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गुरु-शिष्य परंपरा बढ़ेगी आगे, गरीब युवा कलाकारों काे उच्च शिक्षा-ट्रेनिंग के लिए मिलेगी छात्रवृत्ति

छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में गुरु-शिष्य परंपरा नए सिरे से साधने की तैयारी की है। छत्तीसगढ़ की लोक पारंपरिक जनजातीय कलाओं शास्रीय संगीत, नृत्य, दृश्यकला, सुगम संगीत, ठुमरी, दादरा, टप्पा से लेकर कव्वाली और गजल की विधाओं से जुड़े गरीब युवा कलाकारों, छात्रों के लिए उच्च प्रशिक्षण और शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

गुरु-शिष्य परंपरा बढ़ेगी आगे, गरीब युवा कलाकारों काे उच्च शिक्षा-ट्रेनिंग के लिए मिलेगी छात्रवृत्ति
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रायपुर. छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में गुरु-शिष्य परंपरा नए सिरे से साधने की तैयारी की है। छत्तीसगढ़ की लोक पारंपरिक जनजातीय कलाओं शास्रीय संगीत, नृत्य, दृश्यकला, सुगम संगीत, ठुमरी, दादरा, टप्पा से लेकर कव्वाली और गजल की विधाओं से जुड़े गरीब युवा कलाकारों, छात्रों के लिए उच्च प्रशिक्षण और शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार के संस्कृति विभाग ने इसके लिए नियम भी बनाया है। मासिक छात्रवृत्ति के रूप में पांच हजार से लेकर दस हजार रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे।

परंपरा को आगे बढ़ाने की कवायद

राज्य में किसी समय में कला संगीत के क्षेत्र में गुरु-शिष्य परंपरा का चलन था, जो अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, लेकिन अब राज्य सरकार ने इस परंपरा को जीवित कर नए सिरे से साधने की तैयारी की है। राज्य के ऐसे छात्र-छात्राएं, जो संगीत, नृत्य, प्रदर्शनकारी कला विधा में शिक्षा, उच्च शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्था में अध्यनरत हैं, उन्हें छात्रवृत्ति दी जाएगी। हर साल 111 लोगों को स्कॉलरशिप दी जाएगी।

सालभर तक हर महीने मिलेगी राशि

सरकार ने तय किया है कि कला संगीत से जुड़े छात्र-छात्राएं, जिनकी आयु 15 से 30 साल के बीच है और उनके परिवार की वार्षिक आय सालाना 72 हजार से अधिक नहीं है। ऐसे गरीब परिवारों के लोगों को यह छात्रवृत्ति दी जाएगी। प्रशिक्षण संस्था, गुरु-शिष्य परंपरा के लिए हर महीने पांच हजार रुपए, स्कूल शिक्षा वालों के लिए आठ हजार रुपए और उच्च शिक्षा से जुड़े छात्र-छात्राओं को लिए दस हजार रुपए मासिक छात्रवृत्ति देने की योजना है। इस राशि में यात्रा, पाठ्यपुस्तक, कला सामग्रियों या उससे संबंधित उपकरण तथा प्रशिक्षण में होने वाला खर्च शामिल रहेगा।

इन विधाओं के लिए मिलेगी राशि

लोक पारंपरिक जनजातीय कलाएं, छत्तीसगढ़ की समस्त पारंपरिक जनजातीय और लोकनाट्य, नृत्य, गीत/संगीत, खेल, चंदैनी, भरथरी, गोपी-चंदा, पंडवानी, घोटुल पाटा, धनकुल जगार तथा छत्तीसगढ़ की अन्य पारंपरिक लोक जनजातीय गाथाएं, वाद्य, पाक कला, सौंदर्यकला, गायन, वादन आदि। शास्त्रीय संगीत हिंदुस्तानी (गायन/वादन) एवं कर्नाटिक (गायन/वादन) आदि। शास्त्रीय नृत्य तथा नृत्य संगीत, भरतनाट्यम, कथक, कुचीपुड़ी, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी, कथकली एवं संगीत आदि। रंगमंच क्षेत्र में हिंदी और छत्तीसगढ़ी नाट्य मंचन, नाचा, भतरा, नाट तथा अन्य लोक जनजातीय नाट्य विधा सहित दृश्य कला, ग्राफिक्स, मूर्तिकला, पेंटिंग, फोटोग्राफी, मृद्भाण्ड तथा मृणकला (सेरीमिक्स) छत्तीसगढ़ के विविध लोक जनजातीय परंपराओं के चित्रांकन की विधा आदि। सुगम शास्त्रीय संगीत में ठुमरी, दादरा, टप्पा, कव्वाली, गजल आदि को शामिल किया गया है।

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