Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

Corona Pandemic: कोरोना ने छीना हजारों बच्चों के सिर से माता-पिता का साया, भविष्य के साथ जिंदगी जीने के लिए ऐसे कर रहे संघर्ष

Corona Pandemic: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बताया कि महामारी के कारण 3,621 बच्चों के माता-पिता दोनों की मौत हो गई हैं और 26,000 से अधिक ऐसे बच्चे हैं, जिनके माता या पिता में से किसी एक की मौत हो चुकी है। 10 वर्षीय शताक्षी सिन्हा के पिता की करीब एक महीने पहले कोविड-19 के कारण मौत हो गई थी और अब वह अपने जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है।

Corona Pandemic: कोरोना ने छीना हजारों बच्चों के सिर से माता-पिता का साया, भविष्य के साथ जिंदगी जीने के लिए ऐसे कर रहे संघर्ष
X

Corona Pandemic कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने सुनामी की तरह सब कुछ तबाह करके चली गई। इस दौरान जिन लोगों ने अपने प्रियजन को खोया है उनकी पीड़ा की तुलना नहीं की जा सकती, लेकिन इस बीमारी ने जिन बच्चों के सिर से उनके माता-पिता (Children Lost Presents) का साया छीन लिया, उनके दु:ख और परेशानियों दूर कर पाया बेहद मुश्किल है। माता-पिता के न रहने के कारण ये बच्चे ना केवल भावनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, बल्कि कई बच्चे वित्तीय परेशानियों से भी जूझ रहे हैं, जिसके कारण उनके भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

3,621 बच्चों के माता-पिता की हुई मौत

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बताया कि महामारी के कारण 3,621 बच्चों के माता-पिता दोनों की मौत हो गई हैं और 26,000 से अधिक ऐसे बच्चे हैं, जिनके माता या पिता में से किसी एक की मौत हो चुकी है। 10 वर्षीय शताक्षी सिन्हा के पिता की करीब एक महीने पहले कोविड-19 के कारण मौत हो गई थी और अब वह अपने जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसकी मां कल्पना सिन्हा ने कहा कि चीजें पहले की तरह सामान्य कभी नहीं हो पाएंगी। कल्पना के 57 वर्षीय पति एक हिंदी प्रकाशन घर के संपादक थे और परिवार में कमाने वाले एकमात्र व्यक्ति थे। शताक्षी के सामने अब चुनौती यह है कि भले ही उसकी देखभाल करने के लिए उसके पास मां है, लेकिन उसके पास अब कोई वित्तीय सहयोग नहीं है।

दिल्ली सरकार ने ऐसे बच्चों की फीस माफ करने का दिया निर्देश

दिल्ली सरकार ने स्कूलों को उन बच्चों की फीस माफ करने का निर्देश दिया है, जिनके माता-पिता की कोविड-19 के कारण मौत हो गई है। कल्पना ने सरकार की इस योजना के तहत अपनी बेटी के स्कूल में नि:शुल्क शिक्षा के लिए आवेदन किया है, लेकिन उसे अभी तक कोई उत्तर नहीं मिला है। इसी प्रकार, उत्तम नगर में रहने वाले गौरंग (13) और दक्ष गुप्ता (छह) के पिता ई-रिक्शा चालक थे और परिवार में कमाने वाले एकमात्र व्यक्ति थे, लेकिन उनकी भी संक्रमण के कारण मौत हो गई। लॉकडाउन के कारण पिता की आय कम हो जाने के कारण इन दोनों बच्चों के लिए जीवन पहले भी आसान नहीं था, लेकिन पिता की मौत के बाद उनकी परेशानियां और भी बढ़ गई हैं।

कैलाश सत्यार्थी संस्था ने भी इन बच्चों के लिए बढ़ाए मदद के हाथ

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी के नेतृत्व वाला गैर सरकारी संगठन 'बचपन बचाओ आंदोलन' (बीबीए) ऐसे बच्चों की पहचान कर रहा है, जो महामारी के कारण अनाथ हो गए हैं। कल्पना ने कहा कि उसने बीबीए के एक स्वयंसेवक से संपर्क किया, जिसने उसे मदद का भरोसा दिलाया है। इस महीने की शुरुआत में, संगठन ने राष्ट्रीय राजधानी में महामारी के दौरान अनाथ हुए बच्चों की संख्या के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट की सहायता भी मांगी थी। बीबीए के निदेशक मनीष शर्मा ने कहा कि हमारे स्वयंसेवक ऐसे बच्चों का पता लगाने और उन्हें भोजन एवं आश्रय देकर राहत देने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि हमारे संगठन की भी सीमाएं हैं। हम इन बच्चों को दीर्घकालिक सहायता देने के लिए राज्य सरकार के अधिकारियों के संपर्क में हैं। इन बच्चों की देखभाल करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

Next Story