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आलोक पुराणिक का लेख : सार्थक बहस की तलाश

बजट सत्र के पहले चरण के दौरान संसद में विपक्ष कभी भी बजट के अहम आवंटन पर बहस-मुबाहिसा में रुचि नहीं दिखाई। समूचे सत्र के दौरान हंगामा, नारेबाजी, वाकआउट ही करते रहे। सरकार अगर बजट को बेहतर बता रही है तो विपक्ष उसकी कमियों को चर्चा के बहाने सामने ला सकता था। संसद में बजट के सांगोपांग विश्लेषण की अपेक्षा रहती है। इस बार वह सिरे से नदारद है। बजट के नट-बोल्ट कहां ढीले हैं, कहां कसे हुए होने चाहिए थे। इस तरह का विश्लेषण आना चाहिए था।

BJP leader Mangal Pandey targeted Tejashwi Yadav for criticizing general budget
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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 

आलोक पुराणिक

बजट 2021-22 को केंद्र सरकार बहुत कामयाब बजट ठहरा चुकी है और स्टाक बाजार ने भी सरकार की बात की पुष्टि कर दी है और बजट के बाद स्टॉक मार्केट लगातार ऊपर की ओऱ जा रहा है। पर गौरतलब यह है कि स्टाक बाजार का ऊपर या नीचे जाना अर्थव्यवस्था के विश्लेषण का एक मानक है, एकमात्र मानक नहीं है। देश की संसद में बजट के सांगोपांग विश्लेषण की अपेक्षा रहती है। इस बार वह सिरे से नदारद है। पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने इसे अमीरों का बजट बताया है, हर बजट को ही अमीरों का ही बजट बताया जा सकता है। बजट के नट-बोल्ट कहां ढीले हैं,कहां कसे हुए होने चाहिए थे। इस तरह का विश्लेषण आना चाहिए था, पर देखन में कुछ और ही आ रहा है।

राहुल गांधी ने विपक्ष की ओर से वही पुराना आरोप दोहराया है कि सरकार दो लोग चला रहे हैं और देश के चुनिंदा पूंजीपतियों के लिए चला रहे हैं। सरकार की तरफ से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो कहा, उसका आशय है कि इस सरकार का कोई दामाद नहीं है, यह सरकार गरीबों के लिए काम कर रही है। सरकार की मनरेगा योजना का लाभ कोई दामाद नहीं उठाता है। इस तरह की चर्चाएं टीवी डिबेट के लिए तो कारगर हो सकती हैं, पर इनका कोई रिश्ता गहन विश्लेषण से नहीं है। बजट पर सार्थक चर्चा से देश का जनमानस शिक्षित होता है, पर वैसा कुछ होता दिखायी नहीं दे रहा है।

कुल मिलाकर इस बजट के आंकड़े बता रहे हैं कि यह कोरोना की तपिश से झुलसा हुआ बजट है, जिसमें आय के तमाम अनुमान धराशायी हो गये और आय-प्राप्तियां लक्ष्य के मुकाबले बहुत कम रहीं और दूसरी तरफ खर्चे उम्मीद से बहुत ज्यादा बढ़े। इसलिए सरकार का खजाना संकट में आया। इतना संकट में आया कि राजकोषीय घाटा जितना होना चाहिए था लक्ष्य के अनुसार वह तय लक्ष्य के दोगुने से भी ऊपर निकल गया-2020-21 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 9.5 फीसदी रहा। वित्तमंत्री ने उम्मीद जतायी कि 2025-26 तक यह पटरी पर लौटेगा-सकल घरेलू उत्पाद के 4.5 प्रतिशत के स्तर पर। राजकोषीय घाटा चिंता और चिंतन का विषय़ होना चाहिए था। विपक्ष से उम्मीद थी कि वह राजकोषीय घाटे के लगातार बढने पर चिंता व्यक्त करता है और साफ करता कि क्यों कोरोना से पहले भी देश के खजाने की हालत खराब होना शुरु हो गयी थी। राजकोषीय घाटा किस तरह से कम किया जाना चाहिए था, इस सवाल के जवाब विपक्ष को देने चाहिए थे। पर ऐसा कुछ देखने को ना मिला। यह दुखद है। राजनीतिक मसलों पर राजनीति तो स्वाभाविक है, पर गहन गंभीर आर्थिक मसले भी राजनीति की भेंट चढ़ जायें, यह दुर्भाग्य पूर्ण है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट के बाद के संबोधन में बताया कि इस बजट ने जीने की सुगमता पर ध्यान दिया है। जीना सुगम तब होता है जब दाल रोटी का इंतजाम रोजगार का इंतजाम ठीक होता रहे। रोजगार बढ़ेगा, इस बजट से ऐसी उम्मीद की जा सकती है क्योंकि नये करों से आम आदमी की क्रय क्षमता पर चोट नहीं की है, हां यह बात और है कि आम आदमी को वह राहत भी ना मिली, जो इस संकटग्रस्त समय में उसकी मुश्किलें आसान कर देती। उसका जीना सुगम बना देती। सरकार का दावा है कि 2021-22 का बजट 6 स्तंभों पर टिका है। पहला स्तंभ है स्वास्थ्य और कल्याण, दूसरा-भौतिक और वित्तीय पूंजी और अवसंरचना, तीसरा-आकांक्षी भारत के लिए समावेशी विकास, मानव पूंजी में नवजीवन का संचार करना, 5वां-नवाचार और अनुसंधान और विकास, 6वां स्तंभ-न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन। ये सारे स्तंभ नये नहीं हैं, समय समय पर किसी ना किसी रुप में नीतिगत घोषणाओं में आते रहते हैं। घोषणाओं को जमीन पर उतार लाना मुश्किल और महत्वपूर्ण काम है। समावेशी विकास वक्त की बड़ी जरुरत है। कोरोना ने पहले से मौजूद असमानता की खाई को और और चौड़ा कर दिया है। मनरेगा जैसी ग्रामीण गारंटी योजना के लिए 73000 करोड़ रुपये रखे गये हैं। कोरोना संकट से गुजरती अर्थव्यवस्था में आर्थिक पायदान में सबसे नीचे खड़े तबकों के लिए कष्ट बहुत हैं। मनरेगा योजना ऐसे तबकों के लिए मददगार साबित होती है। पर बजट के आंकड़े बताते हैं कि 2021-22 के लिए मनरेगा के लिए जो राशि आवंटित की गयी है-73000 करोड़ रुपये, यह राशि 2019-20 में इस मद में आवंटित राशि 71687 करोड़ रुपये के आसपास ही है। 2019-20 यानी कोरोना काल से पूर्व अवधि, तो क्या यह माना जाये कि अर्थव्यवस्था के स्थिति कोरोना पूर्व जैसे सुधर गयी है, और अब अर्थव्यवस्था की निचली पायदान पर खड़े लोगों को कुछ सहारा देने की जरुरत नहीं है। इस तरह के तीखे सवाल विपक्ष पूछ सकता था और केंद्र सरकार से इन सवालों के समुचित उत्तर की आवश्यकता थी, पर ऐसा कुछ ना हुआ।

पेट्रोल-डीजल पर कृषि सेस लगाया गया है, पेट्रोल पर प्रति लीटर 2.50 रुपये और डीजल पर प्रति लीटर 4 रुपये का कृषि सेस लगाया गया है। हालांकि अभी यह बताया गया है कि इसका असर आम ग्राहक पर ना पड़ेगा। पर एक बात तय है कि अगर पेट्रोल और डीजल की महंगाई आम आदमी की तरफ लगातार हस्तांतरित होती रही, तो आम आदमी पर महंगाई का बोझ पड़ना पक्का है। महंगाई भी एक तरह का कर ही है। महंगाई के मसले को विपक्ष धारदार तरीके से उठाने में विफल रहा है। महंगाई और बजट का रिश्ता क्या है, इस सवाल का जवाब तलाशा जाता तो निश्चय ही विपक्ष सरकार को कटघरे में खड़ा कर पाता, पर पूरी बजट बहस चंद जुमलों के इर्द गिर्द घूमती दिखायी दी। बजट किस तरह से रोजगार को बढ़ायेगा, इस सवाल पर गहन चर्चा की जरुरत थी। पर यह चर्चा नहीं हुई।

2021-22 के लिए रक्षा व्यय 4.78 लाख करोड़ रुपये रखा गया है, इसके पिछले साल यानी 2020-21 में यह बजट 4.71 लाख करोड़ रुपये का था। रक्षा बजट में करीब 1.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गयी है। चीन और पाकिस्तान के साथ सतत संघर्ष की स्थिति है, क्या ऐसी सूरत में यह बढ़ोत्तरी पर्याप्त है। चीन ने भारत की जमीन दबा ली, नहीं दबायी, यह बहस अपनी जगह है, पर रक्षा बजट पर व्यापक चर्चा की जरुरत थी, जो ना हो पायी। कुल मिलाकर इस बजट पर ऐतिहासिक विमर्श हो सकता था। पर हुआ नहीं। संसद के हंगामे इस बार बजट विमर्श पर बुरी तरह से हावी रहे। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह बहुत दुखद है। बजट सत्र के पहले चरण के दौरान संसद में विपक्ष कभी भी बजट के अहम आवंटन पर बहस-मुबाहिसा में रुचि नहीं दिखाई। समूचे सत्र के दौरान हंगामा, नारेबाजी, वाकआउट ही करते रहे। सरकार अगर बजट को बेहतर बता रही है तो विपक्ष उसकी कमियों को चर्चा के बहाने सामने ला सकता था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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