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परिनियम-14 : खैरागढ़ विश्वविद्यालय में शीघ्रलेखकों को मिलेगा पदोन्नति का अवसर, खामियां दूर करने में जुटा प्रबंधन

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में इन दिनों विश्वविद्यालय प्रशासन और कुछ कर्मचारियों के बीच जबरदस्त तनातनी का माहौल है। वजह ये कि विश्वविद्यालय के परिनियम 14 में किए गए संशोधन कुछ कर्मचारियों को नागवार गुजर रहा है। उनका कहना है, कि कुछ चुनींदे लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रशासन ने ऐसा किया है, जबकि प्रशासन का मानना है कि पहले के संशोधन में जो गलती हुई, उसके कारण एक पूरा कैडर पदोन्नति के अवसर से वंचित था, जिसे ठीक कर लिया गया। पढ़िए पूरी खबर-

परिनियम-14 : खैरागढ़ विश्वविद्यालय में शीघ्रलेखकों को मिलेगा पदोन्नति का अवसर, खामियां दूर करने में जुटा प्रबंधन
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रायपुर। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ में दिनांक 24 सितम्बर 2021 को कार्यकारिणी समिति की बैठक आयोजित की गई थी। बैठक में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कर्मचारियों की पदोन्नति संबंधी परिनियम 14 में आंशिक संशोधन का प्रस्ताव विश्वविद्यालय प्रावधानानुसार रखा गया था।

इस संबंध में उक्त प्रस्ताव को कार्यकारिणी समिति में रखे जाने की आवश्यकता के संबंध में जानकारी प्राप्त की गई, तो पता चला कि पहले की कुलपति द्वारा उसी परिनियम में ऐसा संशोधन कर दिया गया था, जिससे न केवल शीघ्रलेखक कैडर पदोन्नति से वंचित हो रहा था, बल्कि शीघ्रलेखकों को पदोन्नति के अवसर भी नहीं मिल पा रहे थे। यह संशोधन 2013 में किया गया था। जबकि संशोधन के पहले शीघ्रलेखक संवर्ग से ही टीएम जोश और रमेश श्रीवास्तव को सहायक कुलसचिव व उप कुलसचिव के पद पर पदोन्नति दी गई थी। इस विसंगति को दूर करने के लिए वर्तमान विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा न्याय के आधारभूत सिद्धांत को ध्यान में रखकर पदोन्नति से वंचित शीघ्रलेखक कैडर को न्याय दिलाने के उद्देश्य से 24 सितम्बर 2021 को कार्यकारिणी समिति की बैठक में प्रस्ताव विचारार्थ रखा गया, जिस पर कुछ मार्गदर्शन के साथ अग्रिम कार्यवाही का निर्णय लिया गया। असल में, विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा वर्तमान में उठाए गए इस कदम से शीघ्रलेखक संवर्ग को पदोन्नति का लाभ मिल सकेगा। लेकिन, वर्तमान संशोधन को लेकर विश्वविद्यालय में कार्यरत कर्मचारियों में से कुछ का विरोध भी सामने आया है। विरोध करने वाले कर्मचारियों का कहना है, कुलपति के निज सचिव को पदोन्नति का लाभ पहुंचाने के लिए यह संशोधन किया गया है, जबकि 2013 में किया गया संशोधन दरअसल कुछ तयशुदा लोगों को लाभ पहुंचाने के इरादे से किया गया था।

आपको बता दें, कि 2013 के संशोधन के बाद जिन लोगों को गलत तरीके से नियुक्ति मिली, बाद में उनके कार्यों में अनियमितताओं की भी शिकायतें रही हैं। जानकारी मिली है कि पूर्व कुलपति मांडवी सिंह के समय किया गया यह संशोधन कर्मचारियों के हितों पर कुठाराघात था। जिसे नए संशोधन से ठीक कर लिया गया है। अन्य विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों में जहाँ निज सचिव का पद है, वहाँ शीघ्रलेखक कैडर के कर्मचारियों को उप कुलसचिव तक पदोन्नत किये जाने का प्रावधान है। यह प्रावधान इस विश्विद्यायलय में भी था, परंतु 2013 के संशोधन ने पूरे कैडर के पदोन्नति के प्रावधानों को ही खत्म कर दिया था, जो कि कर्मचारियों के हितों पर कुठाराघात है। उस संशोधन के बाद जिन लोगों को मनमाने ढंग से नियुक्ति दी गई अथवा प्रभार दिया गया, उनके कार्यों में भारी अनियमितताओं की जांच शासन के स्तर पर जारी है।

विवाद की वजह : असल में, जिस खैरागढ़ विश्वविद्यालय का नाम देश और दुनिया में कला और संगीत के लिए हमेशा ऊंचा रहा है, उसके कैम्पस के भीतर तमाम भ्रष्टाचार, निर्माण कार्यों में अंधाधूंध गड़बड़ी, मनमानी नियुक्तियां और बेलगाम गतिविधियां भी लंबे समय से जारी रही है। लेकिन, पिछले कुछ सालों से विश्वविद्यालय प्रबंधन ने टेंडर, नियुक्ति, प्रभार वितरण समेत तमाम गतिविधियों में न केवल कड़ाई बरती है, बल्कि कई अनावश्यक कारणों पर हो रहे खर्चे पर भी तगड़ा लगाम कस दिया है। इससे तमाम ऐसे कर्मचारियों को कष्ट पहुंच रहा है, जो विश्वविद्यालय के बाहर की मदद से ऐसी क्रियाकलापों में शामिल रहे हैं। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा परिनियम-14 में संशोधन के प्रस्ताव का स्वागत कर रहा है, क्योंकि इससे वंचित किन्तु पात्र कैडर को पदोन्नति का अवसर मिलेगा, लेकिन जिन कर्मचारियों का अनैतिक हित इससे प्रभावित हो रहा है, वे विरोध भी कर रहे हैं। जानकर हैरानी होगी कि उसी संशोधन के अंतर्गत टीएम जोश और रमेश श्रीवास्तव को सहायक कुलसचिव व उप कुलसचिव के पद पर पदोन्नति दी गई थी, तब ऐसा विरोध सामने नहीं आया था। अब विरोध हो रहा है। उस विरोध में भी सिर्फ इतना कहा जा रहा है कि कुछ लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए संशोधन किया जा रहा है। विरोध के पीछे ऐसा कोई ठोस तकनीकी या कानूनी कारण नहीं बताए जा रहे हैं, जिससे संशोधन को चुनौती दी जा सके, क्योंकि टीएम जोश और रमेश श्रीवास्तव को उसी व्यवस्था के अंतर्गत पदोन्नति दी गई थी।

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