Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

किसान आंदोलन के 100 दिन पूरे, किसान अपनी मांगों पर अब भी अडिग

इन 100 दिनों में मौसम से लेकर हालात तक बहुत कुछ बदल गया, लेकिन नहीं बदला तो केवल...किसानों का रुख। तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद भी किसान आंदोलन आज भी बदस्तूर जारी है। दिल्ली को चारों तरफ से घेेरे बैठे किसानों की संख्या के साथ ही बॉर्डरों पर लगने वाले टैंटों की संख्या भी कभी ज्यादा तो कभी कम होती रही है।

किसान आंदोलन के 100 दिन पूरे, किसान अपनी मांगों पर अब भी अडिग
X

विष्णु कुमार : सोनीपत

केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की दहलीज पर चल रहे किसान आंदोलन के आज 100 दिन पूरे हो गए। इन 100 दिनों में मौसम से लेकर हालात तक बहुत कुछ बदल गया, लेकिन नहीं बदला तो केवल...किसानों का रुख। तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद भी किसान आंदोलन आज भी बदस्तूर जारी है। दिल्ली को चारों तरफ से घेेरे बैठे किसानों की संख्या के साथ ही बॉर्डरों पर लगने वाले टैंटों की संख्या भी कभी ज्यादा तो कभी कम होती रही है। आंदोलन के पहले दिन से लेकर 100वें दिन तक स्थिति में काफी कुछ परिवर्तन हुआ, लेकिन इन 100 दिनों में एक बात नहीं बदली, वो है किसानों का रुख, जो आज भी उसी बात पर अडिग हैं कि जब तक किसानों की मांगे पूरी नहीं होती, तब तक वे बॉर्डर से पीछे नहीं हटेंगे।

बता दें कि केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में 24 सितंबर से चल रहे किसान आंदोलन को मजबूती देते हुए किसानों ने 26 नवंबर को दिल्ली कूच किया था। रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को पार कर किसान 27 नवंबर को कुंडली बॉर्डर पहुंचे, जहां हरियाणा-दिल्ली की पुलिस ने किसानों को आगे जाने से मना कर दिया, लेकिन किसान जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की बात कह आगे बढ़ने लगे। दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग कर किसानों को रोकना चाहा तो गुस्साए किसानों ने ट्रैक्टर की सहायता से बैरिकेडिंग तोड़ने का प्रयास किया, जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए लाठी चार्ज के साथ ही वाटर कैनन का प्रयोग किया। यही नहीं किसानों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले भी दागे। दिल्ली बॉर्डर पर 27 नवंबर को पूरा दिन स्थिति तनावपूर्ण बनी रही।

बॉर्डर के इस तरफ किसान खड़े थे तो वहीं दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस किसानों को रोकने के लिए तैनात रही। किसानों का दिल्ली चलो अभियान दिल्ली की सीमा के भीतर नहीं पहुंच पाया तो तय हुआ कि दिल्ली के बुराड़ी मैदान में प्रदर्शन की अनुमती दी जाए, जिसे किसान नेताओं ने ठुकरा दिया और कुंडली बॉर्डर पर ही डटकर आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। तभी से किसान मांगों को लेकर बॉर्डर पर डटे हुए हैं और आंदोलन को मजबूती के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।

किसानों व सरकार के बीच हो चुकी 11 दौर की वार्ता, नतीजा शून्य

तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन को लेकर किसान नेताओं व सरकार के बीच एक नवंबर को बातचीत का दौर शुरू हुआ। पहले दौर की वार्ता के बाद अब तक किसानों व सरकार के बीच 11 दौर की वार्ता हो चुकी है। सभी वार्ताओं में किसान नेता तीन कृषि कानूनों को वापिस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की मांग पर अड़े हैं। इस बीच सरकार किसान नेताओं को कानून दो साल तक स्थगित करने का प्रस्ताव भी दे चुकी है, जिसे किसान नेताओं ने सर्वसम्मति से ठुकरा दिया है। किसान नेताओं का कहना है कि तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने से कम उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं है।

भारत बंद की सफलता ने भरा जोश

सरकार द्वारा किसानों की मांगे न मानने पर किसान नेताओं ने 8 दिसंबर को तीन घंटे के भारत बंद का आह्वान किया था। किसान संगठनों ने इस दौरान बाजारों को भी बंद करने का आह्वान किया था। इस दौरान कुछ स्थानों पर ट्रैफिक रोका गया। किसानों का भारत बंद कुछ राज्यों में ही असरदार रहा था। हालांकि शांतिपूर्ण सफल हुए बंद ने किसानों में नया जोश भरने का काम किया था। जिसके बाद किसान नेताओं ने आंदोलन को कड़ा करते हुए आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

ट्रैक्टर रैली से दिखाई एकजुटता, लाल किले की घटना से कमजोर पड़ा आंदोलन

किसानों ने तीन बॉर्डरों से ट्रैक्टर रैली निकालकर एकजुटता का संदेश दिया। शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई इस रैली ने यह दिखा दिया कि किसान एक बड़ी रैली भी आयोजित कर सकते हैं। इसके बाद किसान नेताओं ने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर तिरंगा रैली निकालने का आह्वान किया। इससे पूर्व ट्रैक्टर रैली की रिहर्सल की गई। हालांकि 26 जनवरी को निकाली गई ट्रैक्टर रैली समय से पूर्व ही दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर गई। कई गुट लाल किले की ओर कूच कर गए। यहां पुलिस व किसानों के बीच जमकर टकराव हुआ। इस दौरान जमकर हिंसा हुई, लाल किले की प्रचीर पर किसानों का एक जत्था पहुंचा और सिक्खों के धार्मिक झंडे को फहरा दिया। लाल किले पर मचे उपद्रव के बाद धरनास्थल पर डटे किसानों ने वापसी शुरू कर दी थी। इस घटना के बाद किसान आंदोलन कमजोर पड़ने लगा था।

टिकैत के आंसूओं ने भरा जोश

लाल किले की घटना के बाद किसान आंदोलन लगातार कमजोर होता जा रहा था। किसानों की वापसी को देखकर लगने लगा था कि अब आंदोलन खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। 28 जनवरी को पुलिस ने गाजीपुर बॉर्डर खाली कराने की तैयारी कर ली थी। जिसके तहत पुलिस किसान नेता राकेश टिकैत को गिरफ्तार करने पहुंची, लेकिन टिकैत के आंसूओं ने देश भर के किसानों में फिर एक नया जोश भर दिया और आधी रात को ही पुलिस को वापिस लौटना पड़ा। जिसके बाद आंदोलन ने नया रूप ले लिया।

कई किसानों की हो चुकी है मौत

किसान आंदोलन के दौरान अकेले कुंडली बॉर्डर पर अब तक 25 किसान अपनी जान गंवा चुके हैं। भीषण सर्दी और बारिश का सामना करने के बाद किसान अब गर्मी का सामना करने को तैयार है। तन झुलसाने वाली गर्मी शुरू होने से पहले ही किसान सभी तैयारियां पूरी करना चाहते हैं। इसके लिए धरनास्थल पर लगाए गए टैंटों में मच्छरदानी लगाने के साथ ही पंखे व कूलर भी लगने लगे हैं। यही नहीं यहां लगने वाले लंगर का मैन्यू भी बदल गया है। किसान नेताओं का कहना है कि स्थिति चाहे कुछ भी हो जाए, जब तक मांगे पूरी नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रखेंगे।

Next Story