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यादें: डोगराई हाथों में था, आदेश मिलता तो लाहौर भी कब्जा लेते

रोहतक केे सुनारियां गांव के सूबेदार मेजर प्रताप सिंह बधवार ने लगाया उम्र का शतक, साझा की अपनी सेना से जुड़ी यादें।

यादें: डोगराई हाथों में था, आदेश मिलता तो लाहौर भी कब्जा लेते
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सूबेदार मेजर प्रताप सिंह बधवार।

1965 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में जाट रेजीमेंट का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। जाट रेजीमेंट की थर्ड बटालियन में तैनात रोहतक के सुनारियां गांव के रहने वाले सूबेदार मेजर प्रताप सिंह बधवार ने उम्र का शतक लगाया है। वो सौ साल के हो गए हैं और उनकी रेजीमेंट ने पिछले दिनों उनका सम्मान समारोह भी किया था। युद्ध से जुड़ी अनेक बातें बताते हुए इस उम्र में भी वे जोश से भर जाते हैं। सादा जीवन बिता रहे प्रताप सिंह बधवार ने धर्मेंद्र कंवारी से बात करते हुए भारत पाकिस्तान के युद्ध की कई जानकारियां साझा की। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के अंश।

सवाल : दादा जी राम-राम, कैसे हो, आपका स्वास्थ्य कैसा है। सौ साल की उम्र पूरा हो गई कैसा लग रहा है?

प्रताप सिंह : मैं बिल्कुल ठीक हूं। सादा खाना, दाल और राेटी लेता हूं। चूरमा, खीर नहीं खा पाता हूं इस उम्र में लेकिन पसंद बहुत थे। खा तो लूं लेकिन हजम नहीं हो पाते हैं। सौ साल की उम्र हो गई है इसलिए ज्यादा हेवी खाना नहीं लेता।

सवाल: दादा जी आप फौज में कब भर्ती हुए थे और किससे प्रेरणा मिली थी

प्रताप सिंह: सन‍् 1942 में जाट रेजीमेंट की थर्ड बटालियन में भर्ती हुआ था। उस समय बीस-इक्कीस साल का था। मेरे पिता भी रिटायर्ड आर्मी अफसर थे उन्होंने ही भर्ती होने के लिए कहा था।

सवाल: जब 1965 का युद्ध हुआ, उस समय आपकी पोस्टिंग कहां पर थी और उस समय की क्या पुरानी बातें याद हैं आपको?

प्रताप सिंह: उस समय अटारी बॉर्डर पर तैनात था। मेरी थर्ड बटालियन, जाट रेजीमेंट में पोस्टिंग थी। हमें आदेश मिला था कि डोगराई के ऊपर कब्जा करना है, जो नहर थी डोगराई के अंदर जाती हुई, उस पर कब्जा करना है। पूरी बटालियन में जोश भर गया था। पहली बार पांच सितंबर 1965 को कब्जा किया था, पर हमें स्पोट नहीं मिली टैंको की, जिसकी वजह से हमें सोगल नहर छाेड़नी पड़ी, सोगल नहर के ऊपर उन्हाेंने पूल बनाया हुआ था लैंटर का, जब हम वहां पहुंचे तो उन्होंने उस पूल को तोड़ दिया और नहर के अंदर पानी छोड़ दिया ताकि हम उसे पार ना कर सकें। फिर हमने दोबारा उसके ऊपर कब्जा किया, उसमें हमारा भी काफी नुक्सान हुआ और उनका भी काफी नुक्सान किया हमने। इक्कीस 21 सितंबर को फिर से डोगराई पर कब्जा कर लिया था। उस समय हमारे 100 के करीब लोग मरे थे और 200 के करीब जख्मी हुए थे। इसमें पाकिस्तान का कितना नुक्सान हुआ हमें नहीं पता। पर हमने 114 शव अपने हाथों से गाड़ी में लोड करवाए थे। तब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी हमसे मिलने आए थे और मेरा उनके साथ फोटो भी है।

सवाल: क्या आप डोगराई से लाहौर में भी कूद सकते थे।

प्रताप सिंह: लाहौर पहुंचने में 14 मील का फासला ही रह गया था पर हमें आदेश नहीं मिला। हम आराम से लाहौर पहुंच जाते लेकिन फौज में तो हुकुम मानते हैं कि आगे नहीं जाना तो नहीं जाना। बाद में हमें तो डोगराई शहर भी खाली करना पड़ा था, जो शिविर हमने लिथा वहां हमे स्पोट नहीं मिली, ना खाने की ना टैंकों की। जिस कारण हमें वो खाली करना पड़ा। फिर जब हमें दोबारा कहा गया तो उनको पकड़ो, उसमें भी नुक्सान हमारा भी हुआ और उनका भी नुक्सान हमने किया। एक बार तो हनमे डोगराई कब्जा लिया था पर हमें स्पोट नहीं मिली। एक राइफल से क्या करते। हमारे पास पीसीआईएसएम 62 राइफल थी। उनके पास कौनसी राइफल थी, हमें नहीं पता। उनके पास सारे अमेरिकन हथियार थे। अमेरिका पाकिस्तान को हथियार देता था। चीन थी उनको हथियार देता था।

सवाल : क्या आपका कोई साथी शहीद भी हुआ था जो हरियाणा का हो। 

प्रताप सिंह : पैंशन आए कई साल हो चुके हैं, अभी नाम याद नहीं। कई लोग शहीद हुए थे। मैं ही किस्मत वाला था जो बचकर वापस आ पाया। जब युद्ध में तोपखाना फायर हुआ तो एक बड़ा टुकड़ा मुझे भी लगा लेकिन भगवान की दया से मुझे कुछ नहीं हुआ। फिर मैने उठकर अपने इष्टदेव हनुमान जी को याद किया कि बाबा मुझे किस बात की सजा दे रहे हो। फिर मेरे पास से कोई गोली नहीं गुजरी। 

सवाल: दादा जी, आपका गांव तो बहुत बदल गया उसके बाद, अब गांव सुंदर है या पहले सुंदर होता था।

प्रताप सिंह: पहले छोटा गांव था, अब बहुत बड़ा हो गया है। पहले पंजाब से जो रेल आती थी गांव से उसकी सीटी भी सुनती थी। अब कोई आवाज नहीं आती क्योंकि ट्रैफिक इतना हो गया है कि पता ही नहीं लगता कि कब रेलगाड़ी आई। अब हमारा गांव ताे बहुत मशहुर हो गया है। पहले एक असफर होता था, जिसका हमारे गांव के आदमी ने कत्ल कर दिया था। वो रोहतक के डीसी थे। उसके बाद सुनारिया में जेल भी बन गई है। 

सवाल : क्या आप उर्दू भी पढ़ लेते हैं। 

प्रताप सिंह: हमारे समय में तो उर्दू ही थी, हमने तो बाद में हिंदी सीखी। हिंदी ने तो आजादी के बाद में ज्यादा जाेर पकड़ा है। अब उर्दू को जानने वाला कोई नहीं। अब तो उर्दू के अखबार भी नहीं आते। 

सवाल : क्या आप अखबार भी पढ़ लेते हो।

प्रताप सिंह: हां अखबार पढ़ लेता हूं पर अब अखबार में अक्षर बहुत छोटे कर दिए हैं। मैं रोज दो अखबार पढ़ लेता हूं एक हरिभूिम और एक अन्य हिंदी अखबार। 

सवाल : आपकी सेहत का क्या राज है?‍

प्रताप सिंह: मैं शराब दवाई के तौर पर पीता था और सादी दाल रोटी खाता हूं। अब ताे सरकार भी फौजियों के लिए बहुत कुछ कर रही है। फौजियों का इलाज भी फ्री होता है, पर आजादी से पहले ऐसा नहीं था। 

सवाल : जाट रेजीमेंट आपको सम्मानित करने आई थी, कैसा लगा। 

प्रताप सिंह: बहुत अच्छा लगा, उन्होंने मुझे याद किया इस मौके पर।  मैं अभी और नहीं जीना चाहता। अभी लोगों की हालत देखकर और जीने का मन नहीं करता। आज लोग एक दूसरे पर भरोसा नहीं करते। आज की युवा पीढ़ी बुजुर्गों की बात नहीं सुनती। युवा अपने बड़े- बुजुर्गों के पास बैठते ही नहीं हैं। पहले लोग साथ बैठकर हुक्का पीते थे। पर अब किसी को काम हो तो दूसरे से बात करता है बिन काम नहीं। अब मतलब की दुनिया हो गई है। हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। अगर कोई बड़ा आदमी आता था जो सभी उसे राम राम जरूर करते थे। मैने एफए किया था, उस समय सुनारियां गांव में प्राइमरी स्कूल था, जिसके बाद रोहतक के वैश्य स्कूल में पैदल जाते थे और पैदल आते थे। बडा अच्छा टाइम था बेटा अब वो समय कहां मिलेगा?

(सूबेदार मेजर प्रताप सिंह का इंटरव्यू देखने के लिए यूट्यूब पर हरिभूमि टीवी चैनल को सब्सक्राइब करें। )

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