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प्रभात कुमार रॉय का लेख : वैश्विक आतंकवाद का हो खात्मा

अमेरिका के अंध विरोध में चीन का अनुसरण करने से परहेज करना चाहिए। रूस को तर्कसंगत विदेश नीति पर अमल करते हुए तालिबान हुकूमत को कदाचित मान्यता नहीं देनी चाहिए। वैश्विक महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक कशमकश और सैन्य अंतरद्वंदों में फंसी दुनिया के सिर पर वैश्विक आतंकवाद के विस्तारित हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। तालिबान के अफगानिस्तान में सत्तासीन होने से भारत में आतंकवाद का खतरा बहुत अधिक बढ़ गया है। 1989 में कश्मीर में आतंकवाद का आग़ाज अमेरिकन सीआईए और पाक आईएसआई की कयादत में अफगान लड़ाकों ने किया था।

प्रभात कुमार रॉय का लेख :  वैश्विक आतंकवाद का हो खात्मा
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

तालिबान के विरुद्ध 20 वर्षों तक निरंतर जंग करने वाला अमेरिका ही अफगानिस्तान में तालिबान के सत्तासीन होने का रास्ता तैयार करता है। पाकिस्तान की तर्ज पर ही चीन सरकार और अफगानिस्तान में तालिबान हुकमरानों के बीच कुटिल कूटनीतिक संबंध शुरू हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकार कह रहे हैं कि विश्व पटल पर कुछ वक्त पहले ही वैश्विक आतंकवादी करार दी जाने वाली तालिबान तंजीम की यह विकट कूटनीतिक कामयाबी है, जबकि चीन का अनुगमन करते हुए उसका निकट दोस्त देश रूस भी अफगान लड़ाकों द्वारा प्रदत्त अपने समस्त ऐतिहासिक जख्मों को भुलाकर अमेरिका के विरुद्ध अपनी पुश्तैनी दुश्मनी की झोंक में तालिबान से हाथ मिलाने के लिए तत्पर हो गया है।

उल्लेखनीय है कि चीन की लालफौज विगत अनेक वर्षों से अपने शिनजियांग प्रांत में उइगरों की तंजीम पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के विरुद्ध जंग में जूझ रही है। चीनी सरकार की समझ है कि तालिबान हुकूमत को मान्यता और सहायता देकर, उसके लिए शिनजियांग प्रांत में सक्रिय आतंकवादियों का सफाया आसान हो जाएगा। चीन का यह भी कूटनीतिक अंदाजा गलत भी सिद्ध हो सकता है, क्योंकि धर्मान्ध आतंकवादियों की बुनियादी फितरत में परिवर्तन कभी नहीं देखा गया। मौहब्बत और जंग में सभी कुछ जायज होता है, इस कुटिल उक्ति का अनुसरण करते हुए वैश्विक आतंकवाद पर अपने तमाम समाजवादी नजरिये को दरकिनार करके, चीन सरकार वस्तुतः पाक़ और तालिबान सरकारों की अंधी हिमायत कर रही है। दुनिया के दो ताकतवर सैन्य गुटों में बंट जाने के बाद अफ़गानिस्तान में अमेरिका को शिकस्त देने की खातिर चीन द्वारा पाक़ फौज के जरिये तालिबान को भरपूर सैन्य सहायता प्रदान की गई। अफगानिस्तान से अमेरिका की अत्यंत अपमानजनक विदाई के पश्चात चीन वहां अपना आर्थिक साम्राज्य स्थापित करने की फिराक में जुट गया है। चीन की विस्तारवादी नज़रें अफ़गानिस्तान में विद्यमान एक ट्रिलियन डॉलर के खनिज खजाने पर टिकी हुई हैं।

सत्तासीन होते ही चीन और रूस का कूटनीतिक समर्थन हासिल हो जाने के बाद तालिबान हुक्मरानों के हौसले बहुत अधिक बुलंद हो चले हैं। उल्लेखनीय है कि तालिबान के विगत सत्ता काल (1996-2001) में उसकी हुकूमत को केवल पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई द्वारा ही मान्यता दी गई थी और इन तीन देशों के अतिरिक्त सारी दुनिया के देशों ने तालिबान हुकूमत को नकार दिया था। सर्वविदित है कि अमेरिका के साथ निरंतर दगाबाजी करके तालिबान को ताकतवर बनाए रखने में और अंततः सत्तासीन कराने में पाक़ फौज़ का विशिष्ट किरदार रहा है। अमेरिका ने पाक़ सरकार की दगाबाजी के कारण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने उसकी आर्थिक और सैन्य सहायता खत्म कर दी तो चीन ने पाक़ के साथ गहन गठजोड़ कर लिया। अमेरिका ने भी दोहा करार में तालिबान हुक्मरानों के झूठे वादों पर यकीन कर लिया और तालिबान को संपूर्ण तौर पराजित किए बिना ही अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला ले लिया। अमेरिका सरकार के इस राजनीतिक निर्णय ने अमेरिकी और नॉटो फौज़ की बीस वर्ष के कड़े सैन्य संघर्ष और बलिदानों को धूल में मिला दिया। विगत 42 वर्ष से वैश्विक आतंकवादियों के निर्माण का कारखाना बने हुए पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि तो बहुत पहले ही धूल धुसरित हो चुकी है, किंतु तालिबान के अफगानिस्तान में सत्तासीन हो जाने के पश्चात पाक़ के अपने सीमावर्ती खैबर पख्तूनखवा प्रांत में पाक़ तहरीक ए तालिबान द्वारा संचालित पृथकतावादी आतंकवाद का खतरा बहुत अधिक बढ़ चुका है।

उल्लेखनीय है वर्ष 2007 में जनरल मुशर्रफ की हुकूमत के दौर में लाल मस्जिद पर हुए पाक़ फौज़ के हमले के पश्चात मुल्ला बैहतुल्ला महसूद की क़यादत में पाक़ तहरीक़-ए-तालिबान की बुनियाद रखी गई और पाक़ तालिबान द्वारा पाक़ सरकार को उखाड़ फेंकने का ऐलान कर दिया गया। पाक तालिबान ने विगत 14 वर्ष के दौर में पाक फौज के प्रबल प्रतिष्ठानों पर कई बार भीषण हमले किए जा चुके हैं। पाक तालिबान तंजीम के मुजाहिद आतंकवादियों का आधार इलाका खैबर पख्तूनख्वा प्रांत स्थित रहा है। अफ़गान दहशतगर्दों को सैन्य प्रक्षिशण देने वाली पाक़ फौज़ वस्तुतः खुद ही पश्तून मुजाहिदों के घातक आक्रमणों का प्रायः शिकार बनती रही है। अफगान तालिबान और पाक़ तालिबान के मध्य वैचारिक और सैन्य ताल्लुकात रहे हैं। दोनों ही तालिबान तंजीमें कट्टरपंथी धर्मान्ध नज़रिया रखती हैं। अफगान और पाक तालिबान तंजीमों में पश्तून लड़ाके ही सक्रिय हैं। दोनों तालिबान तंजीमें ड्यूरंड लाइन को ब्रिटिश राज की साजिश करार देती, जो पश्तूनों की ताकत को विभाजित करने के लिए खींची गई थी। दोनों तालिबान तंजीमें वृहत अफगानिस्तान का स्वप्न साकार करना चाहती हैं। अफगान तालिबान की अफ़गानिस्तान फतह से प्रेरित होकर पाक तालिबान बड़ी तादाद में खैबर पख्तूनखवा प्रांत के कबायली इलाके (फाटा) और वजिरिस्तान में दाखिल हो चुके हैं। पाकिस्तान में बलूच और पश्तून पहले से ही बगावत पर उतारू रहे हैं।

तालिबान के सत्तासीन होने के बाद पूर्व सोवियत रूस के मुस्लिम बाहुल्य वाले प्रांत कजाकिस्तान, किरगिस्तान, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान में मुजाहिद आतंकवाद का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है, जो अब आजाद मुल्क बन चुके हैं। ये सभी मुसलिम बाहुल्य वाले मुल्क वर्तमान रूस की कॉनफोडरेशन के सदस्य देश हैं। दस वर्षों तक अफ़गानिस्तान में धर्मान्ध आतंकवादियों का कड़ा सैन्य मुकाबला करने वाले रूसी नेता आतंकवादियों के बुनियादी वहशियाना चरित्र को क्यों विस्मृत कर बैठै हैं। प्रांत चेचेन्या में आतंकवाद का कामयाब मुकाबला कर चुकी रूस की सरकार को तालिबान हुक्मरानों की नृशंस फितरत को हकीकत की नजर से परखना चाहिए और अमेरिका के अंध विरोध में चीन का अनुसरण करने से परहेज करना चाहिए। रूस को तर्कसंगत विदेश नीति पर अमल करते हुए तालिबान हुकूमत को कदाचित मान्यता नहीं देनी चाहिए। तालिबान हुकूमत को ईरान ने मान्यता प्रदान करने का मन बना लिया है।

वैश्विक महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक कशमकश और सैन्य अंतरद्वंदों में फंसी दुनिया के सिर पर वैश्विक आतंकवाद के विस्तारित हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। तालिबान के अफगानिस्तान में सत्तासीन होने से भारत में आतंकवाद का खतरा बहुत अधिक बढ़ गया है। 1989 में कश्मीर में आतंकवाद का आग़ाज अमेरिकन सीआईए और पाक आईएसआई की कयादत में अफगान लड़ाकों ने किया था। 1990 के दशक के ऐतिहासिक दौर में अफगान आतंकवादियों का परिपोषण अमेरिका, पाक और सऊदी अरब कर रहे थे। आज के दौर में धर्मान्ध तालिबान को पालने पोसने का काम पाकिस्तान के साथ चीन भी करेगा। कश्मीर को सैन्य बल से हथियाने के लिए पाकिस्तान की पुश्तपनाही में चीन खड़ा हो गया है। भारत को तो भविष्य में पाक़ और चीन के साथ तालिबान की संयुक्त चुनौतियों का कड़ा मुकाबला करना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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