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स्पेशल रिपोर्ट: इस जिले में हाथी पांव के 106 मरीज, फाइलेरिया के नाम पर अभिशप्त हुआ ये गांव

फाइलेरिया के नाम पर अभिशप्त हुआ दानीटोला-जालमपुर वार्ड, पता नहीं चला कब हाथी पांव में बदल गए लोगों के पैर, जिले में फाइलेरिया के 184 मरीज हैं। इसमें से 106 मरीज हाथी पांव के शिकार हैं, यानि उनके पैरों में सूजन है। 3 मरीजों के हाथ में, 66 पुरूषों के अंडकोष में, 5 महिलाओं के स्तन और 1 व्यक्ति के अन्य अंग में फाइलेरिया का प्रकोप है। पढ़िए खास ख़बर..

स्पेशल रिपोर्ट: इस जिले में हाथी पांव के 106 मरीज, फाइलेरिया के नाम पर अभिशप्त हुआ ये गांव
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धमतरी: हाथी पांव बीमारी के नाम पर धमतरी जिला अभिशप्त स्थान बन गया है। खासकर शहर के दो वार्ड जालमपुर और दानीटोला इस बीमारी के नाम पर काफी संवेदनशील हैं। यहां पर एक दर्जन से ज्यादा मरीज हैं। सबसे ज्यादा 53 मरीज धमतरी शहर के हैं। इस बीमारी की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका कोई कारगर उपचार नहीं है। एक बार पैर हाथी पांव बन जाता है तो उसे ठीक करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। रोहणी ने बताया कि वह 20 साल से इस बीमारी को अपने शरीर पर ढो रही है। इलाज की आस में अस्पतालों के चक्कर लगाए, कई डॉक्टरों को दिखाया लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई। उन्होंने बताया कि कई लोग तो इस बीमारी को साथ लेकर स्वर्ग सिधार गए। राहत की बात यह है कि पिछले एक साल में यहां कोई भी नया मरीज नहीं मिला है।

केस -1

रोहणी को पता नहीं चला और धीरे-धीरे उसके दोनों पैर हाथी पांव बन गए। इस बीमारी के बाद वह साइटिका की मरीज भी हो गई। अब स्थिति यह है कि उसका अधिकांश समय बिस्तर पर गुजर रहा है। यह दर्द सिर्फ रोहणी का ही नहीं है। जिले में 106 लोग हाथी पांव लेकर घूम रहे हैं। 88 लोग और हैं, जिनके पैरों के अतिरिक्त दूसरे अंगों में फाइलेरिया का प्रभाव है।

केस -2

ईश्वरी ने बताया कि पैरों व शरीर के दूसरे अंगों में यह बीमारी होती है। खुजली, बुखार, चक्कर के साथ उसके पैर में सूजन शुरू हुई। जब तक वह कुछ समझ पाती, सूजन काफी बढ़ गई और हाथी पांव में बदल गया। तत्काल ही उसने इलाज शुरू करवाया जिसके बाद सूजन का बढ़ना कम हुआ लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई। उसके पैरों में सूजन स्थायी हो चुकी है। फिलहाल उसे कोई समस्या नहीं है और वह सब काम आसानी से कर सकती हैं।

हरिभूमि ने प्रथम बार उठाया था फाइलेरिया का मुद्दा

हरिभूमि ने छत्तीसगढ़ में लॉंचिंग के बाद सबसे पहले 18-19 साल पहले फाइलेरिया की समस्या को प्रमुखता से उठाया था। तत्कालीन धमतरी विधायक हरषद मेहता ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया था। समाचार प्रकाशन के बाद इस समस्या से ग्रसित दानीटोला वार्ड में स्वास्थ्य विभाग की टीम ने कैम्प लगाकर पीड़ित लोगों की पहचान कर उनका इलाज शुरू किया था। इसके बाद ही फाइलेरिया की दवाई पूरे छत्तीसगढ़ में बांटना शुरू हुआ था।

सुने डॉक्टर की

फाइलेरिया क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होता है। शरीर के जिस अंग में यह तरल पदार्थ के बहाव को जाम करता है, उस अंग में सूजन हो जाती है। शुरूआत में इस बीमारी को यदि ट्रेस कर लिया जाता है तो इसे पूर्णत: ठीक किया जा सकता है। वैसे इसके इलाज की कई नई और उन्नत तकनीक भी विकसित हो चुकी है। जहां-जहां इस बीमारी का ज्यादा प्रकोप है, वहां पर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। मच्छरों को नष्ट करने के उपाय किए जा रहे हैं जिसका सार्थक परिणाम सामने आया है।

- डॉ. डीके तुर्रे, सीएमएचओ

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