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डा. स्वर्ण सिंह का लेख : रिश्तों के नए अध्याय की शुरुआत

बांग्लादेश की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ के उत्सव के समापन समारोह को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दो दिवसीय यात्रा ऐतिहासिक रही। दोनों राजनेताअों ने सभी प्रकार के आतंकवाद से लड़ने और शांति बनाए रखने प्रतिबद्धता दोहरायी और कई नई परियोजनाओं का उद्घाटन भी किया भारत का बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम और तबसे इन पिछले 50 वर्षों के इतिहास में योगदान और भी अहम हो जाता है और अब प्रधानमंत्री की इस यात्रा से एक नए अध्याय की शुरुआत की उम्मीद बनती है।

डा. स्वर्ण सिंह का लेख : रिश्तों के नए अध्याय की शुरुआत
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 डा. स्वर्ण सिंह 

डा. स्वर्ण सिंह

गत सप्ताह बांग्लादेश की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ के उत्सव के समापन समारोह को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दो दिवसीय यात्रा ऐतिहासिक रही। कोविड-19 विश्वव्यापी महामारी के बाद यह प्रधानमंत्री मोदी की पहली विदेश यात्रा थी और इसमें दोनों देशों में व्यापार, तकनीक, प्राकृतिक आपदाओं, निवेश, खेल और युवाओं को लेकर कुल पांच संधियों पर हस्ताक्षर हुए।

दोनों राजनेताओं ने सभी प्रकार के आतंकवाद से लड़ने और शांति बनाए रखने प्रतिबद्धता दोहरायी और कई नई परियोजनाओं का उद्घाटन भी किया जिसमें भारत-बांग्लादेश सीमा पर तीन नई हाट और ढाका और जलपाईगुडी के बीच 'मितली एक्सप्रेस' रेल सेवा शुरू करना था। पहले से ही ढाका-कोलकाता 'मैत्री रेल' और खुलना-कोलकाता 'बंधन रेल' दोनों देशों में यातायात का सफल परीक्षण रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ओर से 109 आधुनिक रोगी वाहन यानी एम्बुलेंस और 1.2 करोड़ वैक्सीन खुराक भेंट के रूप में दिए और इसके साथ ही आशुगंज में 1971 के बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय शहीदों के स्मारक और रविंद्र भवन कूठीवरी के विकास की नींव भी रखी और लड़कियों के लिए एक स्कूल और इश्वरिपुर के जेशोरेश्वरी काली मंदिर में कम्युनिटी हॉल बनाने का प्रस्ताव किया।

हालांकि मोदी की यात्रा से पहले दक्षिण एशियाई देशों के चार और राष्ट्र अध्यक्षों ने भी इस उत्सव में शिरकत की, लेकिन बांग्लादेश की आज़ादी में भूमिका को लेकर और खासकर भारत-बांग्लादेश के गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषा को लेकर गहन रिश्तों के चलते भारत का बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम और तबसे इन पिछले 50 वर्षों के इतिहास में योगदान और भी अहम हो जाता है और अब प्रधानमंत्री की इस यात्रा से एक नए अध्याय की शुरुआत की उम्मीद बनती है।

आज के संदर्भ में देखें तो भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी आर्थिक व्यवस्था और बांग्लादेश की सबसे समृद्ध व तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था के चलते इनका आपसी तालमेल बढ़ना स्वाभाविक है। बांग्लादेश को आज विकास का उदाहरण माना जाता है। वह अपनी स्वतंत्रता के 50वें उत्सव में यह दर्शाता है कि बांग्लादेश के लिए राजनेताओं का पाकिस्तान से अलग होने का निर्णय कितना सटीक और ठीक था। आज ज्यादातर मापदंडों में पाकिस्तान से बांग्लादेश बहुत आगे निकल चुका है। खासकर जब पाकिस्तान आतंक और भारी क़र्ज़ से जूझ रहा है तो बांग्लादेश अपनी महिलाओं को रोजगार मुहैया करने, बड़े पैमाने पर कपड़ों के निर्यात करने, और गरीबी से लोगों को उबारने के लिए पूरे विश्व को अपनी सफलता का अहसास कर चुका है। बांग्लादेश की यह कामयाबी और भी आकर्षित करती है, जब हम उसके 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में वहां के लाखों लोगों की शहादत, 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान के साथ-साथ सैकड़ों राजनेताओं की सेना द्वारा हत्या और उसके बाद कई सालों तक सैन्य शासन और फिर यहां के लोगों को लगातार प्राकृतिक आपदाओं को झेलते देखते हैं। यह सब इस 50वीं वर्षगांठ को बहुत अहम बना देता है।

दूसरी ओर कोरोना महामारी में भारत में विश्व के 60 फ़ीसदी वैक्सीन का उत्पादन कर 'फ़ार्मसी ऑफ द वर्ल्ड' बनकर उभरा है और पूरे विश्व में इस चुनौती से लड़ने में सहायक सिद्ध हो रहा है। इसका सीधा फ़ायदा बांग्लादेश को मिल भी रहा है, इसलिए बांग्लादेश आज भारत का बहुत अच्छा आर्थिक हिस्सेदार हो सकता है। यह शायद अकेला पड़ोसी देश है जहां प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की अगुअाई में सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ बांग्लादेश ने अपनी विदेश नीति में भी संतुलन बनाए रखा है, इसलिए आपसी हिस्सेदारी से बांग्लादेश आज भारत की 'पहले पड़ोस', 'एक्ट ईस्ट' और 'हिंद प्रशांत' की नीतियों में भी मूल्यवान साझेदार साबित हो सकता है।

याद रहे कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन, यानी सार्क जिसकी शुरुआत बांग्लादेश ने की थी, पिछले पांच साल से निष्िक्रय है। 2015 में हुए इसके काठमांडू शिखर सम्मेलन के बाद इसका कोई शिखर सम्मेलन नहीं हो पाया। इन पांच सालों में क्षेत्रीय समीकरण बनाए रखने में एक दूसरा क्षेत्रीय संगठन जो उभरकर सामने आया है वो सात देशों का बंगाल की खाड़ी का बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग संगठन, यानि बिम्सटेक, है। बिम्सटेक का सचिवालय भी ढाका, बांग्लादेश में है। खास बात यह है कि इस संगठन में दक्षिण और दक्षिण पूर्व ऐसा के बांग्लादेश, भूटान, भारत, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका तथा थाईलैंड शामिल है। यानी बिम्सटेक एक तरफ तो दक्षिण और दक्षिणपूर्व क्षेत्रों को जोड़ता है और वहीं फिर भारत के लिए 'सार्क' की तरह इसमें चीन व पाकिस्तान नहीं है। जिस तरह से भारत की कवायद में यह बिम्सटेक प्लेटफार्म मजबूत होता जा रहा है तो यह भी भारत और बांग्लादेश दोनों देशों के आपसी तालमेल को बनाए रखने के लिए और भी महत्वपूर्ण बना देता है।

हालांकि भारत और बांग्लादेश के बीच कुछ जटिल मुद्दे भी हैं, जिन पर सहमति बनाना निहायत ही आवश्यक है। इनमें तीस्ता नदी जल बंटवारा प्रधानमंत्री मोदी की 2015 यात्रा से लंबित है। इसके बाद व्यापार और निवेश को लेकर 'व्यापक आर्थिक हिस्सेदारी' पर संधि की बातचीत भी 2018 से चल रही है। इसके चलते, भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार, जो पिछले एक दशक में लगातार बढ़कर 2018 तक 11 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, उसमें पिछले दो सालों में गिरावट आई है। इसमें गत वर्ष में आई गिरावट का कारण कोरोना महामारी भी रहा।

इसके अलावा यह आपसी व्यापार पूरी तरह से एकतरफ़ा हो चुका है और उसमें संतुलन लाकर ही उसे आगे बढ़ाया जा सकता है, इसलिए बांग्लादेश आज भारत से उसके सब निर्यात पर शून्य टैरिफ चाहता है और वह सभी नॉन -टेरिफ नियंत्रणों को समाप्त करने की भी मांग करता हैं। कोरोना महामारी के चलते भारत ने जो पड़ोसी देशों से आवागमन और निवेश पर ख़ास अंकुश लगाए थे वह उनको हटाने की मांग करता है। ई-वीज़ा की मांग करता है। तीस्ता नदी के जल प्रवाह में दिसम्बर-मार्च में 50 फ़ीसदी हिस्से का दावा करता है, जबकि यह नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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