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दीपेंद्र ने किसानों के मुद्दे पर चर्चा के लिए दिया नोटिस, सभापति ने किया अस्वीकार

हुड‍्डा ने कहा कि एक तरफ देश का पेट भरने वाला किसान राजधानी की सीमा पर खड़ा है और किसान का बेटा देश की सुरक्षा के लिये कंधे पर रायफल लिये देश की सीमा पर खड़ा है। दूसरी ओर सरकार सरकार न तो किसानों से बातचीत कर रही है न ही संसद में चर्चा कर रही है।

दीपेंद्र ने किसानों के मुद्दे पर चर्चा के लिए दिया नोटिस, सभापति ने किया अस्वीकार
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सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने बुधवार को पूरे विपक्ष की तरफ से राज्य सभा में नियम 267 के तहत किसानों के मुद्दे पर चर्चा कराने के लिए नोटिस दिया था, जिसे सभापति ने अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि एक तरफ देश का पेट भरने वाला किसान राजधानी की सीमा पर खड़ा है और किसान का बेटा देश की सुरक्षा के लिये कंधे पर रायफल लिये देश की सीमा पर खड़ा है। दूसरी ओर सरकार सरकार न तो किसानों से बातचीत कर रही है न ही संसद में चर्चा कर रही है। चर्चा से भागने से स्पष्ट है कि सरकार के पास किसानों के हित में बताने के लिये कुछ नहीं।

दीपेंद्र हुड्डा ने कहा कि सरकार लगातार कह रही है कि तीनों कृषि कानून से किसानों को फायदा होगा तो सरकार संसद में चर्चा करके उनके फायदे बताए। बिना चर्चा के किसानों को फायदे का कैसे पता चलेगा। सारा देश जानना चाहता है कि जिन कानूनों का देश के किसान विरोध कर रहे हैं उनसे आखिर किसको फायदा होगा। उन्होंने आगे कहा कि इस देश की 70 फ़ीसदी आबादी खेती पर नर्भिर है। सरकार ने पहले तो किसानों को किसान मानने से नकारा, किसानों की मांगों को नकारा, किसानों की कुर्बानियों को नकारा, जब संसद में उन्होंने किसानों के प्रति संवेदना प्रकट करने की बात कही तो उसको भी नकारा और आज एक बार फिर सत्ता के अहंकार में सरकार ने किसानों के मुद्दे पर चर्चा को भी नकार दिया।

उन्होंने कहा कि आजादी के बाद देशवासियों ने अपने जीवनकाल में ऐसा कोई आंदोलन नहीं देखा जो 105 दिन से लगातार चल रहा हो, जहां आंदोलनकारियों ने तमाम आरोप और तिरस्कार झेले हों, जहां से लगभग 300 शव अपने घर जा चुके हों फिर भी आंदोलनकारी इस प्रजातंत्रिक व्यवस्था और इस सदन पर आस लगाए, धैर्य और संयम के साथ, लाखों की तादाद में अपना घर बार छोड़कर दल्लिी बार्डर पर बैठें हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या हम यूं ही मूक दर्शक बने रहेंगे? क्या सरकार उनको उनके हाल पर छोड़कर चुनाव प्रचार में व्यस्त हो जाएगी? क्या यह 300 लोग देश के नागरिक नहीं है? सरकार इनके लिए संवेदना तो छोडिए, संवाद तक स्थापित करने से भी कतरा रही है।

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