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डॉ. सत्यवान सौरभ का लेख : ड्रैगन पर नकेल जरूरी

तिब्बत भी चीन का शिकार हो चुका है। चीन का अपना भूभाग केवल 14 लाख वर्गमील है, बाकी 22 लाख वर्गमील भूमि पर चीन उसने अधिकार जमा लिया है। अब उसकी गिद्ध दृष्टि भारत की 48000 वर्गमील भूमि पर लगी हुई है।

डॉ. सत्यवान सौरभ का लेख : ड्रैगन पर नकेल जरूरी
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डॉ. सत्यवान सौरभ

पिछले कुछ समय से जिस तरह चीन भारतीय सीमा पर अपने सैनिकों व शस्त्रों की संख्या बढ़ा रहा था। उसको लेकर भारत की जो आशंका थी चीनी सैनिकों के साथ हुई झड़प से स्पष्ट हो गई है। लद्दाख की गलवान घाटी में सीमा पर धक्कामुक्की के दौरान भारतीय सेना के एक कर्नल समेत 20 जवानों की मृत्यु ने देश को झकझोर दिया है। सीमा पर सैनिकों की शहीद जितनी दु:खद है, उतनी चिंताजनक भी है।

सन 1975 के बाद पहली बार भारत-चीन सीमा पर झड़प की वजह से सैनिक शहीद हुए हैं। नियंत्रण रेखा पर शांति जरूरी है, लेकिन इन शहादतों के बाद दोनों देशों के बीच शांति और सौहार्द के लिए कई दशकों से चले आ रहे विश्वास निर्माण के उपाय शायद काफी न हों। जिस तरह हालात अचानक बदले हैं, उससे सकारात्मक विकास की संभावना बहुत कम हो गई है। पिछले साढ़े चार दशकों में यह पहला मौका है जब भारत-चीन सीमा पर लाशें गिरने की नौबत आई है। चीन की यह आक्रामकता समझ से परे है। कुछ खबरों में कहा गया है कि चीनी सैनिक भी हताहत हुए हैं, लेकिन चीन ने न तो इसकी पुष्टि न करते हुए भारत पर आरोप लगाया है कि भारतीय सैनिकों ने सीमा पार करके हमला किया। चीन पर भरोसा करना ही गलती है। चीन ने एक तरफ बातचीत करने का ढोंग किया और दूसरी तरफ जो भारतीय अधिकारी बातचीत के बीच एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था, उसे ही मार दिया। चीन की इस दादागिरी और विस्तारवादी वृत्ति को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 नवम्बर 1959 को संसद में बोलते हुए कहा था, चीन की आकांक्षा विस्तारवादी है।

पिछले वर्षों में चीन ने अपनी सीमा हर तरफ बढ़ाई है, मंचूरिया 1911 तक चीन पर राज्य करता था, आज उसका नामोनिशान तक बाकी नहीं है। वह चीन का उत्तर-पूर्वी भाग भर रह गया है, तुर्किस्तान सिकियांग बन गया, मंगोलिया अपना अस्तित्व खो बैठा है। तिब्बत भी चीन का शिकार हो चुका है। चीन का अपना भूभाग केवल 14 लाख वर्गमील है, बाकी 22 लाख वर्गमील भूमि पर चीन उसने अधिकार जमा लिया है। अब उसकी गिद्ध दृष्टि भारत की 48000 वर्गमील भूमि पर लगी हुई है। आज चीनी यह प्रचार कर रहे हैं कि तिब्बत चीन के हाथ की हथेली है और लद्दाख, भूटान, सिक्किम, नेपाल और आसाम उसकी पांच उंगलियां हैं। स्पष्ट है कि यदि लद्दाख और लौंग्जू में चीन की आक्रमणात्मक कार्रवाइयों का शीघ्र प्रति-उत्तर नहीं दिया गया तो फिर चीन को बढ़ावा मिलेगा। भारत बार-बार यही कहता आ रहा है कि वह किसी अन्य देश की इंच भर भी जमीन नहीं चाहता, न ही किसी से युद्ध की इच्छा रखता है। 1962 के चीनी आक्रमण को भूलकर भारत ने चीन से संबंध सुधारने की पहल करते हुए 1966 में आपसी व्यापार शुरू किया और आज स्थिति यह है कि भारतीय बाजार चीनी उत्पादों से भरे पड़े हैं। आज के समय में कोई भी देश अपनी धरती पर युद्ध नहीं चाहता, लेकिन जब अपने स्वाभिमान पर ही चोट हो तो युद्ध से भागा भी नहीं जा सकता।

पिछले दो-तीन माह में चीन ने पाकिस्तान व नेपाल के माध्यम से भारत पर दबाव डालने की कोशिश की, लेकिन जब उसे लगा कि दोनों देश असफल हो रहे हैं तो फिर उसने स्वयं आगे आकर सीमा पर दबाव बनाना शुरू किया। लद्दाख में हुई सैनिक झड़प उसी का एक उदाहरण है। सड़क निर्माण की शिकायत के आधार पर चीनी सैनिकों का वास्तविक नियंत्रण रेखा पार करके नए इलाकों पर कब्जा करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

भारत-चीन में युद्ध कब शुरू होगा इसका निर्णय तो सरकार व सेना ही लेगी, लेकिन हम भारतीय इसी पल से चीनी उत्पाद न खरीदने का संकल्प लेकर चीन विरुद्ध जंग शुरू कर सकते हैं। तभी चीन की दादागिरी पर नकेल डाली जा सकेगी। भारत सरकार को देश व दुनिया को चीनी बदनीति बारे बताना होगा। भारतीय को विश्वास में लेते हुए चीन के विरुद्ध एक ठोस नीति अपनाकर चलना होगा। चीन पर राजनीतिक, आर्थिक व सैनिकतीनों स्तर पर दबाव बनाकर चलने की आवश्यकता है। चीन के आंतरिक हालात खराब है। आर्थिक विकास गति धीमी हो रही है और कोरोना महामारी के कारण उस की विश्व में साख कमजोर हो गई है। अपने ही घर में चीन सरकार को विरोध का सामना कर रहा है, अपने नागरिकों का ध्यान हटाने के लिए चीन कुछ भी कर सकता है। इसलिए भारत को अति सतर्क रहने की आवश्यकता है। भारत एक उदार देश है। अपनी मर्जी थोपने की बीजिंग की कोशिश 1962 में भले चल गई थी, लेकिन अब नहीं चलेगी। भारत की ताकत को लगभग पूरी दुनिया मान रही है तो चीन को भी विचार करना चाहिए। भारत का अपना विशाल आर्थिक वजूद है, जिससे चीन विशेष रूप से लाभान्वित होता रहा है। साथ ही, चीनियों को भारत में अपनी बिगड़ती छवि की भी चिंता करनी चाहिए।

गलवान झड़प से सबक लेते हुए हमें चीन को अहसास करते रहना होगा। भारत को सैन्य नहीं तो राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर तो चीन विरुद्ध युद्ध छेड़ना होगा, तभी उस पर नकेल कसी जा सकेगी। चीन का रवैया सुधरने के स्पष्ट संकेत जल्दी नहीं आते तो हमें उसको सबक सिखाने काे तैयार रहना होगा।

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