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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : नशे पर कसना होगा शिकंजा

युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक ही नहीं देश का भविष्य कही जाने वाली पीढ़ी की दिशाहीनता के संकट को भी सामने रखती है| देश की युवा पीढ़ी का इस तरह से दिशाहीन होना चिंतन का विषय है। आज की बदलती जीवनशैली में जमीन से जुड़ी सोच से दूरी और हर तरह की सुख-सुविधाओं में पल रहे किशोर और युवा इस बाजार के निशाने पर हैं| कम उम्र के ग्राहकों को न सिर्फ लती बनाना आसान है, बल्कि उनके दोस्तों और हमउम्र लोगों तक ड्रग्स बाजार को फैलाना भी आसान होता हैैं, इसीलिए इन पदार्थों के सेवन ही नहीं आपूर्ति को लेकर भी सख्ती और सजगता जरूरी है| ड्रग्स की सप्लाई करने वालाें पर भी शिकंजा कसा जाना चाहिए।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : नशे पर कसना होगा शिकंजा
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डॉ. मोनिका शर्मा

हाल ही में फिल्म अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो द्वारा हिरासत में लिया गया। गौरतलब है कि क्रूज पर रेव पार्टी करते हुए आर्यन और दूसरे आठ लोगों को पकड़ा गया था। इस मामले में अब नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और खरीद-फरोख्त को लेकर पूछताछ और जांच जारी है। ऐसे में एक ओर चर्चित अदाकार के बेटे का रेव पार्टी और ड्रग्स सेवन के मामले में शामिल होना इसे सनसनी बना रहा है तो दूसरी ओर परिवार, समाज और प्रशासन के सामने युवाओं की यह दिशाहीनता बड़ी चिंता बनकर उभरी है। ऐसे वाकये नशीले पदार्थों की बढ़ती पहुंच और युवाओं में इनके इस्तेमाल के बढ़ते जूनून को लेकर चेताने वाले हैं| चिंतनीय है कि बड़े घरानों और चर्चित हस्तियों के बच्चे ही नहीं आम परिवारों के बच्चों तक भी हर तरह के नशे की पहुंच बढ़ रही है। युवा ही नहीं किशोरवय बच्चे भी ड्रग्स के जाल में फंस रहे हैं।

दरअसल, नशीले पदार्थों का सेवन व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक और यहां तक कि मानवीय सोच के मामले में भी जीवन को गहराई से प्रभावित करता है| कम उम्र के बच्चों का इस जाल में फंस जाना तो सदा के लिए जीवन में अन्धेरा कर देता है| नशे के आदी बन जाने के चलते नशीले पदार्थ खरीदने के लिए किशोर और युवा आपराधिक गतिविधियों का हिस्सा बन जाते हैं| हिंसात्मक व्यवहार और दुर्घटनाएं तो किसी भी तरह के नशे से गहराई से जुड़ी समस्याएं हैं।

शोध पत्रिका 'ड्रग एंड अल्कोहल रिव्यू' द्वारा लैंगिक अपराध और शराब के संबंध पर किए गए सर्वेक्षणों में यह तथ्य सामने आया है कि लैंगिक अपराध के लगभग आधे मामले नशे की हालत में ही होते हैं। बहुत से ऐसे मामले भी समाने आए हैं जिनमें नशे के शिकार युवाओं ने चोरी, झूठ, जालसाजी ही नहीं की बल्कि अपने परिवारजनों की जान तक भी ले ली है| देखने में यह भी रहा है कि नई पीढ़ी में बेवजह के व्यक्तिगत आक्रोश से लेकर शारीरिक व्याधियों को न्योता देने तक, ड्रग्स सभी तरह की व्यावहारिक नकारात्मकता और शारीरिक परेशानियों की जड़ हैं। अफसोसजनक बात यह है कि भारत में युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत शराब, ई-सिगरेट, हुक्का और अन्य तरह की नशीली दवाओं जैसे कई तरह से दूसरे नशों की लत का शिकार बन रहा है। किशोरों में बढ़ती नशाखोरी के चलते आपराधिक कृत्यों में उनकी भूमिका भी बढ़ी है। इतना नहीं नशाखोरी से कर्मचारियों की उत्पादकता भी कम होती है| एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में शराब पीना मौत और अपाहिज होने का पांचवा सबसे प्रमुख कारण है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपी रिपोर्ट बताती है ज्यादा शराब पीने की आदत का 200 से भी अधिक बीमारियों से संबंध है। दुर्भाग्यवश जिस तेज़ी से नशा करने वालों की संख्या बढ़ रही है, उसी अनुपात में नई पीढ़ी के जीवन में आशाओं की जगह कुछ गलत होने की आशंकाएं और मानसिक उन्माद भी बढ़ रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक दुष्कर्म, हत्या, डकैती, लूटमार जैसी छोटी-बड़ी आपराधिक वारदातों को अंजाम देने वालों में नशे का सेवन करने वालों के मामले लगभग 74 प्रतिशत हैं| ऐसे में युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक ही नहीं देश का भविष्य कही जाने वाली पीढ़ी की दिशाहीनता के संकट को भी सामने रखती है। देश की युवा पीढ़ी का इस तरह से दिशाहीन होना चिंतन का विषय है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हालिया बरसों में शराब के सेवन से लेकर प्रतिबंधित मादक पदार्थों तक, युवाओं की पहुंच और सेवन की आदत दोनों में ही इजाफा हुआ है। कुछ समय पहले आई भारत सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में नशे के लिए शराब के बाद सबसे ज्यादा भांग, गांजा, चरस और अफीम का सेवन किया जाता है। अगर व्यापक रूप से देखा जाए तो अब ऐसे नशीले पदार्थों का भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर एक बड़ा बाजार है| नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (एनडीडीटीसी) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान- दिल्ली (एम्स), द्वारा सरकार की तरफ से किए गए इस अध्ययन के मुताबिक देश में करीब 16 करोड़ लोग शराब पीते हैं, जबकि 5.7 करोड़ लोगों को अल्कोहल की लत है। साथ ही हमारे यहां करीब 3.1 करोड़ लोग भांग उत्पादों और लगभग 2.26 करोड़ व्यक्ति अफीम का सेवन करते हैं। इतना ही नहीं इसके साथ-साथ बड़ी संख्या में लोग अवैध नशीली दवाओं पर भी निर्भर हैं| यह सच में चिंता का विषय है कि 10 से 75 आयु समूह के बीच के लगभग 1.18 करोड़ लोग सीडेटिव्स (गैर चिकित्सकीय, बिना चिकित्सा नुस्खे) का इस्तेमाल करते हैं। करीब लाख 26 लाख बच्चे इनहेलेंट्स का प्रयोग करते हैं। गौरतलब है कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने वर्ष 2018 में एम्स और एनडीडीटीसी को देश के सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित क्षेत्रों में इस सर्वे की जिम्मेदारी दी थी। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह से चोरी छिपे मादक पदार्थों की बिक्री और सेवन किया जाता है, यह आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा ही होगा।

आज की बदलती जीवनशैली में जमीन से जुड़ी सोच से दूरी और हर तरह की सुख-सुविधाओं में पल रहे किशोर और युवा इस बाजार के निशाने पर हैं। कम उम्र के ग्राहकों को न सिर्फ लती बनाना आसान है, बल्कि उनके दोस्तों और हमउम्र लोगों तक ड्रग्स बाजार को फैलाना भी आसान होता है| यही वजह है कि वर्चुअल दुनिया के जरिये भी ड्रग्स की खरीद-फरोख्त होने लगी है| ड्रग्स के बाजार को योजनागत रूप से विस्तार दिया जा रहा है| नशीले पदार्थों की खेती से लेकर बिक्री और सेवन के लिए तथाकथित पार्टियां आयोजित करने तक भ्रष्टाचार, हर स्तर पर मिलीभगत और अवैध गतिविधियां भी देखने को मिलती हैं, इसीलिए इन पदार्थों के सेवन ही नहीं आपूर्ति को लेकर भी सख्ती और सजगता जरूरी है। ड्रग्स की सप्लाई करने वालाें पर भी शिकंजा कसा जाना चाहिए। प्रशासनिक स्तर पर सख्त कार्रवाई ड्रग्स की खरीद-फरोख्त रोक सकती है तो पारिवारिक स्तर पर बरती गई सजगता युवाओं को इस रास्ते पर जाने से बचा सकती है|आज के दौर में ऐसे साझे प्रयास बेहद जरूरी हैं क्योंकि ड्रग्स का जाल युवाओं के जीवन में हर बुराई के दखल का कारण बन रहा है। नई पीढ़ी के वर्तमान और भविष्य को अन्धकारमय बना रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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