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प्रोफेसर रणबीर सिंह का लेख: पंजाब संकट का हरियाणा की राजनीति पर प्रभाव

हरियाणा में तब ये कहावतें आम हो गई थी कि घोडे के पिछाडी और अफसर के अगाडी नहीं जाना चाहिए और कीचड के फिसले और पुलिस के पीटे का बुरा नहीं मानना चाहिए। इससे हरियाणा की जनता के मन से अधिकारियों व पुलिस का डर हमेशा के लिए समाप्त हो गया और जो आज तक भी करीबन ज्यों का त्यों जारी है।

हरियाणा की कहानी: प्रोफेसर रणबीर सिंह।हरियाणा की कहानी: प्रोफेसर रणबीर सिंह।

13 अप्रैल के दिन जरनैल सिंह भिंडरावाला के गुट और निरंकारियों के बीच हुए टकराव से शुरू हुए पंजाब संकट ने धीरे-धीरे उग्र रूप धारण करना शुरू कर दिया। इस संकट को गहरा करने में कांग्रेस के ज्ञानी जैल सिंह और दरबारा सिंह गुटों के बीच टकराव, 1980 में अकाली सरकार को बर्खास्त करने, अकाली दल के द्वारा 26 जुलार्ठ 1981 के दिन धर्म युद्ध मोर्चा शुरू करने, भिंडरावाला समर्थक आतंकवादियों के द्वारा उसी वर्ष संपादक लाला जगतनारायण और उनके बेटे रमेश चंद्र की हत्या करने, विदेश ताकतों के द्वारा समर्थित भिंडरावाला के अनुयायियों का स्वर्ण मंदिर पर कब्जा करने तथा वहां पर हथियार जमा करने, 1982 में एशियाई खेलों के समय हरियाणा में दिल्ली जा रहे सिखों के साथ बुरा व्यवहार करने, आतंकवादियों द्वारा पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या करने और खालिस्तान की मांग करने के बाद यह सकंट चरम सीमा पर पहुंच गया था।

इस स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर सेना के आपरेशन ब्लूस्टार ने इसे और भी गहरा कर दिया था। इस आपरेशन से अकाल तख्त और मंदिर परिसर के अन्य भागों का भारी नुकसान हुआ था और सिख जनमानस की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची थी। 31 अक्टूबर 1984 के दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों के द्वारा हत्या कर दी गई और ये संकट और भी ज्यादा गहरा गया। इसके बाद दिल्ली और देश के दूसरे भागों में सिख विरोधी दंगे हुए। इस संकट के समाधान के लिए इंदिरा गांधी के उत्तराधिकारी और उनके बडे बेटे राजीव गांधी ने 24 जुलाई 1985 को अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगेवाल के साथ पंजाब समझौता किया गया। इस समझौते का हरियाणा की राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पडा।

इसमें दिए गए सीमा विवाद और पानी के बंटवारे के लेकर किए गए प्रावधानों को हरियाणा के नेताओं ने अन्नाय करार दिया। चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में हरियाणा संघर्ष समिति ने जन आंदोलन छेड दिया और इसे हरियाणा का पहला जन आंदोलन भी कहा जा सकता है। जिसमें शहरी ग्रामीण सब वर्गों और सब जातियों की भागीदारी थी। इस आंदोलन में खाप पंचायतों ने भी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई थी। इस की प्रमुख रणनीति रास्ता रोको थी। इस आंदोलन में राज्य के विभिन्न राजमार्गों को वृक्ष काटकर रोक दिया गया था। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इस आंदोलन ने हरियाणा की राजनीतिक संस्कृति को भागीदारी वाली संस्कृति में तब्दील कर दिया था। तब ये कहावतें आम हो गई थी कि घोडे के पिछाडी और अफसर के अगाडी नहीं जाना चाहिए और कीचड के फिसले और पुलिस के पीटे का बुरा नहीं मानना चाहिए। इससे हरियाणा की जनता के मन से अधिकारियों व पुलिस का डर हमेशा के लिए समाप्त हो गया और जो आज तक भी करीबन ज्यों का त्यों जारी है।

चौधरी भजनलाल की सरकार इसे काबू करने में असफल रही थी। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी जगह 1986 में चौधरी भजनलाल को केंद्र में मंत्री बनाकर हरियाणा में चौधरी बंसीलाल को मुख्यमंत्री बना दिया लेकिन वो भी आंदोलन को काबू में नहीं कर सके। चंडीगढ के पंजाब को स्थानांतरण करने के निर्णय को स्थगित करने के बाद सतलुज यमुना नहर का निर्माण शुरू होने के बाद यह आंदोलन भी स्थगित कर दिया गया। इन सबका प्रभाव 1987 में हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला।

इस चुनाव में लोकदल भाजपा गठबंधन को 90 में 76 स्थान मिले। लोकदल को 60 और भाजपा को 16, सीपीआई और सीपीएम का एक एक उम्मीद्वार भी चौधरी देवीलाल के समर्थन से चुनाव जीते। सात सीटें निर्दलीयों ने जीती। वे सभी भी चौधरी देवीलाल के समर्थक थे और कांग्रेस केवल पांच सीटें ही जीत पाई। चुनाव के बाद चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल भाजपा गठबंधन की सकार बनी। इस सरकार में चौधरी देवीलाल के दो बेटों चौधरी ओमप्रकाश चौटाला और चौधरी रणजीत सिंह के बीच सत्ता के दो महत्वपूर्ण केंद्र बन गए। निर्णय लेने में इन दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही और अंदर खाते दोनों के बीच सत्ता का संघर्ष भी चल पडा। सरकार, मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों में खेमेबंदी हो गई लेकिन ये सब काफी समय तक अंदरखाते चलता रहा। इसी बीच 1989 में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई और इसने हरियाणा की राजनीति में एक नया अध्याय जोडने का काम किया।

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