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डा. महेंद्र सिंह मलिक का लेख: भ्रष्टाचार बंद-पानी का प्रबंध नारा देने वाले जननायक को आज याद कर रहा देश का किसान

ताऊ देवीलाल का मानना था कि किसान-मजदूर वर्ग का अपना कोई संगठन व राजनैतिक मंच नहीं है, जिस कारण यह वर्ग अन्नदाता होते हुए भी साहूकारों व राजनीतिज्ञों के सहारे जीने पर मजबूर है। इसलिए किसान को अपने मौलिक अधिकारों व हितों के प्रति जागरूक करने व उनमें राजनैतिक चेतना उत्पन्न करने हेतु किसान, जमींदार व गरीब वर्ग की राजनैतिक सत्ता में प्रतिनिधित्व/भागीदारी दिया जाना जरूरी है।

डा. महेंद्र सिंह मलिक का लेख: भ्रष्टाचार बंद-पानी का प्रबंध नारा देने वाले जननायक को आज याद कर रहा देश का किसान
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चौधरी देवीलाल का सफरनामा अल्पायु से ही ताउम्र संघर्ष व चुनौती पूर्ण मार्ग से होकर गुजरा है। मात्र 16 वर्ष की आयु में ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी शिक्षा बीच में छोड़कर अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े। स्वयं एक संपन्न व प्रगतिशील किसान होते हुए जीवन प्रयंत किसान, जमींगार व खेतीहर मजदूर के हितों के लिए प्रयासरत रहे और सत्ता में रहते हुए व सत्ता से बाहर होते हुए इस उपेक्षित वर्ग के कल्याण हेतू जनता के सहयोग से न्याय युद्ध, यातायात अवरूद्ध, रेल रोको, पैदल यात्रा आदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से प्रशासन व सरकार को किसान हित के कार्य करने के लिए मजबूर किया।

उनका मानना था कि किसान-मजदूर वर्ग का अपना कोई संगठन व राजनैतिक मंच नहीं है, जिस कारण यह वर्ग अन्नदाता होते हुए भी साहूकारों व राजनीतिज्ञों के सहारे जीने पर मजबूर है। इसलिए किसान को अपने मौलिक अधिकारों व हितों के प्रति जागरूक करने व उनमें राजनैतिक चेतना उत्पन्न करने हेतु किसान, जमींदार व गरीब वर्ग की राजनैतिक सत्ता में प्रतिनिधित्व/भागीदारी दिया जाना जरूरी है।उन्होंने कमेरा वर्ग के गरीब व मध्यमवर्गीय व्यक्ति ज़े भी राजनीति व सत्ता में स्थान दिलवाया लेकिन आज दुभागर्य व चिंता का विषय है कि किसान-जमींदार-काश्तकार के हितों की आवाज को बुलंद करके आवश्यक कार्यवाही करवाने वाला कोई भी एकछत्र किसान नेता नहीं है। किसान, जमींदार के नाम पर राजनीति व बयानबाजी करने वाले नेता तो बहुत हैं लेकिन उनके हितों-कल्याण की सरकार से वकालत करने वाला कोई नहीं है। आज किसान वर्ग पूर्णत: संगठनहीन व नेतृत्वहीन हो चुका है।

किसान-मजदूर संगठन भी दलगत नेताओं की दोगले रवैये के ज़रण अलग-अलग धड़ों में बंट गया है, जिस कारण किसान वर्ग को हर बार प्रशासन व पुलिस ज़र्यवाही की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। सितंबर 2020 के दूसरे सप्ताह में पिपली जिला कुरूक्षेत्र में केंद्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए किसान विरोधी कृषि अध्यादेशों के विरोध में किए जा रहे आंदोलन में किसानों पर सरेआम पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किया गया लेकिन प्रदेश सरकार का कोई भी मंत्री या नेता खुलकर किसानों के साथ किए जा रहे अन्याय व अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहा। प्रदेश सरकार के कई मंत्री व सांसद किसानों पर पुलिस कार्यवाही की निंदा कर चुके हैं। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज किसान-जमींदार की आवाज जन नेता ताऊ देवीलाल का परिवार ही राजनैतिक लहर की भेंट चढ़ चुका है। उनके परिवार से उप मुख्यमंत्री, बिजली मंत्री व विधायक सहित तीन वंशज वर्तमान प्रदेश सरकार में सत्तासीन हैं। एक पारिवारिक सदस्य कांग्रेस दल से विधायक है जबकि उनके पौत्र चौधरी अभय सिंह चौटाला एकमात्र बतौर विधायक वास्तविक एवं परंपरागत तरीके से चौधरी देवीलाल की जन कल्याणज़री व समाजवादी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने में प्रयासरत हैं। आज सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण किसान-जमींदार की निरंतर हो रही दुर्गति को मध्यनजर रखते हुए चौधरी देवीलाल के वंशजों द्वारा उनकी जन कल्याणकारी व जनहित की नीतियों को बरकरार रखना अति आवश्यक है। इस समय राष्ट्र में चारों ओर विशेषकर कृषि प्रधान प्रदेश हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि में केंद्र सरज़र के कृषि विरोधी अध्यादेशों के विरूद्ध किसानों में भारी रोष व्याप्त है और पंजाब के एक केंद्रीय मंत्री ने तो विरोध स्वरूप मंत्रीपद से त्यागपत्र दे दिया है और राष्ट्र के सभी मुख्य विपक्षी दल एकजुट होकर केंद्रीय सरज़र द्वारा जारी कृषि अध्यादेश का विरोध कर रहे हैं।

चौधरी देवीलाल का मत था कि प्रजांतत्र में जनता की अदालत ही सर्वोपरी है और आमजन की भावनाओं व हितों का सम्मान ही प्रजातंत्र की सही पहचान है। अपने शासनकाल में उन्होंने 'भ्रष्टाचार बंद, पानी का प्रबंध' और 'लोकराज लोकराज से चलता है' जैसे अनुकरणीय सिद्धांत कायम किए, जिनकी आज मांग उठने लगी है कि नेता, प्रशासन व राजनीति तंत्र सबको जनता के अधीन करना होगा ताकि चौधरी देवीलाल के जन कल्याणकारी शासन के शास्वत किया जा सके। वे मुख्यमंत्री होते हुए भी जनता के बीच चले जाते थे व बुजुर्गों व आम आदमी से खुलकर बातचीत करते थे। उनकी सोच थी कि जन सहयोगी व जनता की सरकार ही ग्रामीण समाज का कल्याण कर सकती है। इसलिए आमजन की समस्याओं के निवारण के लिए जनता दरबार, प्रशासन आपके द्वार आदि कार्यक्रमों द्वारा प्रशासन व पुलिस की जबाबदेही सुनिश्चित की। उनकी एक विशेष कल्याणकारी सोच थी कि जन कल्याणकारी व्यवस्था से ही ग्रामीण समाज के असहाय व गरीब व्यक्ति को राहत मिल सकती है। अपने शासनकाल में जनता के लिए बुढापा पैंशन, विकलांग पैंशन, विधवा पैंशन, बेरोजगार पैंशन, जच्चा-बच्चा योजना, गांव-गांव हरीजन चौपाल आदि अनेक कल्याणकारी योजनाएं शुरू की जिनसे आज पूरे राष्ट्र में अनुसरण कियया जा रहा है। महिला शिक्षा के विकास के लिए पंचायतों को तीन गुणा मैचिंग ग्रांट देने का प्रावधान किया। ऐसी जन कल्याणज़री सोच के कारण उनसे समस्त राष्ट्र में ताऊ के नाम से सम्माननीय संबोधन प्राप्त हुआ। अपनी जनप्रिय व न्यायवादी छवि के कारण वर्ष 1985 में विधानसभा की 90 सीटों में से 85 सीटें जीतकर एकछत्र नेता के तौर पर एक नई मिशाल कायम की, जिसकी बराबरी होना शायद असंभव है। इस अनूठी राजनैतिक विचारधारा की बदौलत वर्ष 1977 में जनविरोधी कांग्रेस का सफाया कर दिया जो कि वर्तमान राजनीतिज्ञों के लिए एक ऐतिहासिक अजूबे से कम नहीं है।

चौधरी साहब ने कभी भी छल-कपट व फरेब की राजनीति नहीं की। उनका कहना था कि मैं एक ग्रामीण हूं और चालाकी की राजनीति एक ग्रामीण की मर्यादा के खिलाफ है। वे सत्ता के गलियारों की बजाए अपने सीधे-साधे लोगों के साथ रहना पंसद करते थे। दगावान राजनैतिक साथियों के धोखा देकर अलग होने पर भी कभी विचलित नहीं हुए और सदैव एकछत्र शहंंशाह बनकर उभरे। किसान-मजदूर के हितों के लिए प्रधानमंत्री की पेशकश को ठुकरा कर स्वर्गीय वीपी सिंह व बाद में चंद्रशेखर तथा एचडी देवेगोड़ा को प्रधानमंत्री बनाकर निस्वार्थ व त्याग की एक ऐतिहासिक मिशाल पेश की और किंगमेकर बन गए। सोनीपत में अपने अतिंम भाषण में उन्होने कहा था कि हम राजनीति में देश की रक्षा व विकास के लिए आते हैं ना कि सत्ता सुख भोगने के लिए और निज स्वार्थ को त्यागकर जनहित में जुट जाना ही सही राजनीति है।

हरियाणा प्रदेश के गठन के लिए उनका सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय सरदार प्रताप सिंह कैरों के समक्ष उन्होंने हरियाणावासियों के हक के लिए जबरदस्त पैरवी की और उनके आंदोलन के आगे केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी अलग हिंदी भाषी क्षेत्र की मांग को मानना पड़ा। छोटे काश्तकारों को उनका दिलाने हेतु पंजाब विधानसभा में भु-पट्टेधारी नियम बनवाकर मुजारों की बेदखली को रोका गया। इस अधिनियम से 6 साल से भूमि ज़श्त कर रहे मुजारों को अदालत के माध्यम से आसान किस्तों पर जमीन खरीदने का अधिकार दिलवाकर जमान का मालिक बनवाया।

कांग्रेस की किसान विरोधी व तानाशाही नीतियों के विरोध में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और गांव-गांव जाकर किसानेां, दलितों और मजदूरों की रक्षा के लिए संघर्ष समिति गठित की। सन 1975 में जब तत्ज़लीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकालीन स्थिति लागू कर दी तो उनका डटकर विरोध किया और जेल भी गए, जहां से 19 माह बाद रिहा होकर समस्त विपक्ष को इकट्ठा करके व राष्ट्रभर में कांग्रेस की जन विरोधी कारगुजारियों से जनता को आगाह करके सर्वदलीय जनता दल का गठन किया तथा कांग्रेस का सफाया कर भारी बहुमत से स्वर्गीय श्री मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनवाया। आमजन के प्रति उनके संघर्ष व लगाव के कारण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ताऊ को जनता का प्रतीक कहा। उनको जब लगा कि किसान मजदूर के जीवन यापन के मुख्य धंधे-कृषि का विकास थमने लगा है जो कि अब पूर्णतया घाटे का सौदा बन चुका है, तो हरियाणा में ग्रामीण उद्योग योजना लागू की, जिससे कृषि का भी विस्तार हुआ लेकिन अगली सरकारों ने इस योजना को बंद कर दिया। इसके साथ ही ग्रामीण जनता के लिए रोजगार सुनिश्चित करने हेतु एक परिवार एक रोजगार आयोग गठित किया था, जिसको सन् 1991 में बंद कर दिया गया।

आज किसानों के मसीहा, महान स्वतंत्रता सेनानी, हरियाणा के जनक, जननायक चौधरी देवीलाल हमारे बीच नहीं हैं लेकिन अपने जन कल्याणकारी नीतियों एवं दूरदर्शी सोच की बदौलत वे आज भी जनता-जनार्दन के दिलों में रचे-बसे हुए हैं। यही कारण है कि आज भी चौ. देवीलाल का महज नाम लेने से ही हजारों की संख्या में बुजुर्ग एवं नौजवान उद्वेलित हो उठते हैं। उन्होंने आजीवन किसान, मजदूरों, गरीब एवं बेसहारा वर्ग के लोगों के लिए सफल लड़ाई लड़ी, जिस कारण लोग उन्हें भारतीय राजनीति के अपराजित नायक के रूप में देखते हैं। जन नायक ताऊ देवीलाल का समस्त जीवन ग्रामीण भारत में फैले व्यापक शोषण, असमानता, गरीबी व अंधेरे को समाप्त करने के लिए संघर्ष में ही व्यतीत हुआ क्योंकि वे हमेशा कहा करते थे ''मेरी असली ताकत भारत के ग्रामीण वर्ग में निहित है।'' उन्हें हिंदी भाषा के साथ-साथ उर्दू भाषा से दिल से लगाव था इसलिए उर्दू के मशहूर शायर डा. सर मोहम्मद इकबाल के शब्दों में, खुदी ज़े कर बुलंद इतना हर तदवीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है' के अत्याधिक प्रशंसक रहे हैं।

चौधरी देवीलाल ने सदैव किसान-मजदूर के दर्द को महसूस किया और जीवन प्रयंत कमेरा व लुटेरा वर्ग वर्ग के बीच की खाई को पाटने में लगे रहे। प्राकृतिक आपदा व प्रकोप के समय जनता जनार्दन के बीच पहुंचकर जन साधारण की परेशानी को दूर करने के हरसंभव प्रयास किए। आज कोरोना महामारी के दौर में चौधरी देवीलाल की समाजसेवी व जनप्रिय नीतियों का जनता के साथ तालमेल कर लागू करना अति आवश्यक है। किसान की फसल की बर्बादी को देखकर मुख्यमंत्री होते हुए सरकारी अमले को छोड़कर खेत की मेढ पर बैठकर अत्यंत मायूस हो जाते और बाढ़ के दिनों में गांव में जाकर रिंग बांध बनाने हेतु स्वयं सिर पर मिट्टी का टोकरा उठा लेते। किसान-मजदूर वर्ग के प्रति उनके जीवन में कई ऐसे उदाहरण हैं जिनका अनुसरण आज के सत्ताधारी शायद ही कर पाएं। वे मानते थे किसान सर्वाधिक मेहनती, भोला, ईमानदार व देशभक्त समुदाय है। वह एक अनिश्चित धंधे में लगा हुआ है, जो कि आज दयनीय स्तर पर पहुंच चुका है।

किसान अभी भी प्राकृतिक शक्तियों की मार के साथ-साथ मार्केट की बेरहमी व सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। चौधरी साहब ने सत्ता में आते ही प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान पर किसान को सरकारी कोश से मुआवजा दिलाने का प्रावधान किया। वर्ष 1978 में ओलावृष्टि ज़ 400 रूपये प्रति एकड़ मुआवजा दिलवाया जो इससे पहले किसी भी सरकार ने शुरू नहीं किया था और यह योजना आज तक चालू है। बाद में किसानों, काश्तकारों, मजदूरों व श्रमिकों के 10 हजार तक के ऋण माफ किए और किसान-जमींदार के लिए किसान मंडी, अपनी मंडी, मैचिंग ग्रांट, ज़म के बदले अनाज आदि लाभज़री योजनाएं शुरू की जो कि बाद में आने वाली सरकारों ने धीरे-धीरे बंद कर दी, जिस कारण किसान मजदूर आज फिर सरकारी उपेक्षा के कारण दयनीय हालत से गुजर रहा है। अब हालत ऐसे हो रहे हैं कि अन्नदाता खेत में आत्महत्या करने पर मजबूर है और उसका बेटा सीमा पर दुश्मन की गोली खा रहा है लेकिन हालात की सुध लेने वालों ज़े इसके लिए फुर्सत ही नहीं है।

आज आवश्यकता है कि ताऊ देवीलाल की नीतियों व सिद्धांतों का अनुशरण किया जाए। इससे सरकारी नीति व कार्यशैली निर्धारण में मदद मिलेगी। चौधरी साहब की जन कल्याणज़री योजनाओं व निश्छल राजनीति से प्ररेणा लेकर प्रशासनिक व राजनैतिक तंत्र की विचारधारा बदलने की नितांत आवश्यकता है ताकि ग्रामीण गरीब-मजदूर व किसान वर्ग के कल्याण व उत्थान के साथ-साथ स्वच्छ प्रशासन के लिए मार्ग प्रशस्त हो सके। वास्तव में ताऊ देवीलाल गरीब व असहाय समाज की आवाज को बुलंद करने वाले एक सशक्त प्रवक्ता थे इसलिए आज जन साधारण विशेषकर ग्रामीण गरीब-मजदूर, जमींदार व छोटे काश्तकारों को अपने अधिकारों व हितों के प्रति जागरूक करने की आवश्कता है ताकि दलगत राजनीतिज्ञ व संबंधित प्रशासन इनके हितों की अनदेखी न कर सकें तभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ज़ एक स्वावलंबी व स्वस्थ ग्रामीण समाज का सपना पूरा किया जा सकता है। अत: एक उदार हृदय एवं महान आत्मा - ताऊ देवीलाल के लेखक सदैव नत मस्तक होकर प्रणाम करता रहेगा।

किसानों की आवाज का सूर्य उदय 25 सितंबर 1914 ज़े तेजाखेड़ा गांव जिला सिरसा में हुआ और लगभग 60 साल तक किसान-जमींदार की पुरजोर आवाज बुलंद करते हुए 06 अप्रैल 2001 ज़े धरती पुत्र की आत्मा धरती में विलीन हो गई और सूर्य अस्त हो गया। आज जबकि राष्ट्र का हर किसान पूरी तरह पीडित है, वह अपनी समस्याओं के समाधान व निवारण हेतु किसी अन्य सूर्य (धरती पुत्र) के उदय होने की इंतजार में हैं।

(लेखक डॉ महेंद्र सिंह मलिक 1977 से 1979, 1987 से 1989 तथा अगस्त-सिंतबर 1999 से 6 सिंतबर 2001 तक चौधरी साहब के प्रशासनिक अधिकारी तथा पुलिस प्रमुख (गुप्तचार विभाग) रहे हैं।)

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