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योग इति‍हास: न बहुत पुराना और न बहुत हिंदुओं का

योग को लेकर भारतीय अक्सर दावे के साथ कहते हैं कि ये करीब पांच हजार साल पुरानी वैदिक परंपरा है।

योग इति‍हास: न बहुत पुराना और न बहुत हिंदुओं का
नई दिल्ली. इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि हिन्दुओँ के सबसे पुराने और पवित्र ग्रंथों में से एक भगवद्गीता में योग के अलग-अलग प्रकार के अभ्यासों का वर्णन है। लेकिन योग के इस प्राचीन और पवित्र परंपरा का दुनियाभर के सभी लोगों से जो आज जिम और फिटनेस सेंटर में योग करते हैं से क्या लेना-देना है ? ज्यादातर भारतीयों के लिए ऐसे सवाल धर्म से जुड़ा हुआ है। पुराने समय में भारतीयों के लिए योग जीवन जीने का जीवंत प्रतीक रहा है।

योग को लेकर भारतीय अक्सर दावे के साथ कहते हैं कि ये करीब पांच हजार साल पुरानी वैदिक परंपरा है, जो सिंधु घाटी सभ्यता के पशुपति मुहर से फैलकर भगवद्गीता और पतंजलि का योग सूत्र बना। भारतीय सत्यनिष्ठा से कहते हैं कि योग 'सनातन' और 'असामयिक' है। स्वामी विवेकानंद से लेकर बीकेएस आयंगर तक और वर्तमान में बाबा रामदेव जैसे सभी महान योग गुरुओं ने इस प्राचीन परंपरा को फिर से प्रचलन में लाया है। भारतीय और वे लोग भी जो खुद आध्यात्मिक नही हैं, अक्सर अमेरिकियों और पतनशील पश्चिमी देशों के लोगों को इस बात का दोषी मानते हैं कि केवल व्यायाम करने के लिए आध्यात्मिक समृद्ध परंपरा के महत्व को कम कर दिया।

कुछ साल पहले अमेरिका में हिंदुओं ने बहुत से योग आसन वाले अमेरिकन शैली योग को लेकर भगवा झंडा लहराना शुरू कर दिया था। नेतृत्व कर रहा भारतीय-अमेरिकी लॉबी हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने अमेरिकियों को याद दिलाने के लिए एक मुखर अभियान चलाया, जिसमें यह कहा गया कि योग भारत में हिन्दुओं द्वारा शुरू किया गया था, न सिर्फ आम हिन्दुओं ने बल्कि जंगल में रहने वाले और संस्कृत बोलने वाले ब्राहमण ऋषियों ने भी किया था। ये ऋषि अपनी आत्मा की शुद्धीकरण के लिए शरीर को अनुशासन में रखते थे। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन द्वारा व्यक्त किया गया कि शुद्धतावादी हिंदू के लिए योग एक क्रियात्मक साधन है। योग हिन्दू धर्म की जड़ों में बस हुआ है। जिसका श्रेय वैदिक ऋषि-मुनियों को जाता है।

योग के इस शुद्धतावादी इतिहास के साथ एक ही समस्या है कि इसे धर्म से जोड़कर देखा जाता है, जो कि सरासर गलत है। योग में करने वाले योगासन कभी भी वैदिक या धर्म से जुड़े नहीं थे। योग आसन सुदूर से हिंदू धर्म का मुकुट का गहना माना जाता रहा है। वास्तव में योग आसन को हिन्दू बुद्धिजीवियों और सुधारकों ने अनदेखा किया। इसमें स्वामी विवेकानंद भी शामिल थे। स्वामी विवेकानंद केवल अभिचारक, फकीर और जोगी के रूप में योग्य थे। इसके अलावा हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन जो कहता है कि योग के साथ जो खिलवाड़ हुआ है उसके लिए पश्चिमी छेड़छाड़ जिम्मेदार है। पश्चिमी देशों में योगासनों के साथ बहुत अधिक खिलवाड़ हुआ। आधुनिक योग के लिए ईमानदारी से पश्चिमी योगदान को स्वीकार करने के बजाय हम भारतीय आसानी से योग पर वैदिक होने का ठप्पा लगा देते हैं। इस आत्मसंतुष्ट दावे का कोई बौद्धिक प्रमाण नहीं है।

अमेरिका में योग
जैसे भारत के लिए मैकडॉन्लड्स है, उसी तरह उत्तरी अमेरिका के लिए योग है। दोनों विदेशों से आकर अपनी जगह सहज हो गए। अमेरिका के नगरों और उपनगरों में हेल्थ क्लब, स्पा और चर्च तक में योग के क्लास चल रहे हैं। अमेरिका में व्यायाम के तौर पर करीब 1.6 करोड़ लोग योग के अलग-अलग अभ्यास करते हैं। अमेरिका में लोग आसनीय योग की जगह ध्यान योग करना पसंद करते हैं। सामान्य तौर पर अमेरिका का योग उद्योग जो सिखाता है, उसकी उत्पत्ति को छिपाता नहीं है। अमेरिका में योग करने के दौरान नमस्ते, ऊँ और संस्कृत मंत्रों का उच्चारण एक हिस्सा बन गया है। वहां के कई योग स्टूडियों में भारतीय शास्त्रीय संगीत और कीर्तन का इस्तेमाल किया जाता है।

तो आखिर योग है किसका
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन दावा करता है कि पश्चिमी लोगों ने योग को पूरी तरह से चुराया है। उन्होंने योग में बड़े स्तर पर मिलावट की है। लेकिन, वास्तव में देखा जाए तो समकालीन योग ग्लोबल इनोवेशन का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें पूर्वी और पश्चिमी योग अभ्यासों को मिलाया गया, जिससे नए योग अभ्यास विकसित हुए। आज इन नए योग अभ्यासों का दुनियाभर में महत्व है। हिन्दू धर्म (चाहे वो प्राचीन हो, मध्यकालीन हो या फिर आधुनिक) में 21वीं सदी के आसनीय योग को लेकर ऐसा कोई विशेष दावा नहीं है। अगर ऐसा कोई दावा है तो वो सिर्फ और सिर्फ एक झूठ है।
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