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पीजीआई में क्लेप्ट क्लीनिक शुरू, बच्चों के जन्म से कटे होंठ और तालू का इलाज होगा

बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी, ऑर्थोडॉन्टिक्स, स्पीच थैरेपिस्ट, ओरलसर्जरी व शिशु रोग विभाग के चिकित्सक एक साथ बैठेंगे। इसका बड़ा फायदा मरीज को ये होगा कि बच्चे के इलाज के लिए अलग-अलग विभाग में जांच करवाने के लिए जाने की जरूरत नहीं होगी।

पीजीआई में क्लेप्ट क्लीनिक शुरू, बच्चों के जन्म से कटे होंठ और तालू का इलाज होगा
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हरिभूिम न्यूज रोहतक

पीजीआईएमएस की ओपीडी में क्लेफ्ट क्लीनिक शुरू हो गया है। यहां बच्चे के जन्म से कटे होंठ या कटे हुए तालु का इलाज होगा। ओपीडी के कमरा नंबर-211 में हर महीने के पहले और तीसरे शनिवार को दोपहर 12 बजे तक यह सुविधा मिलेगी। खास बात ये है कि बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी, ऑर्थोडॉन्टिक्स, स्पीच थैरेपिस्ट, ओरलसर्जरी व शिशु रोग विभाग के चिकित्सक एक साथ बैठेंगे। इसका बड़ा फायदा मरीज को ये होगा कि बच्चे के इलाज के लिए अलग-अलग विभाग में जांच करवाने के लिए जाने की जरूरत नहीं होगी।क्लेफ्ट क्लीनिक बजे बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह और डॉ. रेखा की अध्यक्षता में शुरू किया गया है। बता दें कि हर महीने 15-20 मरीज ऐसे पहुंच रहे हैं, जिन्हें होंठ और तालू कटा होने की शिकायत है।

डॉ. कुलदीप सिंह ने बताया कि 2 मार्च को पीजीआईडीएस में क्लेफ्ट विषय पर कॉन्फ्रेंस थी। इसमें कुलपति डॉ. अनीता सक्सेना ने सुझाव दिया था कि ऐसे मरीजों को कई विभागों के चिकित्सकों के सामूहिक इलाज की जरूरत होती है। उन्हें भटकना ना पड़े इसलिए एक ही जगह सभी चिकित्सक सामूहिक रूप से क्लेफ्ट क्लीनिक शुरू करें। डॉ. कुलदीप ने बताया कि अब यह क्लीनिक शुरू किया गया है। इसमें बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी के डॉ. अभिषेक, ऑर्थोडॉन्टिक्स विभागाध्यक्ष डॉ. रेखा के साथ डॉ. मनीषा कुकरेजा, डॉ. विनी, डॉ. नमेंक्ष, स्पीच थैरेपिस्ट डॉ. हिमांशु, ओरलसर्जरी और शिशु रोग विभाग के चिकित्सक मरीजों का इलाज करेंगे।

युवा होने तक 4-5 सर्जरी करनी पड़ती हैं

डॉ. कुलदीप ने बताया कि ऐसे मरीजों की युवा अवस्था तक कम से कम 4-5 सर्जरी होती हैं। जिन बच्चों के होंठ कटे होते हैं उनकी पहली सर्जरी 3 महीने के होने पर, तालु कटा होने पर सर्जरी 1 साल की उम्र होने पर, मसूड़ों की सर्जरी 8 से 10 साल की आयु होने पर व नाक-जबड़े की सर्जरी 13 से 14 साल की उम्र होने के बाद की जाती है। डॉ. रेखा शर्मा ने बताया कि ऐसी बीमारी करीब 800 बच्चों में से एक बच्चे में पाई जाती है। डॉ. मनीषा कुकरेजा ने बताया कि रिसर्च में सामने आया है कि लोगों में यह वहम है कि अंधेर में बच्चा पैदा होने से, गर्भवती महिला द्वारा कैंची चलाने या ग्रहण में कुछ खा लेने से बच्चों में ऐसी समस्या आती है। लेकिन यह धारणा गलत है। डॉ. विनी ने बताया कि यदि बच्चे के जन्म से ही उसे चिकित्सक की सलाह पर लगातार स्पीच थेरेपी व दातों की एलाइनमेंट ठीक करवाएं तो उससे बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं। इस अवसर पर डॉ. अभिषेक, डॉ. नमेंक्ष, डॉ. विनी, डॉ. हिमांशु सहित कई चिकित्सक उपस्थित रहे।

क्लेफ्ट रिसर्च को संस्थान में करने के लिए मंजूरी

सरकार और एसीएस डॉ. जी अनुपमा संस्थान की उन्नति के लिए दिन-रात कार्य कर रहे हैं। रिसर्च के लिए बजट उपलब्ध करवाया जा रहा है। आईसीएमआर द्वारा क्लेफ्ट रिसर्च को संस्थान में करने के लिए मंजूरी दी गई है। कुलपति डॉ. अनीता सक्सेना के प्रयासों से संस्थान में रिसर्च के आयाम स्थापित हो रहे हैं और आईसीएमआर द्वारा संस्थान को रिसर्च के कई प्रोजेक्ट प्रदान किए गए हैं। - डॉ. संजय तिवारी, प्राचार्य, पीजीआईडीएस

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