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जाति आधारित जनगणना पर सरकार का रुख सही

1931 की जनगणना में आखिरी बार एकत्रित किए गए जातिगत आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई मंडल आयोग की सिफारिशों पर ही तत्त्कालीन वीपी सिंह सरकार ने अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी। क्षेत्रीय दलों को लगता है कि अगर जाति आधारित जनगणना होती है और उसमें एससी, एसटी और ओबीसी की आबादी अधिक होती है तो फिर उसके आधार पर आरक्षण को कोटा बढ़ाने की मांग की जा सकती है।

जाति आधारित जनगणना पर सरकार का रुख सही
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : केद्र जाति जनगणना एक बार फिर सुर्खियों में है। बिहार के सीएम व जदयू नेता नीतीश कुमार कुमार समेत करीब दस दलों के नेता ने पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर जाति जनगणना की मांग की है। यह मांग तक की गई है, जब सरकार मानसून सत्र के दौरान जाति आधारित जनगणना से इनकार कर चुकी है। साफ है कि जाति के आधार पर राजनीति करने वाले दल जाति जनगणना की मांग कर अपनी सियासत को ही आगे बढ़ा रहे हैं। आखिरी बार 1931 में जाति आधारित जनगणना की गई थी और उसके आंकड़े जारी हुए थे।

1941 में भी जाति आधारित जनगणना हुई थी, पर उसके आंकड़ नहीं जारी हुए थे। 1951 के बाद से लगातार जाति आधारित जनगणना की मांग को सरकार खारिज करती रही है। यह सच्चई है कि देश की सियासत जाति के आधार पर चलती है। देश के अधिकांश क्षेत्रीय दलों का जनाधार जातिगत ही है। जदयू, राजद, सपा, बसपा, इनेलो, द्रमुक, अन्ना द्रमुक, टीएमसी, टीआरएस, असम गण परिषद से लेकर भाजपा व कांग्रेस तक सोशल इंजीनीयरिंग की बदौलत सत्ता की सीढ़ी चढ़ती रही है। हाल ही में भाजपा शासित केंद्र सरकार ने मेडिकल शिक्षा में ओबीसी को 27 फीसदी व आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण को 10 प्रतिशत कोटा देने का ऐलान किया है।

उत्तर प्रदेश में आगे विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा के ओबोसी कार्ड से दलित व पिछड़ी जाति आधारित जनाधार वाले क्षेत्रीय दलों को अपनी जमीन खिसकती दिख रही है, शायद इसलिए वे जाति आधारित जनगणना की मांग को लेकर मुखर हैं। 1931 की जनगणना में आखिरी बार एकत्रित किए गए जातिगत आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई मंडल आयोग की सिफारिशों पर ही तत्त्कालीन वीपी सिंह सरकार ने अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी। क्षेत्रीय दलों को लगता है कि अगर जाति आधारित जनगणना होती है और उसमें एससी, एसटी और ओबीसी की आबादी अधिक होती है तो फिर उसके आधार पर आरक्षण को कोटा बढ़ाने की मांग की जा सकती है। जाति आधारित जनगणना की मांग करने वाले दलों का मानना है कि देश में करीब 60 फीसदी ओबीसी की आबादी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने 2006 में देश की आबादी पर नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा कि ओबीसी आबादी देश की कुल आबादी की करीब 41 फीसदी है। ऐसे में ओबीसी के लिए 27 फीसदी कोटा कम है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) ने 2011 में सामाजिक आर्थिक एवं जाति जनगणना कराई थी, जाति के आंकड़े जारी नहीं हुए। सरकार मानती है कि जाति आधारित जनगणना से सामाजिक विभाजन और गहरा होगा। जाति आधार पर आरक्षण संविधान में केवल अनुसूचित जाति व जनताति के लिए ही दस साल के लिए प्रावधान किया गया था, लेकिन राजनीतिक दलों ने इसे तुरुप का पत्ता मान कर इसे आगे बढ़ते गए। भाजपा को रोकने के लिए पूर्व की वीपी सिंह सरकार ने तो 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण का ऐलान कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत के बाद कि केंद्रीय स्तर पर 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं हो सकता, सरकारों ने नई घोषणाएं करनी बंद की। राज्यों में तो 70 प्रतिशत तक आरक्षण है। 21वीं सदी में जातिगत जनगणना की मांग बेमानी लगती है। जब हम सामाजिक स्तर पर जातिवाद का विरोध करते हैं, जाति का नाम लेने पर उसे अपशब्द समझते हैं, ऐसे में जाति जनगणना कराना सामाजिक खाई को बढ़ाना है। जाति आधार पर जनगणना नहीं कराने का सरकार का रुख तर्कसंगत व सही है।

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