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Sunday Special : पटना म्यूजिम में छिपा है ज्ञान का भंडारण, आप जरूर करें यहां की सैर

वर्तमान के बारे में जानना है तो इतिहास के पन्नों में झांकना ही होगा। अगर विशेष तौर पर बिहार का अतीत जानना है तो पटना संग्रहालय से अच्छी कोई जगह नहीं है। यहां एक छत के नीचे आपको बिहार की समृद्ध विरासत की झलक देखने को मिल जाएगी।

Sunday Special You can see glimpse of heritage of rich Bihar in Patna Museum
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पटना म्यूजिम (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Sunday Special: ज्यादातर हम अपने आसपास बिखरे अतीत से अनजान होते हैं। उदाहरण के लिए पटना (Patna) के प्रसिद्ध म्यूजियम (Museum) को ही लें। पटना शहर के बीचों-बीच स्थित इस म्यूजियम के बारे में स्थानीय लोगों को भी ज्यादा पता नहीं होगा। इसलिए आज पटना संग्रहालय (Patna Museum) के भव्य इतिहास (history) से रू-ब-रू हो जाएं!

साल 1912 से पूर्व बिहार (Bihar), उड़ीसा (Orissa) और बंगाल (Bengal) तीनों राज्यों को मिलाकर इस पूरे क्षेत्र को बंगाल प्रेसीडेंसी (Bengal Presidency) के नाम से जाना जाता था। उस वक्त बंगाल प्रेसीडेंसी में एक ही संग्रहालय था जो इंडियन म्यूजिम (Indian Museum), कलकत्ता (Calcutta) के नाम से जाना जाता था। उस वक्त जो भी पुरावशेष (Antiquity) प्राप्त होते थे उसे इसी संग्रहालय में रख दिया जाता था। इस संग्रहालय की स्थापना 1814 में की गई थी।

डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने रखा था म्यूजिम बनाने का प्रस्ताव

जब 22 मार्च 1912 को बिहार और उड़ीसा बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग हो गए। उस वक्त बिहार के पटना स्थित कुम्हरार में डॉ. डीवी स्पूनर के अगुवाई में पुरातात्विक उत्खनन का कार्य चल रहा था। इस उत्खनन कार्य के दौरान कई पुरावशेष प्राप्त हुए। पुरावशेष को रखने के लिए डॉ. स्पूनर को एक जगह की जरूरत महसूस हुई। इस पर उन्होंने ब्रिटिश सरकार से पुरावशेषों को स्थान देने की मांग की। उनकी इस मांग पर बिहार एवं उड़ीसा के प्रथम लेफ्टिनेंट गर्वनर जनरल सर स्टुअर्ट बेली ने अपने आवास पर 20 जनवरी 1915 को विद्वानों की एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की ओर से एक म्यूजिम बनाने का प्रस्ताव दिया गया। बैठक में सभी ने इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया।

पटना हाईकोर्ट के उत्तरी उपांग में शुरू में हुई थी स्थापना

सन 1917 को तत्कालीन उड़ीसा एवं बिहार के लेफ्टिनेंट गर्वनर जनरल सर एडवर्ड गेट ने एक स्थानीय संग्रहालय की स्थापना पटना हाईकोर्ट के उत्तरी उपांग में किया। लेकिन पुरावशेषों की बढ़ती संख्या की वजह से कुछ ही दिनों के अंदर यह स्थान जगह की दृष्टि से छोटा पड़ने लगा। तब सरकार ने म्यूजिम के लिए 700 X 500 वर्गफीट जमीन पटना-गया मार्ग पर (बुद्ध मार्ग के पश्चिम तथा इलाहाबाद बैंक के उत्तर) आवंटित की। जिसके बाद उस जमीन पर म्यूजिम के भवन निर्माण का कार्य शुरू हुआ। इस म्यूजिम का भवन निर्माण कार्य 1928 के दिसम्बर महीने में संपन्न हुआ।

स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना पेश करता है यह भवन

पटना म्यूजिम का यह भवन स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने को दर्शाती है। इस भवन को मुगल-राजपूत शैली (इंडो-सारसैनिक) में बनाया गया है। इस भवन की परिकल्पना रायबहादुर विष्णु स्वरूप ने तैयार की थी। 6 मार्च 1929 के दिन इस बिल्डिंग को म्यूजिम को सौंपा गया। वहीं 7 मार्च 1929 को यह म्यूजिम बिहार एवं उड़ीसा के तत्कालीन गर्नर जनरल सर ह्यूज स्टिफेन्स की तरफ से आम नागरिकों के लिए समर्पित कर दिया गया। इसी के साथ पटना म्यूजिम कलकत्ता म्यूजिम के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा संग्रहालय बन गया।

पटना संग्रहालय विशेषताएं

वर्तमान में पटना संग्रहालय में कुल 17 दीर्घाओं में पुरावशेषों/कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। पटना संग्रहालय बहुद्देशीय है। संकलित पुरावशेष/कलाकृति अलग-अलग प्रकृति के होने के कारण अलग-अलग दीर्घाओं में प्रदर्शित हैं। इनमें प्रस्तर प्रतिमा, मृण्मूर्तियां, अभिलेख, चित्रकला, कांस्य प्रतिमा, प्राकृतिक इतिहास, देशी-विदेशी साज-सज्जा, अस्त्र-शस्त्र, डेनियल प्रिंट, कई प्रकार के खनिज प्रस्तर, महापंडित राहुल सांकृत्यायन की सामग्री (थंका एवं पांडुलिपि), डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सामानों के साथ-साथ बुद्ध के अस्थि कलश को भी प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय में लगभग 80,000 पुरावशेषों एवं कलाकृतियों का संग्रह है। इनमें से मात्र 10 प्रतिशत पुरावशेष प्रदर्शित हैं। शेष पुरावशेषों को रोटेशन पर प्रदर्शित किया जाता है।

इतिहास की झलक पेश करता है पटना संग्रहालय

पटना संग्रहालय अपने प्रदशर्नी के जरिए से मानव सभ्यता के क्रमिक विकास को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करता है। ये अतीत के उत्कृष्ट कलात्मक अभिव्यक्ति की झलक भी पेश करता है। इसे उच्च शिक्षा संस्थान और ज्ञान केंद्र के तौर पर भी जाना जाता है। देश-विदेश से कला, साहित्य एवं इतिहास के छात्र यहां शोध करने के लिए आते हैं। यदि भारत के इतिहास, भारतीय कला, साहित्य व जीवन को जानना हो तो इससे बेहतर कोई दूसरी जगह नहीं हो सकती। अतीत के अद्वितीय संग्रह की वजह से पटना म्यूजिम की गणना देश के विशिष्ट संग्रहालयों में होती है। दूसरे देश से लोग आए दिन पटना म्यूजिम पहुंचते हैं और अपने ज्ञान का भंडारण करते हैं। तो आप भी मौका मिलने पर पटना संग्रहालय की सैर करें और अपने साथ जानकारी का अद्भुत खजाना वापस लेकर लौट आएं।

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