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World Kidney Day 2019 : जानिए किडनी के रोग के प्रकार, इसके कारण, लक्षण और बचाव

शरीर में ब्लड के प्यूरिफिकेशन का काम एक जोड़ी किडनी करती हैं। लेकिन कई बार लाइफस्टाइल, डाइट में लापरवाही या अन्य कारणों से इसमें प्रॉब्लम होने लगती है। ध्यान न देने या सही समय पर ट्रीटमेंट न करने से कंडीशन बिगड़ सकती है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि किडनी में किस तरह की प्रॉब्लम्स हो सकती हैं और इन्हें हेल्दी कैसे रख सकते हैं?

World Kidney Day 2019 :  जानिए किडनी के रोग के प्रकार, इसके कारण, लक्षण और बचाव

World Kidney Day 2019 : आज की लाइफस्टाइल और अनहेल्दी फूड हैबिट्स के चलते कई गंभीर बीमारियां लोगों को अपनी चपेट में ले रही हैं। इनमें किडनी से रिलेटेड डिजीज भी प्रमुख हैं। ये उम्रदराज लोगों में ही नहीं, युवाओं और बच्चों में भी देखी जाती हैं। हर 10 में से 1 व्यक्ति किडनी की किसी न किसी डिजीज का शिकार हो रहा है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के हिसाब से दुनिया भर में करीब 85 करोड़ लोग किडनी डिजीज से ग्रस्त हैं। जागरूकता की कमी और समय पर समुचित उपचार न करा पाने के कारण हर वर्ष 24 लाख लोगों की मृत्यु भी हो जाती है। जबकि प्रारंभिक स्तर पर ही इलाज शुरू कर दिया जाए तो काफी हद तक इसे डैमेज होने से बचाया जा सकता है। किडनी डिजीज के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए हर साल मार्च के दूसरे गुरुवार को ‘वर्ल्ड किडनी डे’ (World Kidney Day) मनाया जाता है। इस साल इसका थीम (Theme) है- 'किडनी हेल्थ फॉर एवरीवन, एवरी वेयर यानी स्वस्थ किडनी हर जगह, सबके लिए है'।

किडनी के फंक्शंस

किडनी या गुर्दा शरीर का एक छोटा ऑर्गन होने के बावजूद हमें हेल्दी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। एक किडनी में करीब 10 लाख फिल्टर
यूनिट्स होते हैं, जिनमें सूक्ष्म रक्त वाहिकाएं-नेफ्रॉन होते हैं। किडनी एक मिनट में 125 मिलीलीटर और रोजाना करीब 200 लीटर ब्लड को प्यूरीफाइ करती है। इस प्रक्रिया में करीब 2 लीटर यूरीन बनाता है। किडनी ब्लड से यूरिक एसिड जैसे टॉक्सिक (विषैले पदार्थ) को फिल्टर करती है और उन्हें यूरीन के जरिए फ्लश आउट करती है। बॉडी में सॉल्ट, पोटेशियम, यूरिक एसिड जैसे रसायनों के लेवल का संतुलन बनाए रखती है। साथ ही किडनी से कई हार्मोन भी निकलते हैं जो आरबीसी (रेड ब्लड सेल्स) को बनाने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद करते हैं। लेकिन कई कारणों से जब किडनी ठीक से काम नहीं कर पाती तो यूरीन में एलब्यूमिन-एथ्रोप्रोटीन नामक प्रोटीन, कैल्शियम, सोडियम, पोटेशियम और फास्फेट की मात्रा अधिक हो जाती है। क्रिएटिनिन जैसे विषैले पदार्थ बाहर न निकलकर शरीर में ही स्टोर होना शुरू हो जाते हैं। यूरिक एसिड बढ़ने से किडनी और शरीर के दूसरे अंगों को नुकसान पहुंचने लगता है। ऐसे में किडनी खराब होने की आशंका बढ़ जाती है।

किडनी डिजीज के प्रकार :

एक्यूट किडनी फेल्योर

अनावश्यक रूप से पेनकिलर मेडिसिन लेने और एलर्जी के चलते यह बीमारी ज्यादा देखने को मिलती है। इसमें किडनी अचानक काम करना बंद कर देती है, जिसका असर पेशेंट की सेहत पर पड़ता है। एक्यूट किडनी फेल्योर पर सही ट्रीटमेंट और डायलिसिस से काबू पाया जा सकता है।

क्रॉनिक किडनी फेल्योर:

डायबिटीज, ब्लड प्रेशर के मरीज क्रॉनिक किडनी फेल्योर का शिकार हो सकते हैं। इसमें किडनी धीरे-धीरे खराब होती है, लंबे समय तक प्रभावित रहने पर सूखती जाती है और दुबारा ठीक नहीं हो पाती। किडनी ठीक से काम नहीं कर पाने के कारण पेशेंट के ब्लड में क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड जैसे विषैले पदार्थ बाहर न निकलकर शरीर में ही स्टोर होना शुरू हो जाते हैं, जिससे किडनी फेल्योर हो सकता है।

किडनी स्टोन:

इस ऑर्गन के ठीक से काम नहीं करने की वजह से किडनी में यूरिक एसिड जमा होने लगता है, जो धीरे-धीरे स्टोन का रूप ले लेता है।
स्टोन होने पर पेशेंट पेट में दर्द की शिकायत करता है। किडनी में होने वाले स्टोन अगर छोटे आकार के हैं तो अधिक पानी पीने से अपने आप शरीर से
बाहर निकल जाते हैं जबकि बड़े स्टोन के लिए सर्जरी की जाती है। डॉक्टर लिथोट्रिस्पी से स्टोन को बारीक कर देते हैं, जिससे वो यूरीन के साथ बाहर
निकल जाते हैं।

नेफ्रोटिक सिंड्रोम:

इस डिजीज में यूरीन में प्रोटीन लीकेज होने से शरीर में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ जाता है। इससे शरीर के कई भागों में सूजन आ जाती है और किडनी फेल्योर का खतरा रहता है। यह बीमारी बच्चों में भी देखी जाती है।

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन:

यह भी किडनी डिजीज का एक प्रकार है। इसमें पेशेंट, यूरीन रुक-रुक कर आने की समस्या से ग्रस्त रहता है साथ ही उसे यूरीन डिस्चार्ज के दौरान अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

किडनी रोगों का कारण

इनएक्टिव लाइफस्टाइल, गलत खान-पान के साथ हमारी कई गलत आदतें भी किडनी खराब होने के लिए जिम्मेदार होती हैं। इनसे शरीर के दूसरे अंगों के साथ-साथ किडनी पर भी दबाव पड़ता है। इससे किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और लंबे समय तक बने रहने पर डैमेज भी हो जाती है।
-हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज जैसी बीमारी में नर्व्स पर दबाव पड़ता है जिससे किडनी प्रभावित हो सकती है।
-हेरिडिटरी, पॉलिसिस्टिक किडनी डिजीज, किडनी डिस्प्लेसिया, यूटीआई इंफेक्शन जैसे कारणों की वजह से किडनी सूख जाती है।
-जंक फूड के सेवन से शरीर में नमक-चीनी का लेवल बढ़ जाता है।
- खाने में ऊपर से नमक डालकर खाने से।
-आहार में प्रोटीन की अधिक मात्रा लेना या प्रोटीन सप्लीमेंट्स के सेवन से।
-स्टेरॉयड या पेनकिलर मेडिसिन के अधिक प्रयोग से।
-पानी या अन्य तरल पदार्थ जरूरत से कम मात्रा में लेने से डिटॉक्सीफाई न हो पाने के कारण।
- लंबे समय तक यूरीन डिस्चार्ज नहीं करना।
-नियमित रूप से व्यायाम नहीं करना।
-एल्कोहल या तंबाकू का सेवन करना।

किडनी रोग के लक्षण

प्राइमरी स्टेज में आमतौर पर किडनी खराब होने के लक्षण पकड़ में नहीं आते। फिर भी कुछ लक्षण किडनी में गड़बड़ी होने की ओर इशारा करते हैं, जिनसे व्यक्ति को सचेत हो जाना चाहिए और डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए।
-शरीर के हिस्सों में जैसे-चेहरे, पैर और टखनों में सूजन आना।
-कमजोरी और थकान महसूस करना।
-किसी भी काम में कंसंट्रेट नहीं कर पाना।
-भूख कम लगना, पेट में जलन और दर्द रहना, घबराहट रहना।
-मांसपेशियों में खिंचाव और ऐंठन होना।
-कमर के नीचे दर्द होना।
-यूरीन डिस्चार्ज में समस्या आना।
-रात में बार-बार यूरीन डिस्चार्ज की इच्छा होना।

तब रहेगी हेल्दी किडनी

-क्रॉनिक डिजीज से बचने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करें और वजन नियंत्रित रखें।
- ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर लेवल मेंटेन करें।
-साल में एक बार किडनी चेकअप जरूर कराएं।
-मेडिकल एडवाइस के बिना कोई दवाई न लें। पेन किलर या स्टेरॉयड लेने से बचें।
-बैलेंस और हेल्दी डाइट लें। मांस, अंडा, पालक, साग, टमाटर के ज्यादा सेवन से बचें।
-आहार में नमक की मात्रा कम रखें।
-रोजाना 3-4 लीटर या 10-12 गिलास पानी या लिक्विड लें।
-ध्रूमपान और नशीले पदार्थों का सेवन न करें।

ट्रीटमेंट

पेशेंट की स्थिति के हिसाब से इलाज किया जाता है। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को पहले कंट्रोल किया जाता है। एक्यूट किडनी फेल्योर के मरीज का इलाज अगर सही समय पर शुरू कर दिया जाता है, तो मेडिसिन से उसकी रिकवरी हो सकती है। लेकिन अगर किडनी 90 फीसदी से ज्यादा खराब हो चुकी है, तो पेशेंट को डायलिसिस पर रखा जाता है। डायलिसिस में अस्थाई तौर पर किडनी के ब्लड को फिल्टर करने का काम मशीन करती है। स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाने पर किडनी ट्रांसप्लांट करना पड़ता है।
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