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Tokyo Paralympics : ताइक्वांडो में इतिहास रचने को तैयार हरियाणा की बेटी अरुणा तंवर

भारत को आखिरकार पैरा ओलंपिक के लिए 47 सालों के इंतजार के बाद ताईक्वांडो में पहली दिव्यांग खिलाड़ी के रूप में मिली अरुणा तंवर का जन्म दस जनवरी 2000 को हरियाणा के भिवानी जिले के दिनोद गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। दिव्यांग खिलाड़ी अरूणा तंवर ने एक साधारण परिवार से उठकर ओलंपिक तक का सफर तय किया है।

Tokyo Paralympics : ताइक्वांडो में इतिहास रचने को तैयार हरियाणा की बेटी अरुणा तंवर
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 ताइक्वांडो खिलाड़ी हरियाणा की बेटी अरुणा तंवर 

ओ.पी. पाल : रोहतक

टोक्यो में पैरा ओलंपिक के इतिहास में भारत की पहली ताइक्वांडो खिलाड़ी बनी हरियाणा की बेटी अरुणा तंवर से भारत को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। महिला ताइक्वांडो में अपने वर्ग में दुनिया की चौथे नंबर की खिलाड़ी अरुणा खुद भी भारत के लिए एक गौरवगाथा लिखने के इरादे से पैरा ओलंपिक में आत्मविश्वास के साथ हिस्सा लेकर भारत को पदक दिलाना चाहती है।

भारत को आखिरकार पैरा ओलंपिक के लिए 47 सालों के इंतजार के बाद ताइक्वांडो में पहली दिव्यांग खिलाड़ी के रूप में मिली अरुणा तंवर का जन्म दस जनवरी 2000 को हरियाणा के भिवानी जिले के दिनोद गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। दिव्यांग खिलाड़ी अरूणा तंवर ने एक साधारण परिवार से उठकर ओलंपिक तक का सफर तय किया है। इस सफर के पीछे अरूणा तंवर के परिवार व खुद का संघर्ष भी छिपा हुआ है। अरुणा के पिता नरेश कुमार एक निजी कंपनी में चालक के पद पर कार्य करते हैं, जबकि माता गृहणी है। अरुणा को पूरा विश्वास है कि पैरा ओलंपिक में वह पदक जीतकर देश के साथ अपनी माता सोनिया देवी व पिता नरेश कुमार को गौरवान्वित करेगी। 21 वर्षीया अरुणा ने पैरा ओलंपिक के लिए क्वालीफाई मुकाबलों में इतिहास रचते हुए ताईक्वांडो के 49 किग्रा वर्ग में अपनी जगह बनाई है। अरुणा तंवर ने मार्शल ऑर्ट को अपना पैशन मानते हुए पहले सामान्य वर्ग में खेलना शुरू किया, जिसने इस खेल में जमकर मेहनत की। महिलाओं की 49 किग्रा वर्ग में दुनिया की चौथे नंबर की ताइक्वांडो खिलाड़ी अरुणा ने ओलंपिक के लिए चयन होने पर रोहतक के एमडीयू में लगातार अभ्यास करके पसीना बहाया है।

हौंसला हो तो रास्ते खुद बनते हैं

भिवानी जिले के दिनोद गांव में जन्मी अरुणा तंवर के हाथ और उंगलियां बहुत ही छोटी हैं। इसके बावजूद बचपन से ही अरुणा ने खुद कभी असहाय नहीं समझा। उसके पिता नरेश कुमार एक प्राइवेट बस के चालक है, जिन्होंने अपनी बेटी के हौंसले को कभी टूटने नहीं दिया और उसके खेल को प्रोत्साहित करके दुनिया में देश का नाम रोशन करने के सपने के लिए लगातार प्रोत्साहन दिया। ओलंपिक तक के सफर के लिए पिता ने गहने बेचकर और उधारी लेकर उसके सपनों को पंख लगाए। आर्थिक तंगी के बावजूद बेटी के खेल के खर्चो में कोई कमी नहीं आने दी। परिवार के अनुसार वर्ष 2016 में उसने ताईक्वांडो खेल में अपना कैरियर शुरू किया और दिव्यांग होते हुए भी वह पहले सामान्य वर्ग में खेलती रही। बाद में उसकी मुलाकात एथलीट परविंदर बराड से हुई, जिसने अरुणा को पैरा ताइक्वांडो के बारे में जानकारी दी, तो तभी से वह पैरा ओलंपिक का सपना लेकर ताइक्वांडो में कड़ी मेहनत कर रही हैं। इस सफर तक पहुंचाने में उसे कोच स्वराज सिंह, सुखदेव राज और अशोक कुमार को बड़ा श्रेय है जिनसे उसने प्रशिक्षण लिया है। परिजनों को उम्मीद है कि अरुणा देश के लिए गोल्ड मैडल ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन करेगी।

उपलब्धियां

2017-पांचवे राष्ट्रीय पैरा ओलंपिक ताइक्वांडो प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल

2018- वियतनाम में हुई चौथे एशियन पैरा ओलंपिक ताइक्वांडो प्रतियोगिता में सिल्वर मैडल

2018- छठे राष्ट्रीय पैरा ओलंपिक ताइक्ववांडो प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल

2019-टर्की में आयोजित वल्र्ड पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप में ब्रांज मैडल

2019-ईरान में हुई प्रेजीडेंट एशियन रीजन जी-टू कप में सिल्वर मैडल

2019-जार्डन में हुई अमान एशियन पैरा ताइक्वांडो चैंपियनशिप में ब्रांज मैडल

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