ा तोड़ गैंग की लड़कियां व्हाट्सएप से संदेश दे रही हैं कि महिलाएं क्या करें। वे घरों में तेजाब की बोतलें रखें, गर्म पानी रखें, गर्म तेल रखें, छतों पर ईंट-पत्थरें रखें, दरवाजा लोहे की तरह मजबूत बना दें तथा उसमें बिजली का करंट छोड़ दें। आरोप पत्र में पिंजड़ा तोड़ गैंग की ये बातें सामने आई हैं।

ताहिर हुसैन जामिया के नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शन से भी जुड़ा रहा है और जेएनयू के भी। इससे यह साबित होता है कि नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शन के स्वतःस्फूर्त होने का दावा बिल्कुल झूठ था। अभी तक के अारोप पत्र में दो बड़े किरदार दंगांें के उभरते हैं-ताहिर हुसैन तथा शिवपुरी में राजधानी पब्लिक स्कूल का मालिक फैजल फारुखी। ताहिर हुसैन ने दंगों के पहले थाने से अपनी पिस्तौल ली। 25 गोलियां कहां गईं इसका हिसाब वह नहीं बता सका। उसकी छत से वैसे 270 चक्र गोलियां चलने का रिकॉर्ड मिला है। फाॅरेंसिंक जांच से यह स्पष्ट हुआ है। जिस गुफरान के घर में वह छिपा था उसके पास से 54 कारतूस गायब मिले हैं। ये अपने-आप तो विलुप्त नहीं हो गए। ताहिर ने योजना बनाने से लेकर अंजाम देने, हिंसा का योजनाबद्ध तरीके से नेतृत्व करने, आईबी कांस्टेबल अंकित शर्मा की हत्या आदि में सक्रिय भूमिका अदा की। राजधानी स्कूल के मालिक फैजल फारुखी ने अपने स्कूल को दंगा केंद्र में बदल दिया। उसने रस्सी की सीढ़ियां बनवाईं जिससे उतरकर अपराधी तत्वों ने डीआरपी कन्वंेंट को नष्ट कर दिया। उसकी कुछ सामग्रियां राजधानी स्कूल में मिलीं हैं। फारुखी का तब्लीगी जमात से संपर्क था। उसने मौलाना मोहम्मद साद के नजदीकी अब्दुल अलीम से मुलाकात की। दोनों के कॉल रिकॉर्ड तथा मोबाइल लोकेशन से पता चलता है कि दंगों के बीच इनके बीच संपर्क बना हुआ था। फैजल दंगों से पूर्व देवबंद गया और लोगों को लेकर आया जिन लोगों ने हिंसा मेें पूरी भूमिका निभाई।

ये कुछ मोटा-मोटी बातें हमने रखीं हैं। इनके बाद यह बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती है कि दिल्ली दंगे या उसके पहले जाफराबाद से लेकर चांदबाग में सड़क जाम करने, या पुलिस वालों पर जानलेवा हमला आदि अचानक नहीं हुए। चांद बाग में कांस्टेबल रतनलाल की हत्या हो या डीसीपी अमित शर्मा पर जानलेवा हमला या जाफराबाद में शाहरुख द्वारा कांस्टेबल पर पिस्तौल तानना सब हिंसा एवं दंगों की योजना के अंग थे। दिल्ली को हिंसा की आग में झांेककर ट्रंप की यात्रा के दौरान खतरनाक स्थिति पैदा करने की हरसंभव कारस्तानी की गई ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से यह संदेश जाए कि भारत सरकार मुस्लिम विरोधी है। सुनियोजित दंगों को नरसंहार साबित करने वाले पाखंडी समूह अभी भी किंतु-परंतु कर पुलिस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ठीक है कि आरोपों को अभी न्यायालय की कठिन समीक्षा से गुजरना है। पुलिस को भी मालूम है इसलिए उसने एक-एक पहलू को पुख्ता बनाने की कोशिश की है। पुलिस ने जांच के लिए 40 टीमें बनाईं और दंगों के 60 वर्ग किलोमीटर के अंदर सारे ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड आदि को डाउनलोड कर गवाहों से उनकी पहचान कराई। कुल 1330 सीसीटीवी फुटेेज पुलिस ने एकत्रित किए। उन पहचानों को सीसीटीवी फुटेज से मिलाया। उसके बाद अपराधी चिह्नित किए गए। कुल 1100 अपराधी तो पहचाने जा चुके हैं। पुलिस ने 752 प्राथमिकियां दर्ज कीं तथा 150 हथियार बरामद किए।

अब हमारे सामने दंगों के किरदार एवं संगठनों के नाम सामने आ गए हैं। उनका दोष साबित करने वाले कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज, अन्य फॉरेंसिक सबूत, धन कहां से आए और कहां गए। इन सारे सबूतों को देखकर किस भारतीय का दिल नहीं दहलेगा? आखिर ये कैसे लोग हैं जो किसी सरकार के विरोध मेें इस सीमा तक जाकर देश को जलाने और अपने ही भाइयों-बहनों की हत्या को अंजाम देने की सीमा तक चले जाते हैं?

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