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World Hearing Day : ये हैं हियरिंग लॉस के कारण, लक्षण और उपचार

सभी तरह की आवाजों को बेहतर तरीके से सुनने के लिए हमारे कानों का सही रहना जरूरी है। लेकिन कई बार किसी बीमारी या लापरवाही की वजह से लोग हियरिंग लॉस के शिकार हो जाते हैं। अगर एलर्ट रहते हुए समय पर सही ट्रीटमेंट कराया जाए तो इससे बचा जा सकता है। हियरिंग लॉस के कारणों, लक्षण और इलाज के बारे में विस्तार से जानिए।

World Hearing Day  : ये हैं हियरिंग लॉस के कारण, लक्षण और उपचार
हमारे कान शरीर की 5 ज्ञानेंद्रियों में एक हैं, जो हियरिंग यानी सुनने में मदद करते हैं। यह हियरिंग दो तरह की होती है- एन्वॉयर्नमेंटल और विचारों के आदान-प्रदान के लिए बोली जाने वाली भाषा की आवाज। आज दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या खासी है, जो जन्म से ही सुन नहीं पाते और मूक-बधिर की श्रेणी में आते हैं। वहीं ऐसे भी लोग हैं, जिनकी सुनने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जा रही है या आंशिक तौर पर केवल एक कान से ही सुन पाते हैं। लेकिन उपचार कराने से भी कतराते हैं। जबकि शुरुआती अवस्था में ही अगर इस समस्या को पहचान लिया जाए और समुचित उपचार कराया जाए, तो हियरिंग लॉस की समस्या से बचा जा सकता है।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट

डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की लगभग 5 प्रतिशत आबादी या करीब 466 मिलियन लोग हियरिंग लॉस की समस्या से जूझ रहे है। इनमें वयस्क 432 मिलियन हैं और 34 मिलियन बच्चे हैं। भारतीय आबादी के लगभग 6.3 प्रतिशत लोगों में यह समस्या मौजूद है, जिनमें लगभग 50 लाख बच्चे शामिल हैं। यही हाल रहा तो 2050 तक दुनिया के विभिन्न देशों में 900 मिलियन से अधिक लोग हियरिंग लॉस की समस्या से जूझ रहे होंगे यानी कि हर 10 में से 1 व्यक्ति इसका शिकार होगा। इसी को देखते हुए डब्ल्यूएचओ हर साल 3 मार्च का दिन ‘वर्ल्ड हियरिंग-डे’ के रूप में मनाता है ताकि दुनिया भर में हियरिंग लॉस की समस्या से बचाव के प्रति लोगों को जागरूक किया जा सके।

हियरिंग लॉस के प्रकार

जब साउंड वेव को ब्रेन तक पहुंचने में किसी तरह का अवरोध पैदा हो जाए, तो हियरिंग लॉस की समस्या हो जाती है।
कंडक्टिव हियरिंग लॉस:
भारत में सबसे ज्यादा हियरिंग लॉस, ईयर इंफेक्शन से ईयर-ड्रम में होने वाले होल के कारण होता है। यह इंफेक्शन आमतौर पर कान में पानी जाने या सर्दी-जुकाम के कारण होता है। जुकाम होने पर निकलने वाला पानी नाक और कान के मध्य भाग को जोड़ने वाली यूस्टेकियन ट्यूब में चला जाता है। ट्यूब को ब्लॉक कर पस या इंफेक्शन का रूप ले लेता है। इंफेक्शन मिडिल ईयर तक पहुंच कर ईयर-ड्रम में होल कर देता है। कान में दर्द रहता है और पस एक्सटर्नल ऑडिटरी केनाल से बाहर निकलने लगता है। कई बार यह पस साउंड को ब्रेन तक पहुंचाने वाली मिडल ईयर की हड्डियों में भी चला जाता है। यह होल साउंड को इनर ईयर तक पहुंचने में बाधा डालता है, जिससे हियरिंग लॉस हो जाता है।

सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस:

हमारे कान सेंसरी ऑर्गन हैं। हियरिंग डिफेक्ट, इनर ईयर कोकलिया की संरचना और सेंसरी पार्ट में भी हो सकते हैं। इसमें मौजूद हियर सेल्स साउंड वेव से वाइब्रेट तो करते हैं, लेकिन उनकी जड़ में करंट नहीं बन पाता और साउंड ब्रेन तक नहीं पहुंच पाता। फिर साउंड वेव को ब्रेन तक ले जाने वाली नर्व दबने या उसमें ब्लॉकेज होने से भी हियरिंग लॉस की समस्या आती है।

हियरिंग लॉस के कारण

-लंबे समय सर्दी-जुकाम रहने से होने वाला इंफेक्शन ईयर-ड्रम में होल करने के साथ-साथ मिडिल ईयर की हड्डियों को गलाने लगता है। इससे साउंड के ब्रेन तक ठीक तरह पहुंचने में रुकावट आती है।
-जन्म के समय ही बच्चों के आउटर ईयर की बनावट ठीक न होने से।
-ब्रेन में मेनिंजाइटिस इंफेक्शन होने पर इनर ईयर या ब्रेन की कवरिंग यानी मैनिंजस में मौजूद हियर सेल्स की जड़ में कैल्शियम जमा होने के कारण कोकलिया के काम बंद करने से।
-सफाई के गलत तरीकों जैसे ईयर बड्स, हेयर पिन, पेन-पेंसिल्स, स्ट्रा जैसी चीजों से कान में जमा वैक्स साफ करने से। ईयर केनाल में चोट लगने और सूजन होने से।
-अत्यधिक मेडिसिन लेने, वायरल इंफेक्शन, पैरालाइसिस, ब्रेन ट्यूमर जैसी स्थिति में साउंड को इनर ईयर से ब्रेन तक ले जाने वाली ओडिटरी नर्व डैमेज होने से।
-ईयर-ड्रम में होल को नजरअंदाज करना यानी सालों पहले इंफेक्शन से। डॉक्टर द्वारा दी गई एंटीबायोटिक मेडिसिन से पस तो सूख गया हो, लेकिन ईयर ड्रम का होल ठीक नहीं हो पाया हो, जिससे इंफेक्शन होने की संभावना रहती है।
-बुजुर्गों के कान में खून का दौरा कम होने से शॉर्ट इंक्रीमेंट सेंसेटिव इंडेक्स की समस्या देखने को मिलती है। यानी कान इरीटेबल हो जाता है और सुनाई देना कम हो जाता है।
-ड्रग्स या केमिकल्स से इंजरी जैसे- निमोनिया, टीबी जैसी बीमारी में दी जाने वाली सेप्टोमाइसिन मेडिसिन, केमिकल्स या प्रीजरवेटिव्स से संरक्षित खाद्य पदार्थों के सेवन या वातावरण में मौजूद हानिकारक ऑटोटॉक्सिक को इन्हेल करने से।
-साउंड वेव इंजरी जैसे- कान के पास बहुत तेज साउंड ब्लास्ट होने, बम फटने, या फिर म्यूजिक सुनते वक्त साउंड के ज्यादा एक्सपोजर से। एमपी 3 प्लेयर का इस्तेमाल, हेड फोन जैसी हियरिंग डिवाइसिस के ज्यादा इस्तेमाल से।
-रिपिटिटिव साउंड इंजरी यानी लंबे समय तक फैक्टरीज, कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने और लगातार चलने वाली मशीनों की आवाज के संपर्क में ज्यादा रहने से।

हियरिंग लॉस के लक्षण

कई बार जब तक हमें पता चलता है कि वाकई सुनने में कोई दिक्कत हो रही है, तब तक कान के 30 फीसदी हियर सेल्स नष्ट हो जाते हैं। कान में किसी भी तरह की समस्या हियरिंग लॉस का कारण बन सकती है- कान से वैक्स का बहना, सर्दी-जुकाम रहना और कान में दर्द होना, कान लाल होना, कान में अत्यधिक मात्रा में वैक्स बनना, वैक्स साफ न होने के कारण इंफेक्शन होना या पस पड़ना, पस का बाहर निकलना, बुखार होना, कानों में सीटी जैसी आवाजें सुनाई देना।

हियरिंग लॉस के ट्रीटमेंट

कान में किसी भी तरह की समस्या को इग्नोर न कर ईएनटी डॉक्टर को तुरंत कंसल्ट करना चाहिए। डॉक्टर कान के अंदरूनी भाग की जांच कर इंफेक्शन का पता लगाते हैं और ऑटोमाइकोटिक प्लग लगा कर इंफेक्शन को साफ करते हैं। कान में डालने के लिए एंटी फंगल या एंटी बैक्टीरियल ईयर-ड्रॉप्स और एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं।

माइक्रोस्कोपिक सर्जरी-

ईयर ड्रम या पर्दे में हुए होल और साउंड कैरी करने वाली हड्डियों को माइरिंगोप्लास्टी या टिंपैनोप्लास्टी से रिपेयर किया जाता है। शरीर के विभिन्न अंगों, मसल्स के टिश्यूज या कान के पीछे के कार्टिलेज के सॉफ्ट बोन से नया पर्दा बनाकर लगाया जाता है। या फिर सिलिकॉन, टाइटेनियन, टैफलॉन की रिप्लेसमेंट टिश्यूज की बोंस तराश कर आर्टिफीशियल रिप्लेसमेंट लगाया जाता है।
कोकलीयर इंप्लांट- जन्मजात दोष वाले बच्चों की माइक्रोस्कोपिक सर्जरी से कोकलिया की जगह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंप्लांटेबल कोकलीयर डिवाइस इंप्लांट की जाती है। इसमें एक तरफ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कॉयल कान की स्किन के नीचे इंप्लांट की जाती है, दूसरा वायर वाला हिस्सा इनर ईयर तक जाता है। साउंड को इलेक्ट्रिकल एनर्जी में कंवर्ट करके नर्व के सहारे ब्रेन तक पहुंचाया जाता है। यह सर्जरी काफी महंगी है।

हियरिंग एड-
हियरिंग लॉस के उपचार के लिए हियरिंग एड का सहारा भी लिया जाता है। आमतौर पर सर्जरी के भय या आर्थिक स्थिति के कारण बच्चों औैर बुजुर्गों के कान में ये लगाए जाते है। डॉक्टर उनकी हियरिंग लॉस की स्थिति के हिसाब से डिजिटल या प्रोग्रामर हियरिंग एड देते हैं। हियरिंग एड मोटे तौर पर चार तरह के होते हैं- बॉडी टाइप हियरिंग एड, बिहाइंड द ईयर हियरिंग एड (बीटीई), इन द केनाल हियरिंग एड (आईटीसी) और कंप्लीटली इन केनाल (सीआईसी)। हियरिंग एड 5-6 हजार से शुरू होकर 2-3 लाख रुपए तक के होते हैं।

रहें सावधान

-समय-समय पर अपनी श्रवण क्षमता की जांच जरूर करनी चाहिए और समस्या को इग्नोर न कर इलाज कराना चाहिए।
- पैरेंट्स को सतर्क रहना चाहिए कि अगर बच्चा जन्म के 4-5 महीने बाद भी उनकी आवाज पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहा हो, तो उसे डॉक्टर को कंसल्ट करना चाहिए। -जब भी सर्दी-जुकाम के बाद कान दर्द हो रहा हो तो ईएनटी सर्जन को तुरंत दिखाना चाहिए।
-इंफेक्शन से कान से पस बाहर आने की स्थिति में केवल पस सूखने तक ही नहीं बल्कि ईयर ड्रम के पूरा ठीक होने तक इलाज कराना चाहिए।
-कान की वैक्स जबड़े से खाना चबाने के दौरान अपने आप बाहर आ जाती है। डेली रूटीन में नहाते वक्त कान को अंगुली से साफ कर लेना ही काफी है। वैक्स नरम करने के लिए हफ्ते में एकाध बार एंटी फंगल ड्रॉप डॉक्टर की सलाह पर डाल सकते हैं।
-सर्दी-जुकाम होने पर या तुरंत बाद एयर ट्रेवल न करें। ऐसे में कान में दर्द होने की संभावना रहती है और कान का पर्दा प्रभावित हो सकता है।
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